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जोश में एकता कपूर

Posted On February - 15 - 2020

सिल्वर स्क्रीन
ए. चक्रवर्ती
अभी हाल में प्रोड्यूसर एकता कपूर को पद्मश्री के सम्मान से नवाज़ा गया है। असल में जो लोग एकता के वर्किंग स्टाइल से वाकिफ हैं, उनका मानना है कि उन्हें यह सम्मान काफी पहले ही मिल जाना चाहिए था। पर एकता के चेहरे पर इसे लेकर कोई शिकवा-शिकायत नहीं है। वह कहती हैं, ‘निःसंदेह इस सम्मान के बाद और जोश महसूस कर रही हूं। पर किसी भी अवॉर्ड आदि को लेकर मैं ज्यादा नहीं सोचती।’इधर वह अपने बैनर बालाजी मोशन पिक्चर के परफार्मेंस से बहुत खुश हैं। वह बताती हैं, ‘असल में मैंने हमेशा अपने काम को एंज्वाॅय किया है। हमारे बैनर ने अब तक दो दर्जन से ज्यादा फिल्में बनाई हैं। अब तो हर साल कम से कम-से-कम तीन-चार फिल्में हमारा बैनर बना रहा है। ‘वन्स अपॉन ए टाइम’ इन मुंबई, डर्टी पिक्चर, रागिनी एमएसएस-2, एक विलेन, ड्रीमगर्ल जैसी फिल्मों की शानदार सफलता ने मुझे काफी हौसला दिया है। हम सारे बड़े प्राइवेट चैनल और दूरदर्शन के लिए लगातार नये सीरियल लेकर हाज़िर हो रहे हैं।’
एकता कहती हैं कि टीवी और फिल्म प्रोडक्शन, दोनों के बीच मैंने अब एक अच्छा संतुलन बना लिया है। इस समय भी मेरी आधी दर्जन फिल्में फ्लोर पर हैं। 2020 में हमारे होम प्रोडक्शन की कौन-कौन सी फिल्में रिलीज़ होंगी, उसकी भी लिस्ट बना ली है।

रंग जमा रही हैैं भोजपुरी फिल्में
इधर उत्तर भारत के कुछ थियेटरों में भोजपुरी फिल्मों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है। इनका टिकट रेट 30 और 70 रुपये भी भोजपुरी दर्शकों को खूब माफिक लगता है। अब जैसे कि प्रयागराज के दो थियेटर अजंता और मानसरोवर सिर्फ भोजपुरी फिल्में ही दिखाते हैं। लगभग बंद होने के कगार पर पहुंच चुके मानसरोवर थियेटर को भोजपुरी फिल्म ‘निरहुआ रिक्शावाला’ ने एक नया जीवनदान दिया था। इसके बाद से इस थियेटर ने सुपरहिट भोजपुरी फिल्मों को दोबारा दिखाना शुरू कर दिया। सच तो यह है कि आज मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे कई बड़े शहरों के सिंगल थियेटर सिर्फ भोजपुरी फिल्में दिखाकर अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। अजंता थियेटर के एक कर्मी रामलाल बताते हैं, ‘दिनेश लाल निरहुआ, पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, रवि किशन का अपना एक अलग क्रेज़ है। इनकी ज्यादातर फिल्में यहां आराम से दो-तीन हफ्ते चल जाती हैं। हाल-फिलहाल मिशन पाकिस्तान, इलाहाबाद नाम ही काफी है, तुम्हारे प्यार की कसम, दुश्मन सरहद पार के, वीर अर्जुन, वीरों का वीर, भाई, शेर सिंह, निरहुआ अनाड़ी आदि कई हिट फिल्मों की वजह से आए दिन थियेटर के माहौल में एक रौनक छायी रहती है।’ सांसद और अभिनेता रवि किशन मानते हैं कि भोेजपुरी फिल्मों ने उनके दम तोड़ते कॅरिअर में एक बहार ला दी थी। एक दूजे के लिए, रखवाला, दिलेर, सपूत, राखेला शान भोजपुरिया जवान, ‘बनारसवाली, वीर बलवान, दिल ले गयी ओढ़निया, रंग दे बसंती चोला, बनारसवाली, साली बड़ा स्टाइलीवी, गंगा जुमना सरस्वती, रखवाला, दिल हो गली कुर्बान, लक्ष्मण रेखा, बिहारी रिक्शावाला, रिक्शावाला आई लव यू, लहू के दो रंग, आंधी तूफान, सपूत, लावारिस, गंगा देवी, एक बिहारी सौ पर भारी आदि भोजपुरी फिल्मों ने मनोज तिवारी मृदुल, रवि किशन, दिनेशलाल यादव, खेसारी लाल यादव, पवन सिंह, वीरेंद्र मिश्र आदि के स्टारडम को एक मज़बूत आधार दिया है। रिंकू घोष, पिंकी चटर्जी, मोनालिसा, दिव्या देसाई, आम्रपाली शर्मा, पाखी हेगड़े जैसी चर्चित अभिनेत्रियां भी इन फिल्मों की देन हैं। 2004 से 2020 के इन सालों में 2200 के लगभग फिल्में बन चुकी हैं और कम-से-कम 150 भोजपुरी फिल्में निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं।

