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मेलों-ठेलों में मिले ग्रीन कार्ड

Posted On January - 15 - 2020

यश गोयल

आसमान छूती महंगी प्याज गली-मोहल्लों में अभी तक सब्जी के ठेलों पर बिकने आई ही नहीं कि उससे पहले ‘ग्रीन कार्ड ले लो’ की आवाज़ आने लगी है। जब भी कोई उत्पाद सस्ता होता है तो वो वस्तु ठेले पर बिकने लगती है। ऐसा ही सरोकार है इस ग्रीन कार्ड से जिसका देसी भक्त समर्थन कर रहे है तो बाकी विरोधी सब सड़कों और गांधी पार्क्स में जन आंदोलन कर रहे हैं। नागरिकता इतनी सस्ती हो गयी है कि प्रधानमंत्री से लेकर होम मिनिस्टर तक गलियों-गलियों, पंचायत स्तर पर ग्रीन कार्ड देने के आश्वासन दे रहे हैं। वो भी मुफ्त में। डंके की चोट पर।
अमेरिका में एच-1-बी पर रह रहे बेटे को कॉल पर कहा कि बेटे जल्दी आ जाओ, बच्चों सहित पहले भारतीय ग्रीन कार्ड ले लो, बाद में यूएसए का ग्रीन कार्ड ले लेना। अभी तो उसमें कम से कम दस साल लगने हैं ? सुनकर उसने स्माइली मोजी का चेहरा बनाया तो मैंने समझाया-बेटा सत्ताधारी दल के मंत्री और पार्टी के नेता शहर-शहर, गांव-गांव सच्ची नागरिकता देने का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि ले लो नागरिकता। एनआरसी और एनआरपी कराना जरूरी है। ये किसी भी देश के ग्रीन कार्ड से कम नहीं होगा।
डैडी, ये इलेक्शन फंडा है, वोट बटोरने का। हमारे देश ने दशकों से चले आ रहे ‘ब्रेन ड्रेन’ को तो रोका नहीं। किसी भी सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया। इस नई शताब्दी में भी कोई इस पर बात नहीं करता बल्कि ट्रंप से हैंडशेक कर कहते हैं कि भारतीयों के लिये एच-1-बी को सिम्पलीफाई करो। जॉब्स कहां हैं भारत में? इंडिया के ग्रीन कार्ड से किसका भला होगा? बेटे ने मोबाइल से मेरा स्क्रीन शॉट लेते हुए फिर पूछा, इंडिया में तो इकोनोमिक रेसेश्न चल रहा है! वर्कर्स का ले ऑफ हो रहा है। क्या करेगा कोई ऐसी चुनावी नागरिकता लेकर? सोशियल सिक्योरिटी और पर्सनल डॉटा तक तो वहां असुरक्षित है!
घर की डोरबेल बजी है। खूब सारे प्रचारक गली में सुबह से घर-घर आ-जा रहे हैं। हाथों में बैनर लिये कार्यकर्ता और प्रचार प्रमुख बोले, ‘प्रोफसर साहब (नेमप्लेट पढ़कर), हम हमारे प्रधानमंत्री और ग़ृह मंत्री का संदेश देने आये हैं कि नागरिकता कानून जिसका गजट नोटिफिकेशन भी हो गया है वो सिटिजनशिप देने का कानून है। वापस लेने का नहीं है! विपक्ष के बहकावे में मत आना।’
‘आप लोग ये सब इस पॉश कॉलोनी में क्यों बता रहे हैं। न ही मैं कोई रिफ्यूजी ऑर पाक का विस्थापित नागरिक हूं। मैं भारतीय था, हूं।’ कहकर मैं लौटने लगा तो वो बोले, ‘रुकिये प्रोफेसर जी। आप तो शायद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं, स्टूडेंट को बताइयेगा। और आप लोगों के भव्य बंगलों के पीछे जो कॉलोनियां हैं वहां कच्ची बस्तियां हैं उन्हें आप जैसे पढ़े-लिखे प्रोफेसर ही तो समझायेंगे कि ये एक्ट कितना कारगर है। सबका साथ, सबका विकास।’


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