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सच्ची दोस्त हैं किताबें

Posted On January - 12 - 2020

काजल कपूर

कभी मेरी गिनती पढ़ाखू लड़की के तौर पर होती थी। भागमभाग, खेलकूद और प्रतिस्पर्धा से अलहदा भी मेरी एक दुनिया थी। वह दुनिया थी किताबों में रचबस जाने की। हालांकि यह वह दौर था जब हमारे घर में या हाथों में मोबाइल की जगह नहीं थी। तब घर में किसी के पास स्मार्टफोन नहीं था, सिवाय पापा के। बातचीत लैंडलाइन से ही होती थी। मैं 11वीं की छात्रा थी और मेडिकल स्टूडेंट को कितना पढ़ना होता है, सब जानते हैं। तब मेरा सपना था डॉक्टर बनना। एक साल तक केवल मेडिकल की कोचिंग इसीलिये ली थी कि एंट्रेस पास कर पाउंगी। तब किताबों से खूब दोस्ती हो गई थी। खाने के अलावा मेरे पास केवल किताबों के लिये वक्त था। न कोई सहेली थी, न कोई साथी। कोचिंग के बावजूद मेरा एंट्रेस नहीं निकल पाया। यह मेरे लिये किसी सपने के टूटने के समान था। इससे भी अधिक बुरा वक्त वह था जब मैंने अपनी प्रिय दोस्त किताबों से भी नाता खत्म कर लिया। अब मुझे पढ़ने की इच्छा नहीं होती थी। किताबें खोलने का मन भी नहीं होता था। अंदरखाते यह बात सताती रहती कि मैं डॉक्टर नहीं बन पाऊंगी। अब घर का एक कमरा और किचन, यही मेरा दायरा हो गया। न किसी से बातचीत, न घर से बाहर जाना। फिर परिवार वालों ने मुझे कॉलेज में एडमिशन दिला दिया। करीब डेढ़ साल बाद घर से बाहर जाने लगी। दोस्त बने, थोड़ी बातचीत होने लगी। मेरी उदासी और खामोशी के बारे में दोस्त पूछते तो मैं हल्का मुस्कुरा देती। इन सबके बीच मेरे एक दोस्त गर्ग आचार्या, ने मुझसे कई बार मेरे गुमसुम रहने का कारण पूछा। मैंने उसे बताया कि मेरा डॉक्टर बनने का सपना टूटा तो मुझे किताबों से भी लगाव नहीं रहा। तब मेरे दोस्त ने मुझे समझाया कि तुम्हारा सपना टूटना नहीं, किताबों से दूर होना ही तुम्हारी उदासी का कारण है। उसने मुझे पाठ्यक्रम के अलावा बाकी किताबें पढ़ने की सलाह दी। उसने कहा-किताब तो किताब है, फिर चाहे वह नॉवेल हो या पाठ्य पुस्तक, जिसमें रुचि आये वही पढ़ना शुरू करो। वह मुझे बुक्स लाकर देने लगा। मैंने नये सिरे से अपने किताबों के प्रति प्रेम को पहचाना। करीब 2 साल बाद आज फिर से किताबें मेरी मित्र बन गई हैं। इसका कोई न कोई पन्ना मुझे कोई न कोई सीख ज़रूर देता है। मेरा मानना है कि बुरे वक्त में भी किताबें हमारी साथी हैं। ये हमें सकारात्मक ऊर्जा देती हैं।


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