आशावादी हैं हिमेश रेशमिया
निंदक कुछ भी कहते रहें, संगीतकार और अभिनेता बराबर कुछ-न-कुछ करते रहते हैं। इन दिनों हिमेश रेशमिया राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘बैड बाॅय’ के संगीत को लेकर व्यस्त हैं। इसके साथ म्यूजिकल शो के जज के तौर पर उनका नज़र आना एक आम बात है। इधर उन्होंने अपने लुक में भी काफी बदलाव किया है। वह कहते हैं—इधर मैंने अपना वज़न काफी कम कर लिया है। हैवी वर्कआउट के साथ डायट को मेंटेन करके चल रहा हूं। अब जैसे कि बचपन में आइसक्रीम खाना मुझे बहुत पसंद था लेकिन इधर एक अरसे से आइसक्रीम की बात एकदम भूल गया हूं।’क्या इस बदलाव के पीछे सलमान की प्रेरणा काम कर रही है। इस पर उनका जवाब होता है,’बिल्कुल, यह उनके सुझाव का ही असर है कि इधर मैं एक्टिंग हो या म्यूजिक, बहुत ही सेलेक्टिव काम कर रहा हूं। संतोषी सर की बैड बॅाय के संगीत में मैंने बहुत मेहनत की है।’ पर उनके निंदकों की बात मानें तो उनके गाने सिर्फ आॅटोरिक्शा या डिस्को में बजते हैं? वह बताते हैं, ‘क्या आपने प्यार किया तो डरना क्या, हमराज, तेरे नाम, बाॅडीगार्ड आदि फिल्मों के गाने सुने हैं। इन फिल्मों के गाने बड़े लोगों के ड्राइंग रूम में भी बजते हैं। आशिक बनाया आपने, अक्सर या खिलाड़ी 786 फिल्मों के गाने डिस्को में बज सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ये गाने खराब हैं।’

‘पा’ के सीक्वल में दिखेंगे अभिषेक
अभिनेता अभिषेक बच्चन के फिल्मी करिअर ने एक नई करवट ली है। इस समय वह पांच फिल्मों को लेकर व्यस्त हैं। जिसमें से तीन फिल्में वह शाहरूख के बैनर के लिए कर रहे हैं। शाहरूख के बैनर की एक फिल्म बाॅब विश्वास इस साल ही रिलीज़ होगी। एक फिल्म ‘लूडो’ वह टी सीरीज़ के बैनर के लिए कर रहे हैं। अनुराग बसु निर्देशित यह फिल्म इस साल के मध्य में रिलीज़ होगी। खैर साल में एक या दो फिल्म करते-करते उन्होंने 20 साल का फिल्मी सफर तय कर लिया है। वह कहते हैं—मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं। दर्शकों का बेइंतहा प्यार मिला है। इसी वजह से इतने साल इंडस्ट्री में टिक पाया हूं। अभिषेक ने कुछेक सीक्वल फिल्मों में काम किया है। अब वह पा के सीक्वल का काम जल्द शुरू करेंगे। वह बताते हैं-यह फिल्म वाकई में मेरे लिए काफी अहम है। वह इस बात से भी इनकार करते हैं कि वह मीडिया से दूर रहते हैं। वह कहते हैं—मीडिया से मेरी कोई लड़ाई नहीं है।

