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शाबाश चिंटू

Posted On January - 19 - 2020

बाल कहानी

राजेंद्र श्रीवास्तव
विद्यालय में क्रिसमस की शीतकालीन छुट्टियां चल रही थीं। चिंंटू कई दिनों से कुछ नया करने की जुगत लगा रहा था, लेकिन कुछ सूझ नहीं रहा था। वह कुछ अच्छा करना चाहता था। कुछ ऐसा कि जो देखे वही कहे – ‘शाबाश चिंटू!’
जो सुने वही कहे- ‘वाह चिंटू वाह.. !’
लेकिन दस साल के उस छोटे चिंटू की छोटी सी बुद्धि भी काम नहीं कर रही थी। करे तो क्या करे?
आज भी यही सब सोचते-सोचते वह अपने गांव के बाहर आ गया। उसका गांव छोटी सी पहाड़ी की ढलान पर था। गांव से जरा सी दूरी पर ही रेल की पटरियां बिछी थीं। जिन पर दिन में कई बार अनेक रेलगाड़ियां छुक-छुक, छुक-छुक कर दौड़ती रहतीं। रविवार या छुट्टी के दिन चिंटू ढलान पर बैठ कर इन आती-जाती रेलगाड़ियों को देखता और खुश होता। कभी-कभी मौज में आकर खुद ही अकेला मुंह से छुक-छुक की आवाज करता दौड़ लगा देता। खुद ही इंजन बन जाता और खुद ही डिब्बा। खुद ही ड्राइवर बन जाता और खुद ही लाल, हरी झंडी दिखाने वाला गार्ड। पिताजी ने बताया था कि पहले भाप के इंजन थे, तब गाड़ियां ढेर सारा धुआं उगलते हुए दौड़ती थी। अब तो इन गाड़ियों के इंजन डीजल या बिजली से चलते हैं। कैसे काम करता होगा इंजन? उसके मन में यह जिज्ञासा अभी भी बनी हुई है।
रेलगाड़ी में कितने लोग बैठते होंगे? उसने खुद से ही सवाल किया। जबाब देने के लिए आसपास कोई दूसरा था ही नहीं। सवाल भी खुद से किया था तो जबाब भी खुद को देना था। उसने कहा ‘सैकड़ों-हजारों।’
काश एक साथ इतने लोगों को कोई खुशी दे सकूं। उसके उत्साह का हिरण फिर कुलांचें मारने लगा।
अचानक उसकी बुद्धि काम कर गयी। ट्रेन के आने में अभी लगभग घंटे-भर का समय था। वह दौड़ा-दौड़ा घर पहुंचा। घर में एक पुरानी कटी-फटी पतंग पड़ी हुई थी। धागा ज्यादा लम्बा नहीं था, लेकिन जितना था उसकी जरूरत के हिसाब से बहुत था।
उसने उस पर एक सफेद कागज चिपका कर नया रूप दे दिया। पुराने रंगीन कागज को सावधानी से निकाल कर घर के कूड़ेदान में डाल दिया। एक गत्ते के चौकोर टुकड़े पर भी सफेद कागज चिपका लिया और पीछे की ओर बीच में पतली डंडी चिपका कर तख्ती बना ली। अब जरूरत थी स्केच पेन की। एक डिब्बे में वह भी मिल गये। वह खुश हो गया। अब उसने पतंग पर और तख्ती पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ लिखा और फिर पतंग सहित उसी ढलान पर पहुंच गया।
ट्रेन के आने का समय हो चुका था। ढलान पर उगे वृक्षों के पत्ते मंद पवन में हिल-डुल रहे थे। मानो पूछ रहे हों कि— ‘चिंटू जी अब आप क्या करने वाले हैं? और इस तख्ती व पतंग पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा क्या है??’ उसने ढलान पर पटरियों से कुछ दूरी पर वह तख्ती इतनी ऊंचाई पर लगा दी कि सब नहीं तो कुछ रेल यात्री तो उसको पढ़ ही सकें।
फिर चिंटू ने अपनी पंतग के धागे को छूट दे दी। एक -दो प्रयास के बाद पतंग हवा में निश्चित ऊंचाई पर ठहर कर अपनी पूंछ हिलाने लगी। अब पतंग रेल की पटरियों से इतनी दूर और इतनी ऊंचाई पर थी कि खिड़कियों के पास बैठे यात्री पतंग पर लिखे शब्द को आसानी से पढ़ सकें। ट्रेन सीटी बजाते हुए धीमी गति से छुक-छुक करते हुए पतंग के पास आयी तो चिंटू को लगा मानो उसके संदेश को पढ़ कर ड्राइवर के साथ-साथ इंजन भी मुस्करा रहा है। कुछ यात्री भी हाथ हिलाकर उसका अभिवादन स्वीकार कर रहे थे, और उसका हौसला बढ़ा रहे थे। उत्साह में चिंटू अब पतंग पर लिखे संदेश को जोर-जोर से ऊंची आवाज में चिल्ला कर यात्रियों तक पहुंचाने की कोशिश करने लगा। संदेश में बड़े-बड़े अक्षरों में केवल दो शब्द लिखे थे-
‘नमस्कार’ ,
‘शुभ-यात्रा’
ट्रेन के आखिरी डिब्बे के दरवाजे पर खड़े गार्ड ने भी वह संदेश पढ़ा-
‘नमस्कार, शुभ-यात्रा।’
उसने हाथ हिलाकर पहले चिंटू का अभिवादन स्वीकार किया। फिर थम्स-अप की मुद्रा बनाकर उसके इस काम के लिए शाबाशी भी दी।
इंजन ने भी जाते-जाते विशेष अंदाज में सीटी बजायी। मानो कह रहा हो- ‘शाबाश चिंटू, शाबाश।’
चिंटू खुशी-खुशी अब घर वापस आ रहा था।
जैसा वह कई दिनों से चाह रहा था वह आज हो गया।
उसका यह छोटा सा बिना दाम का काम आज कुछ लोगों के चेहरे पर मुस्कान दे गया।


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