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जनतंत्र में असहमति के सुर भी सुनें

Posted On February - 13 - 2020

हरियाणा और झारखंड के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने यह माहौल बनाने की कोशिश की थी कि उसे मिले या दिये गये समर्थन का मतलब राष्ट्रभक्ति मान लिया जाये। आश्चर्य ही है कि राष्ट्र-भक्ति की इस परिभाषा को मतदाता द्वारा नकारे जाने के बावजूद दिल्ली विधानसभा के चुनावों में भी भाजपा ने अपनी यह टेक नहीं छोड़ी। परिणाम सामने है। दिल्ली के मतदाता ने भी आम आदमी पार्टी के ‘काम’ के दावे को भाजपा के राष्ट्रभक्ति के ‘फार्मूले’ से अधिक महत्वपूर्ण माना है। चुनाव-परिणाम अप्रत्याशित नहीं है, और ‘आप’ की घटी हुई सीटों पर भाजपा में दिल्ली के मतदाता के विश्वास की बढ़त नहीं माना जा सकता।
सच तो यह है कि भाजपा के नेतृत्व को यह सोचना पड़ेगा कि सबके विकास की बात करने और विकास करके दिखाने में अंतर होता है। हालांकि, सिर्फ दिल्ली के चुनाव-परिणाम के आधार पर यह कहना भी पूरा सही नहीं होगा कि देश का मतदाता राष्ट्र-भक्ति के भाजपा के फार्मूले को पूर्णतया नकार चुका है, फिर भी इससे यह संकेत तो मिल ही जाता है कि स्थिति वैसी नहीं है जैसी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व समझ रहा था। देखना यह है कि भाजपा इस संकेत का क्या अर्थ निकालती है।
जहां तक मतदाता की समझ का सवाल है, उसने अपनी राय साफ कर दी है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि भाजपा के अभियान को कोई प्रतिसाद नहीं मिला। देखा जाये तो ‘आप’ के काम और भाजपा के ‘शाहीन बाग’, दोनों पर मतदाता की नज़र रही है और भाजपा को जितनी सफलता मिली है, उसमें इस ‘शाहीन बाग’ का निश्चित हाथ रहा है। बड़ी सोची-समझी रणनीति के तहत भाजपा के नेतृत्व ने चुनाव-प्रचार के आखिरी दौर में कथित राष्ट्र-भक्ति वाला यह दांव चला था। देश के मंत्रियों, भाजपा-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और स्वयं प्रधानमंत्री ने मतदाताओं के ध्रुवीकरण का दांव चला था।
पिछले लगभग दो महीने से शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी, विशेषकर महिलाएं, नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध प्रदर्शन कर रही थीं। भाजपा के नेता तो इसके विरोध में बहुत कुछ बोल रहे थे, पर स्वयं प्रधानमंत्री ने एक रहस्यमय चुप्पी ओढ़ रखी थी। आखिरकार यह चुप्पी टूटी और उन्होंने ‘संयोग’ और ‘प्रयोग’ की आकर्षक शब्दावली में यह कहना ज़रूरी समझा कि ‘इसके (शाहीन बाग समेत देश की कई जगहों पर हो रहे प्रदर्शन के) पीछे की राजनीति का एक ऐसा डिज़ाइन है जो राष्ट्र के सौहार्द को खंडित करने के इरादे रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र-विरोधी ताकतें इस प्रदर्शन के पीछे हैं।
राष्ट्र-विरोधी ताकतों की यह बात हमारे प्रधानमंत्री पहले भी कहते रहे हैं। हरियाणा में हुए चुनाव के दौरान उन्होंने अपने प्रमुख राजनीतिक विरोधी दल और पाकिस्तान के बीच ‘कैमिस्ट्री’ की दुहाई दी थी। इसी तरह गुजरात के पिछले चुनावों के प्रचार के दौरान भी उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया था कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भाजपा को हराने की रणनीति बना रही है। सच तो यह है कि धर्म के आधार पर मतदाता को विभाजित करने की इस तरह की कोशिशें हमारी राजनीति का एक स्थायी भाव बनती जा रही हैं। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण भी है और खतरनाक भी। नागरिकता संशोधन कानून के संदर्भ में देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे आंदोलन को राष्ट्र-विरोधी गतिविधि कहकर न केवल अपने राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाया जा रहा है, बल्कि इस समूचे आंदोलन को, कहना चाहिए विरोध की आवाज़ को, कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।
होना तो यह चाहिए था कि इस जन-असंतोष को शांत करने के लिए भाजपा और सरकार, दोनों, ईमानदार कोशिश करते दिखाई देते, पर दिखा यह कि कोशिश असहमति की आवाज को दबा कर उसका राजनीतिक लाभ उठाने की हो रही है। भाजपा के नेताओं ने ‘शाहीन बाग’में, चल रहे आंदोलन को क्या-क्या नहीं कहा—इसे पाकिस्तान-समर्थक बताया गया, राष्ट्र-विरोधी घोषित किया गया, शहरी नक्सलियों की करतूत नाम दिया गया। दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर देशभर में कई जगहों पर होने वाले आंदोलन की यह एक विशेषता रही है कि इसे राजनीतिक दलों का समर्थन भले ही रहा हो, पर प्रदर्शनकारियों के हाथों में झंडा तिरंगा ही था। नारे वे संविधान की रक्षा के ही लगा रहे थे। स्वयं प्रदर्शनकारी ही अपने नेता थे।
जनता के वोटों से चुनी हुई सरकार का दायित्व बनता था कि वह जनता की इस आवाज़ को सुनती। समस्या के समाधान की दिशा में ईमानदार कोशिश करती दिखाई देती। आखिर एक कानून के प्रति अपने संदेहों का इज़हार ही तो कर रहे थे ये लोग। संदेह के निराकरण के बजाय, प्रदर्शनकारियों के इरादों पर सवालिया निशान लगाकर चुनावी लाभ उठाने की यह नीति जनतांत्रिक मूल्यों का नकार है। प्रधानमंत्री या गृहमंत्री न सही, सत्तारूढ़ पार्टी का कोई अन्य बड़ा नेता ही चला जाता प्रदर्शनकारियों को समझाने। आखिर वे देश के नागरिक ही तो हैं जो जनवरी की ठंडी रातों में खुले आसमान के नीचे अपनी चिंताओं की पोटली लेकर बैठे थे।
अब चुनाव बीत गये हैं। संभव है सरकार कुछ ठोस कार्रवाई करे। संभव है न्यायालय का हस्तक्षेप कुछ काम आये। संभव है ‘शाहीन बागों’ की विवशताओं को समझने की कोई सकारात्मक कोशिश हो। संभव है, समूची स्थिति के राजनीतिक नफे-नुकसान से उबरकर देखने की आवश्यकता किसी को लगे। पर नागरिकता संशोधन कानून के संदर्भ में देश में पिछले दो महीनों में जिस तरह नागरिकों की उपेक्षा हुई है, और जिस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे राजनीति की रोटियां सेंकने की कोशिश हुई है, वह जनतंत्र और जनतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना ही है।

