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सात हिंदुस्तानी से फाल्के तक

Posted On January - 4 - 2020

सुनील मिश्र
चार राष्ट्रीय पुरस्कारों के बाद भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े और सम्मानजनक अवॉर्ड दादा साहब फाल्के सम्मान से सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन को सम्मानित किया जाना, वास्तव में भारतीय सिनेमा के गौरव का अभिनन्दन है। अपने आप में यह सुखद आभासित करता है। वे हमारे समय के सबसे अधिक सक्रिय, श्रेष्ठ कलाकार हैं। उनकी सक्रियता आज के समय में हर उस आयाम में दिखायी पड़ती है जो बुजुर्गों और प्रौढ़ों से ज्यादा युवाओं और बच्चों का है। वे नियम-संयम से ब्लाॅग लिखते हैं, समय-समय पर एक जिम्मेदार मनुष्य की तरह ट्वीट करते हैं और समानान्तर सक्रियता के साथ फेसबुक पर भी मिला करते हैं। पिछले अनेक वर्षों से वे निरन्तर अपने दर्शकों के साथ जीवन्त सम्पर्क में हैं। जो लोग उनको चाहते हैं, उन तक पहुंचने के अनेक मार्गों से होकर अमिताभ बच्चन उन तक जाते हैं। वे हर रविवार, यदि मुम्बई में हुए तो अपने चाहने वाले हजारों दर्शकों से शाम को घर के बाहर आकर मिलते हैं। एक प्रतिबद्ध अभिनेता, एक कुलीन और अनेकानेक अनुभवों वाला यह कलाकार कितनी ही उपलब्धियों में हमें नज़र आता है।
पांच दशक से सिनेमा का प्रभावी हिस्सा
अमिताभ बच्चन 50 से अधिक वर्षों से हमारे सिनेमा का एक बड़ा और प्रभावी हिस्सा हैं। वे ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिन्दुस्तानी में से एक हिन्दुस्तानी की तरह परदे पर आते हैं और उस फिल्म के दृश्यों में हम जब भी उनको देखते हैं, आज भी, तो हमें इस बात का संकेत मिलता है कि वे एक ऐसी आमद की तरह दिखते हैं जो केन्द्र में आकर अपने विस्तार की भूमि गढ़ने का बस इन्तज़ार कर रही है। ‘जंजीर’ और ‘दीवार एक वक्त की फिल्में हैं जहां उनके पटकथा लेखक सलीम-जावेद उन पर उस दौर के एक आकर्षक नायक और दर्शकों का बड़ा समूह तैयार करने में जुटे हैं। एक बार सलीम खान से बात करते हुए सुना था कि किस तरह जंजीर के नायक के लिए वे प्रकाश मेहरा के सामने अमिताभ बच्चन को परिचित कराते हैं, किस तरह जया बच्चन (भादुड़ी) को वे एक अपेक्षाकृत नये और उनसे कम लोकप्रिय हीरो के साथ काम करने के लिए प्रेरित अथवा सहमत कराते हैं। सिनेमा के ही वरिष्ठ आलोचक विनोद भारद्वाज ने एक बार मुम्बई में प्रेस वालों को डाॅ. धर्मवीर भारती के सान्निध्य में दिखायी गयी जंजीर फिल्म के प्रदर्शन को याद किया था, जिसमें अमिताभ बच्चन बड़े ही शिष्टाचार के साथ सबको बैठने के लिए कह रहे थे।
समय को गहराई से जिया
एक लम्बी यात्रा है और अमिताभ बच्चन जिस तरह के कलाकार हैं, उन पर अनेक बार बड़े जानकारों ने लिखा है। उन पर किताबें लिखी गयी हैं। बल्कि लगभग उन सभी ने लिखी हैं जो समय-समय पर उनके साथ रहे हैं, आसपास रहे हैं। अच्छे सम्बन्धों के साथ भी रहे हैं और सम्बन्धों के उतार-चढ़ावों में भी। उन पर सकारात्मक कहा और लिखा गया है, नकारात्मक भी। इतने लम्बे समय में एक जानलेवा दुर्घटना का शिकार होने के साथ-साथ अनेक बार गम्भीर बीमारियों से भी वे जूझते और जीतते रहे हैं। वे पत्रकारों से बात नहीं करने का निर्णय लेने वाले और उस पर सालों अडिग बने रहने वाले व्यक्ति भी हैं और ‘कुली’ की दुर्घटना के बाद ठीक होने पर पत्रकारों के साथ सारे गिले-शिकवे भूल-भुलाकर फिर जुड़ने वाले भी। उत्थान और पतन के समय को एक मनुष्य के रूप में जितनी गम्भीरता, धीरज और गहराई से उन्होंने जिया है, वह अपने आप में मिसाल हैं। एक समय में अनेक पाली में काम करते हुए खासे व्यस्त बने रहने वाले अमिताभ बच्चन ने पचास की उम्र के आसपास पांच साल फिल्में ही छोड़ दी थीं।
मृत्युदाता के साथ उनकी वापसी पर आलोचक जैसे कलम में धार किए बैठे थे और अमिताभ बच्चन 5 साल में अपने छूटे रियाज़ को एक बार फिर गति पर लाने के लिए समय ले रहे थे। समय-समय पर उन्होंने अपनी मनःस्थिति पर, भीतर चल रहे द्वन्द्व पर, अपने आसपास, लोगों के साथ बने रहने और दूर हो जाने पर कहा और लिखा भी है। वे यह जानते थे, जानते हैं कि वे हर दौर के नायक नहीं हो सकते लेकिन यह हुनर उन्होंने अपनी क्षमता और दक्षता से ही थामा कि कैसे हर पीढ़ी से जुड़े रहा जा सकता है, कैसे हर उम्र से मैत्री की जा सकती है!
