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अर्श से फर्श पर

Posted On February - 17 - 2020

हरीश लखेड़ा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस लगातार दूसरी बार अपना खाता नहीं खोल पाई। यह लगातार तीसरा मौका है, जब कांग्रेस को राजधानी की जनता ने सिरे से नकार दिया। 2013 तक दिल्ली कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही और शीला दीक्षित लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं। लेकिन अब कांग्रेस अपने ही गढ़ में हाशिये पर चली गयी। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल की तरह यहां भी वह सिकुड़ गयी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस वोट प्रतिशत के मामले में दूसरे नंबर पर थी, लेकिन 8 महीने बाद विधानसभा चुनाव में उसके 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस को मात्र 4.26 फीसदी वोट मिले। सीट के मामले में वह लगातार दूसरी बार जीरो पर रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई है।
यह सच है कि दिल्ली के चुनाव में इस बार भी आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल का जादू चला और वे अपनी पार्टी को 62 सीटें जिता ले गए, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के चुनावी जंग में उतरने के बावजूद भाजपा दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। 70 में से भाजपा को मात्र 8 सीटें ही मिलीं। हालांकि, भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ।
देश की 135 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस की इस दुर्दशा के लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी जिम्मेदार है, क्योंकि कांग्रेस हाईकमान ने दिल्ली में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए चुनावी जंग से पार्टी को लगभग दूर कर लिया था। कांग्रेस की रणनीति से भाजपा तो हार गई, लेकिन उससे ज्यादा नुकसान उसे खुद को हुआ। वह हाशिये पर चली गई। इस करारी शिकस्त के लिए दिल्ली प्रदेश के नेता पार्टी हाईकमान को जिम्मेदार मान रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार बनाकर भाजपा को सत्ता से दूर रखने की रणनीति में सफल रही। पार्टी हाईकमान ने दिल्ली में यही प्रयोग आजमाया। इससे कांग्रेस चुनाव लड़ती नजर नहीं आयी। यदि कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ती तो दिल्ली में त्रिकोणीय संघर्ष होना तय था। ऐसे में लोकसभा चुनाव की तरह बाजी भाजपा के पक्ष में आने की आशंका कांग्रेस हाईकमान को थी। त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा दिल्ली की सभी 7 सीटें जीतने में सफल रही थीं, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व ने दिल्ली के प्रत्याशियों को उनके रहमो-करम पर छोड़ दिया। विधानसभा चुनाव के लिए घोषित पार्टी के 40 स्टार प्रचारकों में से 30 चुनाव प्रचार के लिए नहीं आये। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने भी अंतिम समय में प्रचार के नाम पर खानापूर्ति की। राहुल और प्रियंका ने मात्र 4 चुनावी रैलियां कीं। सोनिया गांधी की एक भी सभा नहीं हुई। इसके अलावा, कांग्रेस उम्मीदवारों को संसाधनों की भी कमी रही।
यही वजह है कि जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी को आशातीत विजय मिली तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने केजरीवाल को बधाई देने में देर नहीं की। कांग्रेस हाईकमान के इसी रवैये के कारण पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी व दिल्ली महिला कांग्रेस अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ट्वीट कर चिदंबरम से पूछा कि ‘क्या कांग्रेस ने भाजपा को पराजित करने का काम क्षेत्रीय दलों को आउटसोर्स कर दिया है? अगर ऐसा नहीं है तो हम अपनी करारी शिकस्त के बारे में चिंता करने की बजाय आम आदमी पार्टी की जीत पर खुशी क्यों मना रहे हैं? और अगर यह ‘हां’ है तो फिर हमें (पीसीसी) दुकान बंद कर देनी चाहिए।’