विश्वनाथ सचदेव

प्रधानमंत्री ने यह तो ग़लत नहीं कहा कि यह एक ‘प्रयोग’ है, पर इस प्रयोग की उनकी समझ पर सवाल ज़रूर उठ सकते हैं। वस्तुत: इस समूचे आंदोलन को एक सकारात्मक जनतांत्रिक कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ग़लत तत्व ऐसी स्थितियों का ग़लत लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। पर इस आशंका में पूरे आंदोलन को नकार देने की प्रवृत्ति जनतांत्रिक कसौटियों के संदर्भ में एक चिंता की ही बात है।
देश की एकता को खतरा असहमति की आवाज़ या इस आवाज़ को उठाने वालों से नहीं है, खतरा उन प्रवृत्तियों और इरादों से है जो असहमति की आवाज़ उठाने के अधिकार को चुनौती दे रही हैं। आवश्यकता इन आवाज़ों को सुनने की है, इनके पीछे की चिंताओं के निराकरण की है। यह दुर्भाग्य ही है कि इस दिशा में अब तक कुछ ठोस होता दिखाई नहीं दिया। उम्मीद की जानी चाहिए कि असंतोष और संदेह को दबाने के बजाय हमारी सरकार और हमारे नेता जनता के जनतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के प्रति सजग होंगे। यह समझेंगे कि असहमति की आवाज़ जनतंत्र की ताकत होती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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