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दिल्ली किसकी ?

Posted On February - 4 - 2020

हरीश लखेड़ा
संसद के बजट सत्र और संशोधित नागरिकता कानून (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ देशभर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच हो रहा दिल्ली विधानसभा का चुनाव सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रह गया है। यह चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के लिए प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। 20 साल से दिल्ली की सत्ता से बाहर भाजपा को सत्ता में लाने के लिए पार्टी के पूर्व अध्यक्ष व गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव की कमान संभाली है। प्रदेश में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) की ओर से मुख्यमंत्री केजरीवाल मार्चा संभाले हुए हैं। कांग्रेस के प्रत्याशी पार्टी हाईकमान की बजाय खुद के दम पर मैदान में हैं। इस सियासी जंग में मुख्यत: भाजपा, आप और कांग्रेस ही मैदान में दिख रहे हैं। हालांकि, बसपा समेत कई अन्य दल भी मैदान में हैं। 70 सीटों वाली विधानसभा के लिए कुल 668 उम्मीदवार भाग्य आजमा रहे हैं, जिसका फैसला 8 फरवरी को मतपेटियों में बंद हो जाएगा। 11 फरवरी को परिणाम आएंगे। प्रदेश के 1.47 करोड़ मतदाता इन प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।
यह चुनाव जन सरोकारों के मुद्दों की बजाय सीएए के विरोध में शाहीन बाग में जारी धरने के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा है। दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) की रणनीति थी कि वह अपनी सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बना देगी, लेकिन शाहीन बाग के धरने के कारण आप की रणनीति धरी रह गई है। चुनाव प्रचार में उतरे भाजपा नेताओं ने दिल्ली के पानी, स्कूलों समेत जन-सुविधाओं को लेकर इस तरह से आक्रामक प्रचार किया कि आप को चुनाव प्रचार में अब केजरीवाल के नेतृत्व को आगे रखना पड़ा है, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव मैदान में हैं। हालांकि, आप की यह रणनीति भी सफल होती नहीं दिख रही है। क्योंकि भाजपा शाहीन बाग, सीएए के मुद्दे को उठाकर चुनाव को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लाने में सफल होती दिख रही है। इसी रणनीति के तहत अब सियासी जंग में पीएम मोदी भी 2 रैलियां करने जा रहे हैं। पूर्व अध्यक्ष व गृहमंत्री अमित शाह, अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी के बड़े नेताओं की फौज मैदान में उतरी है। दिल्ली में देश के सभी राज्यों के लोग रहते हैं, ऐसे में भाजपा ने सभी प्रदेशों के नेताओं को दिल्ली चुनाव में प्रचार के लिए लगा दिया है। खासतौर पर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड के नेता भी प्रचार में लगे हैं।
दिल्ली में कांग्रेस और आप का वोट बैंक एक समान है। अन्ना आंदोलन के बाद कांग्रेस का वोट बैंक केजरीवाल के साथ आप में चले जाने से कांग्रेस का जनाधार कमजोर हो गया। भाजपा का मानना है कि दिल्ली में कांग्रेस के मजबूत होने पर ही उसे लाभ मिलेगा। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के मजबूत होने से आप तीसरे स्थान पर खिसक गई थी। लेकिन इस बार कांग्रेस हाईकमान की चुप्पी से पार्टी दमदार तरीके से मैदान में नहीं दिख रही है। इससे भाजपा चिंतित है। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस ने आप के लिए रास्ता साफ करने की रणनीति बनाई है। संभवत: यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका वाड्रा अब तक चुनाव प्रचार में नहीं दिखे हैं। दरअसल, कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष की कोशिश है कि इस चुनाव को भाजपा को हर हालत में जीतने न दिया जाए। इस रणनीति को समझते हुए भाजपा की भी कोशिश है कि चुनाव को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर केंद्रित किया जाए। भाजपा की इस रणनीति को शाहीन बाग के धरने से भी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद मिली है। माना जा रहा है कि शाहीन बाग का मामला जितना तूल पकड़ेगा, दिल्ली के चुनाव के धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ने की आशंका रहेगी। ध्रुवीकरण से भाजपा को लाभ की उम्मीद है। दरअसल, दिल्ली में मटिया महल, ओखला, सीलमपुर, मुस्तफाबाद जैसी सीटों समेत मात्र डेढ़ दर्जन सीटें ही ऐसी हैं, जहां मुसलिम मतदाता चुनावी फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। ध्रुवीकरण होने पर इसका असर सभी 70 सीटों पर होगा और भाजपा को इसमें अपनी उम्मीद लग रही है। माना जा रहा है कि इसी रणनीति के तहत उनके नेता अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा आदि नेता भड़काऊ बयान देते रहे हैं। