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अंजाम

Posted On February - 16 - 2020

बाल कहानी

इंद्रजीत कौशिक
‘आओ गुनगुन, चलो चलकर कहीं खाना तलाश करें।’ दूसरे मच्छरों ने अपने साथी गुनगुन मच्छर से कहा तो उसने सर हिला दिया।
‘मुझे कहीं नहीं जाना, तुम्हें जाना है तो जाओ मुझे मत डिस्टर्ब करो।’ गुनगुन ने रूखे स्वर में उत्तर दिया।
‘लगता है तुम्हारा पेट भरा हुआ है। हमें तो भाई भूख लगी है, हमें तो जाना ही होगा।’ यह कहकर बाकी मच्छर खाने की तलाश में उड़ चले।
‘मुझे भी भूख लगी है, कुछ मेरे लिए भी लेकर आना।’ गुनगुन बोला।
‘मूर्खों जैसी बातें मत करो, हमें मिलकर ही इनसान को खोजना होगा, जिसे काटकर हम लोग अपना पेट भर सकें।’ मच्छर बोले, ‘तुम्हारे जैसा आलसी हमने आज तक नहीं देखा।’ ‘मैं आलसी जरूर हूं , पर मूर्ख नहीं जैसे तुम सब लोग।’ कहकर गुनगुन ने जोर का ठहाका लगाया।
असल में बात यह थी कि गुनगुन खुद को बुद्धिमान समझता था और बाकी सभी को अव्वल दर्जे का बुद्धू और मूर्ख। उसकी नजर में मेहनत करके पेट भरा तो क्या भरा। ‘भला यह भी कोई बात हुई कि मारे मारे इधर-उधर भटकते रहो, फिर किसी इनसान को ढूंढ कर उसको काटो खून पियो, तब जाकर अपना पेट भरो।’
निठल्ले बैठे रहने से आज तक किसी का पेट भरा है जो गुनगुन का भरता? उसके साथी मच्छर मेहनत करके अपना खाना पीना करके लौट आए तब तक गुनगुन वहीं बैठा ख्याली पुलाव पकाता मिला। अब तक तो भूख के मारे गुनगुन के पेट में चूहे भी कूदने लगे थे। इसके बावजूद आलसी होने के कारण गुनगुन कहीं जाने को तैयार न था। दिन ढला रात हो गई। गुनगुन की आंखों में नींद का नाम न था। थक हार कर गुनगुन को भोजन की तलाश में उड़कर जाना ही पड़ा।
ज्यादातर मनुष्य मच्छरदानियां लगाकर उसके भीतर सो रहे थे। अब गुनगुन उनके भीतर कैसे जा पाता? बड़ी मुश्किल से एक लड़का सोता हुआ मिला, जिसके पांव पर काटकर गुनगुन ने खून पिया तब जाकर उसका पेट भरा और उसकी जान में जान आई। पेट भरा तो गुनगुन वहीं एक मच्छरदानी के ऊपर जाकर बैठ गया। आधी रात के समय मच्छरदानी के भीतर सोया हुआ लड़का पानी पीने के लिए उठा तो मौका पाकर गुनगुन मच्छरदानी के भीतर जा घुसा और कहीं छुप गया। थोड़ी देर में वह लड़का वापस मच्छरदानी के भीतर घुस कर सो गया। जब उसे नींद आ गई तो गुनगुन ने मौका पाकर उसे काट लिया। मच्छर के काटने से लड़का जाग गया। ‘लगता है मच्छरदानी के भीतर कोई मच्छर घुस आया है। मुझे ढूंढ कर उसे बाहर निकालना होगा नहीं तो यह दुष्ट मुझे सारी रात सोने नहीं देगा।’
बड़ी मुश्किल से गुनगुन वहां से जान बचाकर भागा। भीतर किसी मच्छर को ना पाकर लड़का वापस निश्चिंत होकर सो गया। ‘कल से मैं मच्छरदानी के भीतर पहले से ही जाकर छिप जाऊंगा और जब लड़का सो जाएगा, उसे काट कर अपना पेट आराम से भर लिया करूंगा। दूसरे मच्छरों की तरह मुझे कम से कम यहां से वहां भोजन की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा।’ ‘ऐसी बेवकूफी हरगिज़ मत करना वरना लेने के देने पड़ जाएंगे मेरे भाई।’ गुनगुन का आइडिया सुन कर दूसरे मच्छरों ने उसे समझाया। ‘मेहनत से बचने के लिए अगर तुम ऐसा सोच रहे हो तो यह तुम्हारी भूल है।’
‘मुझे उपदेश सुनने की आदत नहीं है, तुम सब लोग मेरी बुद्धिमानी से जलते हो, इसलिए ऐसा कह रहे हो।’
‘जब बैठे बिठाए भोजन पानी मिल रहा है तो फिर यहां से वहां भटकते फिरने का क्या फायदा?’ गुस्से में भरकर गुनगुन बोला तो मजबूर होकर दूसरे मच्छरों को उसे छोड़कर जाना ही पड़ा। इस बार जब रात हुई तो गुनगुन एक लड़के की मच्छरदानी के भीतर पहले से ही घुसकर छुप गया। इसके बाद जब लड़का आया और उसे नींद आई तो गुनगुन ने उसे कई जगहों पर काटा। कच्ची नींद टूटने से लड़के को बहुत क्रोध आया। गुस्से मे आकर उसने मच्छरदानी के भीतर घुसे हुए मच्छर को ढूंढ ही निकाला और फिर उसे मार भी डाला। यह मच्छर कोई और नहीं बल्कि गुनगुन ही था। आलस के चलते मेहनत से बचने के लिए गुनगुन ने जो सरल रास्ता चुना था, उसकी परिणति आखिरकार वही हुई, जिसका उसके साथी मच्छरों को डर था।
‘काश, हमारा प्यारा साथी गुनगुन हमारी सलाह मान लेता तो उसकी यह दशा नहीं होती। रोजी -रोटी कमाने के लिए हर किसी को मेहनत करनी ही पड़ती है, यह बात गुनगुन मान लेता तो उसे अपनी जान न गंवानी पड़ती।’ उसके साथी मच्छरों ने अपने प्रिय गुनगुन की मौत पर दुख मनाते हुए कहा। पर अब क्या हो सकता था?


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