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माइंड गेम की गुगली

Posted On January - 20 - 2020

रोहित महाजन
विफलता का भय, करिअर खत्म होने की आशंका और जीवन की अनिश्चितता। हम सब इन चीजों को महसूस करते हैं। लेकिन क्या भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली जैसी शख्सियतें भी ऐसा महसूस करती हैं? वे कहते हैं कि वे भी ऐसा ही अनुभव करते हैं। वास्तव में वे हमसे ज्यादा इसे महसूस करते हैं, क्योंकि वे उपलब्धि और दंड प्रणाली के उस उच्च स्तर से गुजरते हैं, जो जीवन में सफलता या विफलता को नियंत्रित करती है।
यहां तक कि मैदान में सदा मुस्कुराते दिखाई देने वाले करोड़पति और साहसिक ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ग्लेन मैक्सवेल भी चिंता से ग्रस्त हैं। उनके लिए अच्छी बात यह रही है कि वे ऐसे समय में है, जब इस विषय पर बात करने में शर्मिंदगी महसूस नहीं की जाती, बल्कि इसके कारण और निदानों पर गौर किया जाता है। 12 साल पहले, ऑस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज शॉन टैट, जिनसे दुनियाभर के बल्लेबाज खौफजदा रहते थे, वे भी खेल के इस मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाए थे। जनवरी 2008 में भारत के खिलाफ पर्थ टेस्ट मैच में उन्हें दोबारा ऑस्ट्रेलियाई टीम में मौका दिया गया। पिच काफी बांउस वाली थी। टैट के पास काफी तेज गति से गेंद फेंकने की क्षमता थी। इससे पहले, सिडनी मैच में मैदान पर अति-आक्रामकता वाले व्यवहार की आलोचनाओं के बाद कंगारुओं पर पर्थ में छवि सुधारने का दबाव भी था। पर्थ टेस्ट में माना जा रहा था कि टैट अपनी तेज गेंदों से भारतीय बल्लेबाजी को धवस्त कर देंगे। उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं। लेकिन टैट विफल रहे। उन्होंने न केवल बहुत ज्यादा रन लुटाए, बल्कि कोई विकेट भी नहीं ले पाए। नतीजा यह हुआ कि भारत यह टेस्ट जीत गया। टैट ऑस्ट्रेलियाई टीम से बाहर हो गए और फिर दोबारा टेस्ट मैच नहीं खेले। टैट का कहना है कि क्रिकेट से ब्रेक लेना थोड़ा डराने वाला था। मानसिक रूप से मजबूत नहीं होने के कारण ‘कायर’ कह कर उनकी आलोचना हुई थी। उनका कहना है कि उस वक्त आज जैसा लचीलापन नहीं था।

वीबी चंद्रशेखर
भारत की ओर से 7 एक दिवसीय मैच खेले वीबी चंद्रशेखर ने पिछले साल आत्महत्या कर ली