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस पर मुख्यमंत्री के चेहरे के मामले में आप भारी पड़ती दिख रही है। क्योंकि ये दोनों दल बिना चेहरे के ही मैदान में हैं। दरअसल, आप के पक्ष में सबसे अहम बात यह है कि उसके पास मुख्यमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल जैसा चेहरा हैै। आप केजरीवाल सरकार की उपलब्धियों को लेकर चुनाव मैदान में है। इनमें मुफ्त बिजली व पानी तथा डीटीसी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा से लेकर मोहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने जैसी उपलब्धियां उसके पक्ष में हैं। इसके अलावा, केजरीवाल सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार व घोटाले जैसे बड़े आरोप नहीं हैं। हालांकि, दूसरी ओर आप की दिक्कतें भी कम नहीं हैं। एक तो उसके ज्यादातर विधायक फिर से चुनाव मैदान में हैं। इनमें से ज्यादातर विधायक अपने क्षेत्रों में एंटी इंकम्बैंसी का सामना कर रहे हैं। आप का पूरा चुनाव केजरीवाल पर केंद्रित है। यह अन्य नेताओं पर विकेंद्रित नहीं हो पा रहा है। दिल्ली के बुनियादी ढांचे को विस्तार देने के मामले में केजरीवाल सरकार अपनी पूर्ववर्ती शीला सरकार के सामने बौनी नजर आती है। शीला के कार्यकाल में दिल्ली में बड़ी संख्या में फ्लाईओवर बने, 6 नये विश्वविद्यालय खुले, जबकि केजरीवाल सरकार के दौरान यह क्षेत्र आगे नहीं बढ़ पाया। भाजपा के पक्ष में यह है कि मैदान में उसके ज्यादातर उम्मीदवारों के खिलाफ एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर नहीं है, क्योंकि 2015 में भाजपा के मात्र 3 विधायक ही चुने गए थे।
ऐसे में उसके ज्यादातर उम्मीदवारों को जनता के आक्रोश का सामना नहीं करना पड़ रहा है। भाजपा लगातार कह रही है कि दिल्ली में उसके सत्ता में आने पर केंद्र और राज्य के बीच तालमेल बढ़ेगा और प्रदेश का विकास तेजी से होगा। पिछले वर्षों के दौरान केंद्र और केजरीवाल सरकार के बीच कई मुद्दों पर टकराव दिखा। मामला यहां तक बढ़ गया था कि मुख्यमंत्री केजरीवाल व उनके कुछ मंत्री राजनिवास पर उपराज्यपाल के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे। हालांकि, भाजपा की मुश्किलें भी कम नहीं हैं। एक तो भाजपा बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के सियासी जंग लड़ रही है। इसलिए आप के नेता भी भाजपा की इस कमजोरी को पहचान कर उससे मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग कर रहे हैं। केंद्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद भाजपा दिल्ली के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पाई। अलबत्ता, अनाधिकृत कालोनियों को नियमित कर लोगों को रजिस्ट्री देने का जो काम किया गया, वह चुनाव से ठीक पहले हुआ। इसके अलावा, भाजपा में गुटबाजी भी है।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी, पूर्व अध्यक्ष विजय गोयल, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन, विजय गुप्ता जैसे नेता खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान रहे हैं।
दिल्ली में 15 साल राज कर चुकी कांग्रेस के पक्ष में यही है कि उसके प्रत्याशियों के खिलाफ एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर नहीं है, क्योंकि पिछली विधानसभा में उसका खाता तक नहीं खुल पाया था। कांग्रेस के पास चुनाव में लोगों को बताने के लिए शीला सरकार के 15 साल की उपलब्धियां हैं। हालांकि, कांग्रेस के सामने मुश्किलों के पहाड़ भी हैं। एक तो उसके पास अब शीला दीक्षित जैसा चेहरा नहीं है। भाजपा की तरह कांग्रेस भी बिना चेहरे के मैदान में है। चुनाव प्रचार की कमान थामे प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा और चुनाव प्रबंधन कमेटी के प्रमुख कीर्ति आजाद के बीच तालमेल नहीं बन पा रहा है। इसकी मुख्य वजह प्रदेश संगठन में व्याप्त गुटबाजी है। इसके अलावा, कांग्रेस हाईकमान ने अब तक चुनाव प्रचार के लिए पहल नहीं की है।

