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71वें गणतन्त्र की चुनौतियां

Posted On January - 26 - 2020

रमेश नैयर
देश की 130 करोड़ की जनसंख्या में मेरे जैसे एकाध प्रतिशत ही लोग बचे होंगे, जिन्होंने भारत विभाजन की त्रासदी को भोगा था। पीढ़ियों की संचित संपदा को खोकर किसी तरह जान बचा कर अपना वतन हमेशा के लिए छोड़ा होगा। दर-दर की ठोकरें खाई होंगी। यदि बंटे हुए भारत का पूर्वी पंजाब न होता तो हमें शरण भी कहां मिलती? कुछ ऐसा ही हाल पूर्वी पंजाब के मुसलमानों का भी हुआ। लेकिन शेष भारत में गांधी- नेहरू के कारण मुसलमान सुरक्षित रहे।
पंजाब के दोनों तरफ कत्लों गारत का जुनूनी दौर चला। मोटे अनुमान के अनुसार 10 लाख से ज्यादा हिंदू-सिख और मुसलमान मारे गए। लेकिन 20वीं सदी की बेहद विकराल त्रासदी के एक भुक्तभोगी के नाते यह तथ्य बताना ज़रूरी है कि दोनों तरफ अगर बर्बर उन्मादी थे तो कुछ नेक दिल इन्सान भी थे।
संक्षेप में यह बता देना ठीक होगा कि लाहौर यूनिवर्सिटी से स्नातक मेरे पिता को आशंका थी कि देश का विभाज़न होगा। बहुत समझाने पर भी दादी और उनके भाई शाह जी नहीं समझे कि ऐसा हो सकता है। उनका तर्क था कि राजा भले ही बदलते रहते हैं, परंतु जनता तो नहीं बदलती। हताश पिता मेरी मां और छोटे भाई को साथ लेकर फिरोज़पुर चले गए। दादी ने मुझे अपने पास रख लिया। शाह जी के मुनीम कालू खां और मेरा लालन पालन करने वाली जैनम ने भरोसा दिलाया कि वे मेरा पूरा ख्याल रखेंगे। उन्होंने रखा भी। लेकिन सभी इतने भाग्यशाली नहीं थे। हम भी तो सिर्फ जान बचाकर खाली हाथ भागे थे।
सीएए का विरोध
आज जब चारों तरफ नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का उग्र विरोध हो रहा है। पहले यह विरोध मुस्लिमों तक सीमित था। अब इसमें अन्य वर्गों के युवाओं के साथ ही महिलाएं भी शामिल हो रही हैं। जो उग्र विरोध पूर्वोत्तर के राज्यों तक सीमित था अब उसका अन्य राज्यों में भी विस्तार हो गया है।
दरअसल नागरिकता संबंधी दोनों कदम केन्द्र सरकार ने कुछ जल्दबाज़ी में उठाए। जो बातें विस्तार से संसद में कही जानी चाहिए थीं, वे नहीं कही गई। नतीजा यह हुआ कि अफवाहों का बाज़ार गर्म हो गया। जो उग्र आंदोलन कश्मीर तक सीमित था वह देश व्यापी विस्तार लेता गया। दिल्ली के जामिया, मिलिया इस्लामिया से शाहीन बाग तक विशाल धरना चल रहा है। बड़ी संख्या में युवा विद्यार्थी उसमें शिरकत कर रहे हैं।
आंदोलन में राजनीति
हालात इसलिए भी उलझ रहे हैं कि आंदोलन में राजनीति भी कूद पड़ी है। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां सी.ए.ए. के विरोधियों के पक्ष में सक्रिय हो गई हैं। उनके विपरीत भारतीय जनता पार्टी लोगों को यह समझाने में जुटी है कि ये दोनों प्रावधान किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों को नागरिकता देने के लिए है जो पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। ताज़ा खबरों के अनुसार उत्तर पूर्व के असम एवं अन्य राज्यों में 30 हजार से अधिक हिंदुओं और बौद्धों को शरण भी दी गई है।
नागरिकता संबंधी कानूनी प्रावधानों की पहल के समय केन्द्र सरकार से बड़ी गलती यह हुई कि उसने मुस्लिमों को छोड़कर पाकिस्तान के हिंदू, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई, पारसी तथा कुछ और अल्पसंख्यकों को भारत में शरण देने की बात कही। यह प्रावधान इस दृष्टि से सही था कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सर्वाधिक असुरक्षित हिंदू और बौद्ध हैं। ईसाईयों को वहां ज्यादा खतरा इसलिए नहीं है कि वे उन मुल्कों में मेहत्तर और अन्य सफाई कर्मियों का काम करते हैं । पाकिस्तान में कादियानी समुदाय को भी ज़लालत और असुरक्षा में रहना पड़ता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि राष्ट्र संघ में कश्मीर पर पाकिस्तान की पैरवी बहुत जोरदार ढंग से करने में शोहरत पाने वाले सर जफरउल्लाह कादियानी मुस्लिम थे।