तब और अब
आज का माहौल उस समय से अलग है, जब मैक्सवेल, निक मैंडिंसन और विल पुकोवस्की ने मानसिक स्वास्थ्य कारणों से खेल से कुछ समय के लिए ब्रेक लिया तो उनके लिए आई ज्यादातर प्रतिक्रियाएं सहानुभूति दिखाने वाली थीं, न कि उपहास उड़ाने वाली। एक क्रिकेटर को विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अतिसंवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इस खेल में अति-सोच की संभावना अधिक होती है। एक बल्लेबाज को अपनी बल्लेबाजी के लिए घंटे या फिर कई दिन तक भी इंतजार करना पड़ सकता है। इस दौरान उसके दिमाग में यह सब चलता रहता है कि जाने भाग्य में क्या है? शायद एक अचूक पहली गेंद पर ही वह आउट न हो जाए?
क्रिकेट और अन्य खेलों के खिलाड़ियों के मन में अपने प्रदर्शन को लेकर काफी बोझ होता है, जिससे अवसाद एवं ‘स्व-हानि’ वाली स्थिति बनती है। इसे लेकर आंकड़े सुलभ नहीं हैं या फिर सटीक नहीं हैं, किंतु आम धारणा है कि क्रिकेटरों पर दबाव कहीं ज्यादा होता है।
डेविड फ्रिथ ने क्रिकेट खिलाड़ियों में आत्महत्या को लेकर अध्ययन किया है और इस विषय पर दो किताबें प्रकाशित की हैं। उनका कहना है कि क्रिकेटरों में ‘आत्म-विनाश’ की राह पर जाने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है, क्योंकि यह खेल जिस मात्रा में समर्पण भरे दिनों की अपेक्षा एक खिलाड़ी से रखता है, उससे दिमाग पर बहुत ज्यादा दबाव बन जाता है, जो एक खिलाड़ी के आत्मविश्वास को डांवाडोल करने के लिए काफी है। फ्रिथ स्वीकार करते हैं कि ज्यादातर क्रिकेटरों की आत्महत्या के पीछे भले ही क्रिकेट तात्कालिक कारण न भी हो फिर भी अधिकांश मामलों में गिरते मानसिक स्वास्थ्य के पीछे टीम से बाहर होने पर आर्थिक तंगी की संभावना, दिमाग को शांत रखने के लिए नशे का सहारा लेने से खुद को न रोक पाना, विवाहिक कलह या यौन समस्या, भविष्य की अनिश्चितता को लेकर बनता भाव इत्यादि उसके दिमाग में रासायनिक द्रव्य संतुलन बिगाड़ने का सबब बनते है।
आत्महत्याओं के मामले में वे कहते हैं कि खुदकुशी करने वाले अधिकतर श्वेत एंग्लो-सैक्सन हैं, लेकिन भारतीय भी इससे इतर नहीं हैं। भारत की ओर से 7 एक दिवसीय मैचों में खेलने वाले वीबी चंद्रशेखर ने 2019 में आत्महत्या कर ली थी। इस सिलसिले में भारत के लिए वर्ष 2007 विशेष रूप से खराब रहा था, जब 4 क्रिकेटरों ने आत्महत्या की थी। इनमें जहां एक घरेलू क्रिकेटर रामबाबू पाल और मनीष पाल थे, तो वहीं एक मर्तबा अंडर-17 टीम के कप्तान रहे सुभाष दीक्षित थे, एक अन्य नाम है बंगाल की अंडर-19 महिला क्रिकेट टीम की पूर्व सदस्य झूमा सरकार का।
बेशक, आत्महत्या के लिए क्रिकेट ही एकमात्र कारण नहीं है, जो क्रिकेटरों को मानसिक तनाव के चरम तक ले जाता है, बल्कि जिंदगी की तमाम अन्य मुश्किलों से कुल मिलाकर बनी दुश्वारियां भी इसमें शामिल होती हैं। ऊपर से इनमें यदि क्रिकेट में सफल-असफल रहने का दबाव जुड़ जाए तो स्थिति विकट हो जाती है। क्रिकेट जगत को सबसे पहले तो इस विद्रूपता को स्वीकार करते हुए उन क्रिकेटरों को मदद देने के लिए कुछ करना चाहिए जो मुसीबत में हों।

शॉन टैट
ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज को 12 साल पहले भारत के खिलाफ मैच के बाद क्रिकेट छोड़ना पड़ा