प्रदूषण से मुक्ति भी मुद्दा
इस चुनाव में महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए भी वादे किए जा रहे हैं। घोषणा-पत्र से पहले जारी गारंटी कार्ड में आप कह चुकी है कि दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के हर संभव प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए 2 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगेंगे। केजरीवाल कह चुके हैं कि यमुना को भी प्रदूषण से मुक्ति दिलाएंगे, जिससे 5 साल बाद यमुना में डुबकी लगाई जा सके। अब भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में कहा कि दिल्ली को जल और वायु प्रदूषण से मुक्त किया जाएगा। संकल्प पत्र जारी करते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मोदी सरकार के उठाए कदमों का जिक्र करने के साथ कहा कि नमामि गंगे योजना के तहत यमुना सफाई का काम भी शामिल किया है। अकेले यमुना के जल प्रदूषण पर 6 हजार करोड़ रुपये के 13 प्रॉजेक्ट्स मंजूर किए गए हैं। इन परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके अलावा, वायु प्रदूषण करने के लिए वेस्टर्न पेरिफेरियल और ईस्टर्न पेरिफेरियल के बाद 30 किमी द्वारका एक्सप्रेस हाईवे को अगले डेढ़ साल में पूरा करने का वादा किया है। दिल्ली-सहारनपुर रोड पर काम शुरू हो चुका है। ऐसे ही कई वादे भाजपा ने किए हैं।

बदल गए सियासी समीकरण
कभी दिल्ली की राजनीति में पंजाबी, जाट, गुर्जर और वैश्य समाज का दबदबा था। कुछ क्षेत्रों में मुसलिम भी शुरू से ही बहुमत में रहे हैं। लेकिन पिछले दो दशकों में दिल्ली की डेमोग्राफी में बड़ा बदलाव आया है। इससे सियासी समीकरण भी बदल गए हैं। अब पूर्वांचल और उत्तराखंड के लोग भी अब राजनीति में सक्रिय हैं। यहां हरियाणा, पंजाब और यूपी के साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र से लेकर प. बंगाल, केरल व पूर्वोत्तर राज्यों के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। इसलिए इन सभी को साधने की कोशिश में सियासी दल लगे हैं।

वादे बड़े-बड़े

आम आदमी पार्टी
आप चुनावी घोषणा-पत्र से पहले गारंटी कार्ड जारी कर चुकी है। इसमें उसने 10 वादे किए है। इसका नाम है ‘केजरीवाल का गारंटी कार्ड’। इसमें कहा गया है कि 200 यूनिट मुफ्त बिजली के साथ 24 घंटे बिजली मिलती रहेगी। मुफ्त 20 हजार लीटर पानी के साथ हर घर में 24 घंटे नल में शुद्ध पानी मिलेगा। दिल्ली में पैदा होने वाले हर बच्चे को ग्रैजुएशन तक अच्छी शिक्षा सरकार देगी। हर नागरिक को बेहतर और मुफ्त इलाज की गारंटी। महिलाओं को फ्री बस यात्रा अगले 5 साल भी मिलेगी। विद्यार्थियों को भी मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी।