बहुत सारे उदाहारण हैं जो इस मिथक को तोड़ते हैं कि दुनिया भर में मुसलमानों में अटूट एकता है। ईरान-इराक में लगभग एक दशक तक चले युद्ध भी इस कटु सच की पुष्टि करते हैं। पाकिस्तान की जो खस्ता माली हालत है उसका एक कारण वहां विकास की तुलना में फौज पर ज्यादा खर्च करना है। खुद पाकिस्तानी प्रबुद्ध वर्ग भी इस पर कटाक्ष करते हुए कहता है, ‘पाकिस्तान दीयां मौजा ही मौजां, जिधर देखो फौजा ही फौजां।’
मुद्दे और भी हैं
सामाजिक-सांप्रदायिक मेल-मिलाप भारत की बड़ी शक्ति है, उसे कायम रखना चाहिए। उसमें दरारें डालने वाले असद्ददीन ओवैसी और साक्षी महाराज दोनों को संयत रखने की जिम्मेदारी पूरे भारत की है। एन.आई.ए. को लेकर कांग्रेस क्षुब्ध है। छत्तीसगढ़ सहित चार कांग्रेस शासित राज्य उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे चुके हैं। इधर एक अच्छा संकेत यह भी है कि नागरिकता से बंधे मामले में केन्द्र सरकार का रूख कुछ नर्म पड़ रहा है। आतंकवाद देश-समाज के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। तालिबान से जुड़े तमाम संगठनों के अलावा माओवादी भी देश की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक है। भ्रष्ट राजनीति और नौकरशाह भी कम ख़तरनाक नहीं। कश्मीर में पले, बढ़े और पढ़े देविंदर सिंह सहित कुछ सुरक्षा अधिकारियों से पूछताछ में पता चला कि वे धन तथा देह सुख के लिए देश की कितनी गोपनीय जानकारी दुश्मनों को दे रहे थे। इन सबके दृष्टिगत सर्वोच्च प्राथमिकता देश की सुरक्षा को दी जानी चाहिए। उसके लिए ज़रूरी है कि न कहीं दरारें पैदा हों, न बांटने वाली दीवारें खड़ी की जाएं।’
नई चुनौतियों के बीच नयी सुरक्षा रणनीति
पाकिस्तान की साजिशों से देश के लिए जो खतरे पैदा हुए हैं, उन्होंने भारत सरकार के कान खड़े कर दिए हैं। वह समय रहते पुख्ता मोर्चाबंदी में जुट गई है। इसका संकेत सुरक्षा व्यवस्था का चाक-चौबंद बनाने के लिए उठाए गए दो बड़े फैसलों से मिला है। सुरक्षा बलों की एकीकृत कमान बनाने के ध्येय से थलसेना, वायुसेना और जलसेना के एक प्रमुख का पद निर्मित किया गया है। सुरक्षा प्रमुख के सहयोगी के रूप में सेना के डिप्टी चीफ (स्ट्रेटजी) का पद सृजित किया गया है। सुरक्षा से जुड़ी रणनीति तय करने के प्रमुख की आवश्यकता डोकलाम में 73 दिनों तक चीन की चीनी फौजों के बीच मुकाबिल भारतीय सुरक्षा बलों की तैनाती के समय इस पद के सृजन की आवश्यकता अनुभव बड़ी गई।
बेरोज़गारी बड़ा मुद्दा
आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत है रोज़गार के नये अवसर पैदा करने की। कटु सत्य यह है कि, 2018 में 16 लाख नौकरियां कम हो गई। दर्दनाक सच यह भी है भारत में हर 40 मिनट में एक युवा आत्महत्या कर रहा है। बेरोज़गारी और आर्थिक तंगी के कारण 2018 में रोज़ाना औसतन 36 युवकों ने आत्महत्या की। इतना ही संतापकारी सच यह है कि, मध्य वर्ग के शिक्षित युवा अमेरिका और अनेक यूरोपीय देशों में नौकरियां कर रहे हैं। क्या यह प्रतिभा का पलायन नहीं है ?


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