ऑस्ट्रेलिया की खेल-संस्कृति
क्रिकेट में होने वाला तनाव और मानसिक स्वास्थ्य की समस्या किसी से छिपी हुई नहीं है। हाल ही में आॅस्ट्रेलियन क्रिकेटरों के मामले सामने आए हैं। यह संकेत ऐसे संवेदनशील समय का है, जिसमें आज की तारीख में मैक्सवैल, मैंडिंसन और पुकोवस्की को हमदर्दी वाला समर्थन मिला है, जो 12 साल पहले टैट के मामले में नदारद था। यह खेल जगत में व्याप्त विद्रूपता भरी स्थिति के प्रति ऑस्ट्रेलियनों की सोच में आ रहे बदलाव को बताता है, जबकि इससे पहले खिलाड़ियों में किन्हीं कारणों से बनने वाले कमजोर मानस को वे अनादर से देखते थे। एक साल पहले हुए एक सर्वे के अनुसार, 18 से 30 वर्ष की आयु के ऑस्ट्रेलियाई पुरुष मर्दानगी के पारंपरिक विचार रखते हैं, जिसमें कठोरता, होमोफोबिया, महिलाओं पर आक्रामकता, नियंत्रण और जातीय असंवेदनशीलता शामिल है। ऑस्ट्रेलिया में लड़के ‘मर्दाना-मिजाज’ माहौल में बड़े होते हैं, इसलिए कम शालीन और कुछ उद्दंड सामाजिक व्यवहार वाले होते हैं। दूसरों पर रोब झाड़ना जिंदगी का हिस्सा है, यदि आप पर किसी ने रोब झाड़ा है, तो प्रत्युत्तर और ज्यादा करारा दीजिए। लिहाजा आम संस्कृति सख्त मिजाज और कड़क है। बच्चे इसे अपनाते हैं और आगे चलकर खेल स्पर्धाओं में यह उनके व्यवहार में परिलक्षित होती है।
रिकी पोंटिंग की कहानी
रिकी पोंटिंग का प्रसंग इस बाबत अंदरूनी जानकारी देता है कि उन्हें किन पहलुओं ने सख्त-मिजाज बनाया था। उनका लालन-पालन तस्मानिया प्रांत के लॉनसेस्टन शहर के श्रमिक-वर्गीय साधारण परिवेश में हुआ था। अकसर वह अपने से दुगुनी उम्र के बच्चों के साथ खेलते थे। जब उनका कद विकेट के बराबर भी नहीं था, तब भी आयु के हिसाब से उनका खेल काफी विलक्षण था। आम तौर-तरीका प्रचलित है कि यदि कोई लड़का क्लब स्तर का व्यस्क क्रिकेट खेलने लायक है तो वहां उसके साथ पुरुषों जैसा ही व्यवहार किया जाता है। महज 12 साल की आयु में पोंटिंग इस श्रेणी में आ गए थे। उनका कहना है कि जिंदगी में इतनी ज्यादा घिसाई दोबारा और कहीं नहीं झेलनी पड़ी, जितनी मोब्रे क्लब क्रिकेट के पहले सीजन में मेरी हुई थी। अपनी आत्मकथा में इस दौरान हुआ एक वाक-युद्ध याद करते हुए उन्हाेंने लिखा, ‘मैं गलती से विरोधी टीम के विकेट-कीपर द्वारा की गई अभद्र बुदबुदाहट का जवाब दे बैठा था। मेरे पिताजी भी टीम में एक खिलाड़ी थे। वे भी वाक-युद्ध में कूद गए थे। अगर मैं इसका ढंग से जवाब नहीं देता तो उन्होंने मुझ पर तंज कसना था। बहरहाल वे भी विकेट-कीपर की ओर लपके और मुझसे ज्यादा गंदे शब्दों से उसको सबक दे डाला’। पोंटिंग आगे लिखते हैं, ‘इस तरह किशोर अवस्था से पहले ही मैं अपने से दुगुनी उम्र वाले खिलाड़ियों को गाली-गलौज वाली भाषा में ‘माकूल’ जवाब देने वाला बन गया था, क्योंकि पिताजी ने मुझे चुप करवाने की बजाय विकेट कीपर को जो गालियां बकी थीं, उसने सिद्ध कर दिया था कि मैं सही लीक पर था! तथापि मैदान से बाहर ऑस्ट्रेलियन लोग सही मायने में दोस्ती निभाते हैं। यह केवल खेल में प्रतिस्पर्धा के समय ही है, जब वे खेल में हार-जीत को जीवन-मरण से जोड़कर लेने लगते हैं। उनकी ऐसी सोच बनने के पीछे वर्ष 1882 की वह जीत है, जिसमें आस्ट्रेलियाई टीम ने इंगलैंड को हराया था। इस सीरीज से ही ‘एशेज ट्रॉफी’ का जन्म हुआ था। तब से खेल प्रतियोगिताओं में किसी भी तरह विजय पाना आस्ट्रेलियाइयों के लिए गौरव और ‘खुद को सिद्ध’ करने का सूचक बन गया। लिहाजा, आस्ट्रेलिया में व्याप्त कड़क खेल संस्कृति में खिलाड़ियों पर हर हाल में विजय पाने का भारी दबाव बन जाता है। जैसा कि लेखक गिलडोयन हेग का आकलन है कि आस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों में सबसे महान गिने जाने वाले डॉन ब्रैडमैन पर भी यह दबाव रहा। फर्क केवल इतना था कि उस वक्त के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परिभाषा में इन लक्षणों के लिए अपेक्षाकृत नरम शब्दावली थी। ब्रैडमैन 1932 की कुख्य़ात बॉडी लाइन सीरिज नहीं खेल पाए थे। हेग लिखते हैं, ‘आधिकारिक तौर पर बताया गया था कि ‘वे शारीरिक रूप से एकदम फिट हैं, लेकिन कुछ हिचक है (मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं)’। हो न हो यह बात उनमें उस वक्त चल रहे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या का संकेत देती है। केवल खेल ही नहीं उन दिनों 2 विश्वयुद्धों के बीच की समयावधि को गहरे अवसादों से भरे वर्ष के रूप में गिना जाता है। तब विश्व को अपना वजूद बनाए रखने का गंभीर संकट कहीं ज्यादा सता रहा था।

