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एकदा

Posted On February - 18 - 2020

अपनी रौशनी
एक साधु के आश्रम में एक युवक बहुत समय से रह रहा था। फिर ऐसा संयोग आया कि युवक को आश्रम से विदा होना पड़ा। रात्रि का समय था और बाहर घना अंधेरा। युवक ने साधु से कहा— ‘रौशनी की कुछ व्यवस्था करने की कृपा करें।’ साधु ने एक दीया जलाया और युवक के हाथ में दे दिया। युवक को सीढ़ियों से उतारने के लिए साधु खुद उसके साथ हो लिया। जब वह सीढ़ियां और आश्रम का द्वार भी पार कर चुका तो साधु ने कहा कि अब मैं लौट जाऊं, क्योंकि इस जीवन के रास्ते पर बहुत दूर तक कोई किसी का साथ नहीं दे सकता है। अच्छा है कि मैं इसके पहले विदा हो जाऊं कि तुम हकीकत के आदी हो जाओ। इतना कहकर अंधेरी रात में साधु ने उसके हाथ के दीये को बुझा दिया। आश्चर्यचकित युवक बोला— ‘यह क्या बात हुई अभी तो हम आश्रम के बाहर भी नहीं निकल पाए, आपने साथ भी छोड़ दिया और दीया भी बुझा दिया।’ तब साधु ने कहा, ‘दूसरों के जलाए हुए दीपक का कोई मूल्य नहीं है। अपना ही दीया बनो तो अंधेरे में राह मिलेगी। किसी दूसरे का दीया काम नहीं देता।’
प्रस्तुति : सुभाष बुड़ावनवाला


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