तब्बू को नहीं चाहिये पोज़ीशन
हालिया फिल्म ‘जवानी जानेमन’ में फिर अभिनेत्री तब्बू के काम की सराहना हो रही है। उनकी फिल्में कैसी भी हों, वह हर फिल्म में लाजवाब एक्टिंग करती हैं। वह इन दिनों जुलाई में रिलीज़ होने वाली फिल्म ‘भूल भुलैया-2’ की शूटिंग कर रही हैं। तब्बू बताती हैं, ‘चाहकर भी मैं बहुत दिनों तक फिल्मों से दूर नहीं रह पाती हूं। अब तो लगातार मेरी फिल्मों की शूटिंग चल रही है। रोल भी अच्छे मिल रहे हैं। ‘भूल भुलैया-2’ का रोल काफी दमदार है। फिर इसमें कई नए आर्टिस्ट हैं। इसके निर्देशक अनीस बज्मी के साथ भी मैं काफी काम कर चुकी हूं। मेरे ख्याल से अपने बारे में विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है।’तब्बू के मुताबिक फिल्में साइन करने का उनका अपना अलग अंदाज़ है। वह कहती है, ‘एक फिल्म साइन करने का मतलब है, उसके प्रति आपको छह-सात माह तक समर्पित रहना। वैसे भी इधर हार्डकोर कमर्शियल सिनेमा से थोड़ा दूर जाकर मैंने कुछ फिल्में की हैं। मैं बाॅलीवुड की नायिकाओं के बीच अपनी जगह बनाने के लिए किसी रस्साकसी में नहीं उलझती। पोजि़शन, अवॉर्ड, लेबल मुझे इन सब चीज़ों की कोई चाहत नहीं है। यह सब फेक है। आप अपनी पोजि़शन खुद ही तैयार कर सकते हैं। मैं जितना भी काम करूं, उससे ही संतुष्ट हूं।’

‘असली कला खामोशी है’
70 के दशक के लोकप्रिय अभिनेता व निर्देशक अमोल पालेकर हाल ही में अपने एक नाटक ‘कसूर’ का मंचन करने चंडीगढ़ पहुंचे। इस मौके पर ‘बातों-बातों में’ उन्होंने सिटी ब्यूटीफुल के टेलेंटिड एक्टर आयुष्मान खुराना की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि आयुष्मान बहुत क्रिएटिव हैं और एक ऐसा अभिनेता है जो आम आदमी की जिंदगी को पर्दे पर आकर्षक तरीके से दिखाता है। उसकी यह रचनात्मकता ही लोगों को अपनी ओर खींचती है। ‘छोटी सी बात’ के अभिनेता ने कहा कि खामोशी या मौन की अपनी कला होती है। बता दें कि 70 के दशक में आम आदमी के किरदार को पर्दे पर जिस खूबसूरती से अमोल पालेकर ने जिया है, उसकी अमिट छाप लोगों के मन में अब तक है। उन्होंने फिल्म ‘गोलमाल’ में शुद्ध हिंदी बोलने वाले का किरदार निभाया था। 25 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद उन्होंने थियेटर में वापसी की है। ‘कसूर’ पिछले साल उनके 75वें जन्मदिन पर मंचित हुआ था। इसका मंचन और निर्देशन उन्होंने अपनी पत्नी संध्या गोखले के साथ मिलकर किया। इस नाटक में खासतौर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिलाया गया है। इतने अरसे बाद थियेटर में वापसी के मुद्दे पर ‘गोलमाल’ के अभिनेता ने कहा कि उन्हें बहुत फर्क महसूस नहीं हुआ, बल्कि उन्हें यह जानकर थोड़ा प्रेशर ज़रूर महसूस हो रहा था कि लोग बाहर कतार में उनका नाटक देखने के लिये इंतज़ार कर रहे हैं। एक दानिश फिल्म से इस (कसूर) नाटक को अडॉप्ट करने और इसे बनाने में आई चुनौतियों के बारे में बात करते हुए अमोल पालेकर ने कहा कि उनकी पत्नी संध्या ने उन्हें इसमें अभिनय के लिये चुना। उनके मुताबिक 90 मिनट के इस थ्रिलर में काम करने का मुश्किल काम देकर वह थियेटर में अमोल की वापसी की भी राह तैयार कर रही थीं। संध्या गोखले के मुताबिक लोग उन्हें ‘चेहरे पे चेहरा’ और ‘अपने -पराये’ जैसी फिल्मों के नायक के तौर पर जानते हैं। उनके अंदर छिपे उस मौन की कला के बारे में कोई नहीं जानता जो उनकी क्रिएटिवटी में झलकती है। अगर हम उनकी बनाई पेंटिंग्स को देखें तो वे उनमें सफेद रंगों का बहुत इस्तेमाल करते हैं। ठीक उसी तरह उनके क्रिएटिव प्रोसेस में खामोशी बहुत बड़ा रोल अदा करती है। अमोल किसी भी रचना में लेखक को सबसे बड़ा मानते हैं। किसी भी सीन में अगर ताली बजती है या दर्शक उसे पसंद करता है तो उसका श्रेय अमोल लेखक को देते हैं। उनका कहना है कि यह लेखक है जो इसे संभव बनाता है। वह कहते हैं कि हम एक अभिनेता की डायलॉग डिलीवरी और आवाज़ के लिए प्रशंसा करते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि असली ताकत एक अभिनेता के चुप रहने की कला है कि वह खामोशी को कितने अच्छे तरीके से होल्ड कर सकता है।


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