ग्लेन मैक्सवेल
एक शानदार क्रिकेटर और विश्वकप विजेता को मानसिक स्वास्थ्य कारणों से ब्रेक लेना पड़ा

बदलता आयाम
टैट और मैक्सवेल के उदाहरण बताते हैं कि अब ऑस्ट्रेिलयनों के रवैये में काफी बदलाव आ रहा है। इस बारे में आत्मनिरीक्षण होना वर्ष 2008 में शुरू हुआ था, जब पीटर रोबक ने सिडनी टेस्ट मैच में रिकी पोंटिंग की टीम का व्यवहार देखते हुए उसे ‘कुत्तों का झुंड’ बताया था। पांच साल पहले ऑस्ट्रेलिया में एक दुर्घटना हुई, जब एक घरेलू मैच में फिल ह्युजेस के सिर के पिछले हिस्से में गेंद लगी थी और उसकी मृत्यु हो गई थी। बेशक क्रिकेट को इस देश में जीवन-मरण की तरह लिया जाता रहा है, लेकिन मैदान में हुई मौत खिलाड़ियों और लोगों के लिए एक तगड़ा झटका थी। लोग सोचने पर मजबूर हुए कि क्या सच में खेल को इतनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। फिर 2018 में ‘सैंड पेपरगेट’ मामला सामने अाया, जिसके चलते ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ और उप-कप्तान डेविड वार्नर की करतूतों ने इस सोच को और ज्यादा प्रौढ़ कर दिया। इन दोनों घटनाओं ने खिलाड़ियों और दर्शकों के मन में उहापोह और आत्मनिरीक्षण की भावना पैदा कर दी।
क्रिकेट पर लिखने वाले और अध्ययनकर्ता डॉ. पीटर इंग्लिश का कहना है कि ‘ह्युजेस दुर्घटना’ खिलाड़ियों के मन में बार-बार उभरती रही। पिछले पांच साल में यह उनकी सोच में विचार करने योग्य स्थाई विषय बन गया है। वे कहते हैं- ‘इससे पहले ऑस्ट्रलियाइयों के लिए क्रिकेट भले ही वास्तविक रूप में जीवन-मरण का प्रतिरूप नहीं भी था, लेकिन वे इसे गंभीरता से इसी संदर्भ में लिया करते थे। चाहे मैक्सवेल, मैंडिंसन या पुकोवस्की की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने इतना न झिंझोड़ा हो, लेकिन ह्युजेस के मामले ने उन्हें खेल को जीवन और मरण से जोड़कर देखने पर पुनर्विचार करने में योगदान जरूर दिया है। बेशक, आस्ट्रेलिया अब उन खिलाड़ियों के प्रति मर्म रखने लगा है, जो प्रतियोगिता-अवसादों से ग्रस्त होते हैं। हेग का कहना है- ‘मैं समझता हूं कि मैदान में विरोधी टीम से निबटने की रणनीति के तौर-तरीके कमोबेश पहले जैसे ही हैं। इस बारे में आस्ट्रेलियनों के रवैये में ज्यादा फर्क नहीं आया है। फिर भी खिलाड़ियों की भलाई और व्यावसायिक तंत्र में निहित खामियों से होने वाले एकाकीपन एवं खुद को हाशिए पर पाने की मानसिकता बनने वाले विषयों में बदलाव आया है। यह अच्छी बात है, लेकिन दुख की बात है कि टैट को वह प्यार नहीं मिल पाया जिसकी उसे जरूरत थी, फिर भी यह देखना सुखद है कि मैक्सवेल को वह प्यार मिल रहा है।’


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