बहरहाल, कांग्रेस हाईकमान इस बात से ख्ाुश है कि दिल्ली में मोदी-शाह की जोड़ी विफल हो गई, लेकिन कांग्रेस यह नहीं समझ पा रही है कि उसे सियासी तौर पर कितना नुकसान हो चुका है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 22.5 प्रतिशत वोट मिले थे और उसने आप को तीसरे नंबर पर धकेल दिया था। तब दिल्ली में कांग्रेस के दोबारा मजबूत होने की संभावना जताई जाने लगी थी, लेकिन अब दिल्ली में भी कांग्रेस की स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी हो चुकी है। अब उसे लोकसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी की वैशाखियों की जरूरत पड़ेगी।
भाजपा भले ही कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती रही हो, लेकिन देशभर में अपनी इस खस्ता हालत के लिए कांग्रेस खुद भी जिम्मेदार है। कभी केंद्र और सभी राज्यों में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस अब मात्र उंगलियों पर गिने जाने वाले राज्यों तक सिमट गई है। पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पुड्डुचेरी में ही कांग्रेस की सरकारें हैं। झारखंड और महाराष्ट्र में वह गठबंधन के साथ सरकार में है। पूर्वोत्तर में एक भी राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस दूसरे दलों की कृपा पर राजनीति करने को विवश है। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में बसपा व सपा और बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल की पिछलग्गु बनने के कारण आज कांग्रेस इस हालत में पहुंच गई कि वहां उसके संगठन के नाम पर कुछ नहीं बचा है। 21वीं सदी में भी कांग्रेस अल्पसंख्यक, दलित वाली अपनी परंपरागत राजनीति करने से ऊपर नहीं उठ पा रही है। लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है। समाज में अब नये वोट बैंक उभर रहे हैं।
जनता की नब्ज पकड़ने में चूक
लंबे समय से देखा जा रहा हैै कि कांग्रेस आम जनता की नब्ज पकड़ने में नाकाम रही है। वह कई ऐसे मुद्दे उठा कर विवाद में पड़ जाती है, जिसे आम जनता पसंद नहीं करती। मसलन, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के मामले में कांग्रेस जनभावना के विपरीत दिखी। देश की अधिकतर आबादी इसे समाप्त करने के पक्ष में रही है। इसी तरह, कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना के हमले तथा उससे पहले आतंकी संगठनों पर सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल पूछने वालों के साथ खड़ी दिखी। इस मुद्दे पर खुद कांग्रेस भी बंटी नजर आयी। यही वजह है कि इन मुद्दों पर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा समेत कई वरिष्ठ नेताओं को पार्टी हाईकमान से अलग लाइन लेनी पड़ी। इसी तरह जेएनयू में जब ‘आजादी’ और ‘देश के टुकड़े-टुकड़े’ करने के नारे लगे तो कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी वहां चले गये। जिसे जन सामान्य ने पसंद नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम मंदिर मामले की सुनवाई 2019 के बाद करने की दलील भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व वकील कपिल सिब्बल ने ही दी थी। हालांकि, अब यह मामला सुलझ चुका है।
वास्तव में कांग्रेस विचारधारा के मामले में भटकती दिख रही है। कांग्रेस अब वामपंथी विचारधारा के करीब ज्यादा दिखती है। कुछ समय पहले राहुल गांधी से ‘दैनिक ट्रिब्यून’ ने इस पर सवाल किया तो वे इससे बचते नजर आये। दरअसल, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ ने राहुल गांधी से पूछा था कि कांग्रेस अब गांधी की विचारधारा की बजाय लेफ्ट सेंट्रिक ज्यादा लगती है। ऐसे में कांग्रेस भाजपा और संघ की विचारधारा से कैसे लड़ पाएगी? इस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को संघर्ष करना आता है।