भाजपा
भाजपा ने गरीबों को 2 रुपये प्रति किलो की दर से अच्छी गुणवत्ता वाला आटा, हर घर को स्वच्छ पानी देने का वादा किया है। भाजपा ने इसे संकल्प पत्र का नाम दिया है। इसमें आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की पहली 2 लड़कियों को उनके 21 साल के होने पर 2 लाख रुपये की मदद की बात कही है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की छात्राओं को मुफ्त इलेक्ट्रिक स्कूटी व 9वीं से 12वीं कक्षा तक की छात्राओं को मुफ्त साइकिल देने का वादा किया है। भाजपा ने गरीब विधवा महिलाओं को बेटी की शादी के लिए 51 हजार रुपये का विशेष उपहार देने का वादा किया है। इसी तरह, व्यापार और उद्योग को प्रोत्साहन 10 लाख व्यापारियों के दुकानों-दफ्तरों को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड कराने का वादा किया है।

कांग्रेस
कांग्रेस ने रविवार को अपने घोषणापत्र में 300 यूनिट तक बिजली फ्री देने, ग्रेजुएट युवाओं को 5 हजार और पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं को 7,500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने, महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण, कुल बजट का 25 प्रतिशत प्रदूषण नियंत्रण पर खर्च करने का वादा किया है। इसके अलावा, सत्ता में आने के 6 महीने में लोकपाल बिल लाने का वादा भी किया है।

नेताओं के बिगड़े बोल
विधानसभा के चुनाव प्रचार में नेता अपने विवादित बयानों पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। केंद्रीय मंत्री सहित कई भाजपा नेताओं के बयानों पर बवाल मच चुका है। शुरुआत हुई भाजपा नेता कपिल मिश्रा से। उन्होंने ट्वीट कर विधानसभा चुनाव को भारत और पाकिस्तान का मुकाबला बताया। चुनाव आयोग ने उन पर 48 घंटे के लिए प्रचार पर रोक लगा दी। केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने निठारी में अपने भाषण में नारा लगवाया-‘देश के गद्दारों को, गोली मारो…! समर्थकों ने इस नारेबाजी में आवाज धीमी रखी तो उन्होंने उनसे उसे जोर से लगाने को कहा। मंच पर एक और केंद्रीय पशुपालन व मत्स्य मंत्री गिरिराज सिंह भी बैठे हुए थे। यही नहीं भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा मर्यादा की सारी हदें लांघ गए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि इस चुनाव में शाहीनबाग में धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों को सबक नहीं सिखाया गया तो वे उनके घरों में घुसकर उनकी बहन-बेटियों से बलात्कार पर आमादा हो जायेंगे। उन्होंने केजरीवाल को आतंकवादी तक कह दिया। हालांकि चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को भाजपा के स्टार-प्रचारकों की सूची से बाहर करने का आदेश दिया।

मैं दिल्ली हूं
देश की आजादी के बाद दिल्ली को सी ग्रेड का राज्य बनाया गया था। 1952 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस सत्ता में आई। चौधरी ब्रह्मप्रकाश मुख्यमंत्री बने। हालांकि, उन्हें बीच में ही हटा किया गया और गुरुमुख निहाल सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। 1956 में विधानसभा को भंग कर दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। लंबे समय बाद 1966 में दिल्ली को महानगर परिषद दी गई। 1991 में दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित कर इस केंद्र शासित प्रदेश को 70 सदस्यों वाली विधानसभा दी गई। विधानसभा के पहले चुनाव 1993 में हुए और भाजपा के मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। हालांकि, हवाला में नाम आने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। खुराना के बाद साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री बने। तब प्याज के दाम आसमान छूने पर उन्हें भी हटा दिया गया और सुषमा स्वराज को कुर्सी सौंपी गई। 1998 में प्याज ने भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया। तब सत्ता में आई कांग्रेस की शीला दीक्षित लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं। इसके बाद, अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने 2013 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। वह 50 दिन भी नहीं चल पाई। वर्ष 2015 में आप ने सभी रिकार्ड तोड़कर 70 में से 67 सीटें जीत कर सरकार बनाई।


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