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पार्वती का तप

Posted On February - 16 - 2020

पार्वती ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया। शंकर जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिये। पार्वती ने उन्हें वरण कर लिया। इसके बाद शंकर जी अंतर्धान हो गये। पार्वती आश्रम के बाहर शिला पर बैठी थीं। इतने में उन्हें किसी बालक के रोने की आवाज सुनाई दी। बालक चिल्ला रहा था। पार्वती जी दौड़ीं। देखा, एक बालक को सरोवर में ग्राह (घड़ियाल) पकड़े हुए है। वह पार्वती को देखते ही बालक को सरोवर के बीच ले गया। बालक का दुख देखकर पार्वतीजी का हृदय द्रवित हो गया। वे बोलीं- ग्राहराज! बालक बड़ा दीन है, इसे छोड़ दो। ग्राह बोला- देवी! दिन के छठे भाग में जो मेरे पास आयेगा, वही मेरा आहार होगा। यह बालक इसी काल में यहां आया है, ब्रह्मा ने इसे मेरे आहार रूप में ही भेजा है, इसे मैं नहीं छोड़ सकता। देवी ने कहा- ग्राहराज! मैं तुम्हें नमस्कार करती हूं। मैंने हिमालय की चोटी पर रहकर बड़ा तप किया है, उसी के बल से तुम इसे छोड़ दो। ग्राह ने कहा- तुमने जो उत्तम तप किया है, वह मुझे अर्पण कर दो तो मैं छोड़ दूं। पार्वती ने कहा- ग्राहराज! इस तप की तो बात ही क्या है, मैंने जन्म भर में जो कुछ भी पुण्य-संचय किया है, सब तुम्हें अर्पण करती हूं, तुम इस बालक को छोड़ दो। पार्वती के इतना कहते ही ग्राह का शरीर तप के तेज से चमक उठा। उसने कहा, देवी! तुमने यह क्या किया? जरा विचार तो करो। कितना कष्ट सहकर तुमने तप किया था और किस महान उद्देश्य से किया था। ऐसे तप का त्याग करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। तुम्हारी भक्ति और दीन सेवा से मैं बड़ा संतुष्ट हूं। तुम्हें वरदान देता हूं- तुम अपनी तपस्या भी वापस लो और इस बालक को भी! इस पर महाव्रता पार्वती ने कहा- ग्राहराज! प्राण देकर भी इस दीन बालक को बचाना मेरा कर्तव्य था। तप तो फिर भी हो जाएगा, पर यह बालक फिर कहां से आता? मैंने सब कुछ सोचकर ही बालक को बचाया है और तुम्हें तप दिया है। अब इस दी हुई वस्तु को मैं वापस नहीं ले सकती। तुम इस बालक को छोड़ दो। ग्राह यह बात सुनकर बालक को छोड़कर अंतर्धान हो गया। इधर, पार्वती ने अपना तप चला गया समझकर फिर से तप करने का विचार किया। तब शंकरजी ने प्रकट होकर कहा- देवी! बालक मैं था और ग्राह भी मैं ही था। तुम्हारी दया और त्याग देखने के लिए मैंने यह लीला की। दान के फलस्वरूप तुम्हारी तपस्या हजार गुनी होकर अक्षय हो गई है। (साभार : कल्याण सत‍्कथा)


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