एक बातचीत में उनकी यह बात बहुत मार्मिक लगी थी, जिसमें वे बताते हैं कि किस तरह एक दिन दोपहर को अपने घर के आंगन में बैठे हुए स्लीपर पहने वे पैदल ही यश चोपड़ा के घर चले जाते हैं और कहते हैं कि आपके साथ फिर काम करने की इच्छा है और किस तरह यश चोपड़ा जो उस समय इत्तेफाक से कोई नई फिल्म नहीं बना रहे होते, अपने बेटे आदित्य चोपड़ा को उनसे मिलवाते हैं और इस तरह ‘मोहब्बतें’ फिल्म की भूमिका उनको प्राप्त होती है।
दादा साहेब फाल्के तक का सफर
‘मोहब्बतें’ से यात्रा फिर अनवरत है। अमिताभ बच्चन फिल्में करते चले जाते हैं। शायद वे अच्छी तरह जान गये होते हैं कि यह फिल्म पीछे के अन्तराल को पाटने का एक संयोग है, वे इसी संयोग से उपलब्धियों को और अधिक विस्तार देने वाले पथ पर चल पड़ते हैं। पथ से स्मरण हो आता है अग्निपथ का, जिसके लिए उनको अपने जीवन का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार 1990 में मिला था। मुकुल एस आनंद निर्देशित इस फिल्म की भी आलोचकों ने खूब आलोचना की थी, विशेषकर अमिताभ बच्चन के संवाद और आवाज़ को लेकर किए गये प्रयोग को लेकर लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार ने इस महानायक की क्षमताओं के अतिरेक की एक तरह से दाद दी, उन्हें प्रोत्साहित किया। 2005 में अमिताभ बच्चन को दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाने वाली फिल्म ‘ब्लैक’ थी, जिसे संजय लीला भंसाली ने बनाया था। इस फिल्म में उन्होंने फिर एक चुनौतीपूर्ण भूमिका को निभाया था जो उनकी तथा रानी मुखर्जी के यादगार अभिनय का स्मरण कराती है। ब्लैक का देबराज साहनी दरअसल एक युद्ध लड़ता है अपने जीवन से, उस युद्ध की जीत, उस युद्ध की हार है यह फिल्म।
असाधारण क्षमताओं के धनी
अमिताभ बच्चन के लिए यदि यह कहा जाये कि वे एक ऐसे कलाकार हैं जो अपने किरदार के भीतर घर बनाकर रहने लगता है तो शायद अतिशयोक्ति न हो। वे किरदार को काया मानते हुए उसमें अपनी असाधारण क्षमताओं के साथ प्रवेश कर जाते हैं और उस फिल्म के पूरा होने तक भीतर ही अपना घर बनाकर रहते हैं। वे भीतर कोने-कोने में जाते हैं। गहराई से समझते हैं। किरदार की काया में ही भीतर वे मन को मन से देखते हैं, आंख को आंख से, वे किरदार के भीतर वैसा ही विस्तार लेते हैं जैसे देह में आत्मा या सांचे में फैलकर प्रतिमा। आर बाल्कि की फिल्म ‘पा’ में 2009 में तीसरी बार इस गौरव को प्राप्त करने वाले महानायक को चरित्र के साथ देखते हुए शायद सभी अचम्भित रह गये थे, सभी ने कहा था, विलक्षण। जैसे समय में तकनीकी या चरित्रसंगत बड़े प्रयोगधर्मी जोखिम उठाना हिन्दी सिनेमा के लिए चुनौती बने हुए हों, ऐसे समय में पा में अमिताभ बच्चन को आरो के चरित्र में देखना चकित कर देता है।
कृतज्ञता का भाव