लेकिन, कांग्रेस के लिए इस सवाल से बचना आसान नहीं है। एक ओर संघ का आक्रामक हिंदुत्व है और इसके झंडाबरदार नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी है। दूसरी ओर, कांग्रेस गांधी का नाम भर लेती है। चुनाव के समय मंदिर-मस्जिद जाकर धर्मनिरपेक्षता की इतिश्री मान लेती है। वैसे भी ज्यादा लंबा समय नहीं हुआ है, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पार्टी 2014 का चुनाव इसलिए हारी कि वह हिंदुत्व के खिलाफ जाती दिखी थी। उसके बाद भी कांग्रेस ने अपनी विचारधारा को गांधी के निकट लाने की कोशिश नहीं की। वह अब भी अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के रास्ते पर ज्यादा दिखती है। कांग्रेस नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर उसकी दुविधा साफ दिखती है। कांग्रेस के कई नेता इस मामले में पार्टी लाइन से अलग बोल चुके हैं।
पार्टी में ही घमासान
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार बनाने के बाद लग रहा था कि कांग्रेस मजबूत हो रही है। लेकिन दिल्ली के नतीजों ने कांग्रेस की इस उम्मीद को धुंधला कर दिया है। दिल्ली की करारी हार के बाद पार्टी में असंतोष के सुर तेज हो गये हैं। इस्तीफा दे चुके पार्टी के प्रदेश प्रभारी पीसी चाको ने हार के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर शीला दीक्षित को िजम्मेदार ठहरा दिया था। वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल कह चुके हैं कि पार्टी के पास दिल्ली में मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने के लिए चेहरे की कमी रही। अब देखना यह है कि कांग्रेस किस तरह खुद को खड़ा करती है।
संसद में भी कमजोर
कांग्रेस की स्वीकार्यता देशभर में कम होने का असर संसद में भी दिखने लगा है। राजीव गांधी के समय लोकसभा की 400 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब दहाई के आंकड़े पर सिमट गयी है। संसद में भी कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है। लोकसभा में उसे विपक्ष के नेता का दर्जा भी नहीं मिल पाया। लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा पाने के लिए सभी विपक्षी दलों में सबसे बड़ा दल होना चाहिए और उसके सदस्यों की संख्या सदन के कुल 543 सदस्यों की 10 फीसदी होनी चाहिए। कांग्रेस 16वीं लोकसभा की तरह 17वीं लोकसभा में भी यह आंकड़ा छूने में नाकाम रही। इस बार लोकसभा में कांग्रेस के 52 सदस्य हैं, जबकि 2014 में वह 44 सीटों पर सिमट गई थी। राज्यसभा में भी उसका आंकड़ा लगातार घट रहा है। राज्यसभा में कांग्रेस के 46 सदस्य हैं, जबकि भाजपा के 82 सदस्य हैं।
गठबंधन की बैसाखी
दिल्ली विधानसभा के चुनाव से यह बात साफ हो गयी कि कांग्रेस अब मानने लगी है कि भाजपा को हराना उसके अकेले के बस का काम नहीं है। दिल्ली के चुनाव में खुद ही हाशिये पर जाकर उसने केजरीवाल के लिए विजय मार्ग प्रशस्त किया। यह वही कांग्रेस है, जिसने लोकसभा में बहुमत नहीं मिलने पर गठबंधन सरकार बनाने की बजाय बाहर से समर्थन देकर दूसरे दलों की सरकारें बनायी थीं। एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल कांग्रेस की इसी नीति के चलते प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे। हालांकि, पीवी नरसिंह राव सांसदों के दलबदल अथवा खरीद-फरोख्त के बाद सरकार चलाने में सफल रहे थे। कांग्रेस ने 1998 के पचमढ़ी चिंतन शिविर में गठबंधन की राजनीति करने की बजाय पार्टी को मजबूत करने का संकल्प दोहराया। तब पार्टी ने खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में संगठन को मजबूत करने का संकल्प लिया था। हालांकि, इसके बाद बेंगलुरू सम्मेलन में कांग्रेस ने कहा कि वह गठबंधन