‘पीकू’ के भास्कर बैनर्जी को देखना तो और भी दिलचस्प है! उम्र, अकेलेपन, बीमारियों और टेलीविजन में दिखायी देने वाले आधुनिक समाज ने इस इनसान को जैसे सदैव के लिए सशंकित, अपने लिए असुरक्षित और ऐसी ही अनुभूतियों में ऐसा स्वार्थी बना दिया है जो बच्चे की तरह जिद्दी है और किस तरह अपनी फिक्र की जा सकती है, उस संज्ञान से भरपूर भी। बेटी के साथ उसका रिश्ता, उसकी बेचैनी, कोलकाता के पुश्तैनी घर में जाने की ललक और पेट की आम बीमारी को असाध्य बीमारी बनाकर उससे लगभग रोमांस किए रहने की स्थितियों को अमिताभ बच्चन ही बखूबी पेश कर सकते थे। पीकू का खूब पसन्द किया जाना भी कम रोचक नहीं। जीवनशैली और युवाओं की जिन्दगी में व्यापी स्वेच्छाचारिता और उदारता के बीच पा में दर्शकों का निरन्तर बने रहना और पसन्द करना कमाल है। शूजीत सरकार की यह फिल्म मनोरंजक होने के साथ-साथ अमिताभ बच्चन के लिए मील का पत्थर है। इसके आगे ‘बदला’ फिल्म तक आते-आते अमिताभ बच्चन स्वयं अपनी परिपक्वता को चुनौती देते हैं कई बार। इस बार कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए उनके व्यक्तित्व में कृतज्ञता का एक और उदार स्वरूप देखने को मिला। वे दर्शकों और अपने चाहने वालों की प्रतिक्रियाओं को जितने बड़प्पन और धीरज के साथ सहते-स्वीकारते हैं वह अनूठा है।
रिटायरमेंट नहीं
अमिताभ बच्चन पुरस्कारों और अवॉर्डों के उस सारे जवां दौर को पार करते हुए यहां तक आये हैं जब जंजीर, दीवार, अभिमान, आनंद, नमक हराम, शोले, त्रिशूल, कभी-कभी, सिलसिला, कस्में वादे, बरसात की एक रात, जुर्माना, बेमिसाल, महान, नास्तिक, शान, कालिया, आखिरी रास्ता, डाॅन, दोस्ताना जैसी कितनी ही फिल्मों में लिए वे मान-सम्मान और पुरस्कारों के लिए मंच को चार चांद लगाया करते थे। अब हम उनको इस दौर में यशस्वी सम्मानों के बीच देखते हैं, चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार उनको तीन साल पहले मिला। और हाल ही में वे भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित हुए। अमिताभ बच्चन अब बड़े और महान सम्मानों को ग्रहण करते हुए बहुत विनम्र और धीरज के साथ अपने मन की बात व्यक्त करते हैं। यह सम्मान आने वाले समय में उनकी भूमिका को और अधिक जिम्मेदार और अधिक उत्तरदायी बनायेगा, यह कामना की जाती है। इस अवसर पर उनका वह कथन याद करना दिलचस्प होगा जो उन्होंने इस अवॉर्ड की घोषणा के समय कहा था कि क्या मैं रिटायर हो गया हूं जो यह सम्मान मुझे दिया जा रहा है! यह अचरज उनका स्वयं का ही रचा हुआ है क्योंकि वे रिटायरमेंट की आदर्श उम्र को कभी के फर्लांग चुके हैं। वे स्वयं ही अपने वक्तव्य का खारिज हैं। अवॉर्ड प्राप्त करने के बाद जो उन्होंने कहा, वह हमारे लिए ज्यादा आशाजनक है और वह यह कि अभी कुछ और किया जाना बाकी है। सच है बच्चन साहब, अब इतनी उपलब्धियों के बाद एक असाधारण कीर्तिमान लिखा जाना बाकी है जो पिछले सारे असाधारणों से उच्च कोटि का होगा।


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