की राजनीति करने पर विचार कर रही है। इसके बाद, 2003 के शिमला शिविर में कांग्रेस ने कहा कि वह गठबंधन की राजनीति के लिए तैयार है, लेकिन शर्त यह है कि विपक्षी दलों को सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार करना होगा। वर्ष 2004 में ऐसे हालात बने कि कांग्रेस नेतृत्व में केंद्र में यूपीए की सरकार बनी, जो लगातार 10 साल तक रही। लेकिन गठबंधन की राजनीति करने से कांग्रेस राज्यों में सिमटती चली गई। हालात यह हो गए हैं कि कई प्रदेशों में कांग्रेस से निकले नेताओं ने अपनी पार्टियां बनाकर खुद को वहां स्थापित कर लिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और तेलंगाना में जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस इसके उदाहरण हैं। कांग्रेस तमिलनाडु में द्रमुक, महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल, झारखंड में शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ मिलकर गठंबधन राजनीति करती रही है। यूपी में भी उसके ऐसे ही हालात हैं। यानी कांग्रेस अब उस लता की तरह हो गई है, जो बिना पेड़ के सहारे ऊपर नहीं चढ़ पाती।
नेतृत्व का संकट
कांग्रेस के सामने विचारधारा के साथ ही नेतृत्व का संकट भी है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबीयत अब खराब रहती है, जबकि राहुल गांधी ‘रणछोड़’ साबित हो रहे हैं। कांग्रेस को अप्रैल तक नया अध्यक्ष चुनना है, लेकिन राहुल गांधी अब भी पार्टी की कमान थामने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने पार्टी महासचिव प्रियंका वाड्रा ही एक विकल्प हैं। राहुल दिसंबर 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद उन्होंने 25 मई 2019 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस्तीफे की पेशकश कर दी। उन्हें मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं और कांग्रेस को फिर से पार्टी की कमान सोनिया गांधी को सौंपनी पड़ी। राहुल कहते रहे कि नेहरू-गांधी परिवार के बाहर के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाएगा। माना जाता है कि कांग्रेस अब बिना नेहरू-गांधी परिवार के चलना भूल गयी है। राहुल को लेकर यह भी कहा जाता है कि वे कठिन दौर में संघर्ष करने की बजाय मैदान छोड़कर भाग जाते हैं। यूपीए-2 के समय उन्हें केंद्र में मंत्री बनाने की बात चली, लेकिन वे नहीं बने। यह भी माना जा रहा था कि सोनिया के बाद लोकसभा में वे ही कांग्रेस संसदीय दल के नेता बनेंगे, लेकिन यह भी नहीं हुआ। वे अब भी पार्टी के ताकतवर नेता हैं, लेकिन वे जिम्मेदारी लेने से कतरा रहे हैं!
बुजुर्ग नेताओं का सहारा
कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत करने की भी है। पार्टी संगठन में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग नेता हैं, जिन्हें पदों पर कम से कम 2 या 3 दशक हो चुके हैं। जबकि भाजपा में ऐसे बुजुर्ग नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में रखा गया है। कांग्रेस कार्यसमिति और संगठन में काबिज यह पुरानी पीढ़ी अब भी संगठन को पुराने ढर्रे पर चला रही है। कहा जाता है कि इन बुजुर्ग नेताओं की यथास्थितिवादी सोच के कारण ही राहुल गांधी संगठन में मनमुताबिक फेरबदल नहीं कर पाए, इसलिए अब कांग्रेस दो गुटों में बंटी है। एक ओर पुराने व बुजुर्ग नेता हैं, जो सोनिया को पार्टी अध्यक्ष बनाये रखने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, युवा पीढ़ी है, जो बदलाव चाहती है और राहुल के पीछे खड़ी है। हालांकि, पार्टी में अब एक ऐसा वर्ग भी उभरने लगा है, जो प्रियंका वाड्रा के पीछे खड़ा हो गया है। कांग्रेस में जारी इस खींचतान के कारण फैसले भी देरी से होते हैं। इसका उदाहरण, हरियाणा और दिल्ली विधानसभा में देखने को मिला।


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