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महंगाई की मार

Posted On January - 15 - 2020

मुद्रास्फीति व बेरोजगारी बड़ी चुनौती
विकास दर में गिरावट और बेरोजगारी में रिकॉर्ड वृद्धि के बीच खुदरा महंगाई में पिछले पांच सालों की सबसे बड़ी वृद्धि मोदी सरकार की चिंताएं बढ़ाने वाली है जो खुदरा महंगाई की निर्धारित अधिकतम सीमा से भी ज्यादा है। सोमवार को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर में खुदरा मुद्रास्फीित आधारित मूल्य सूचकांक 7.35 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो पिछले नवंबर में 5.54 फीसदी  थी। यह मुद्रास्फीति जुलाई, 2014 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर है। साथ ही सब्जियों व दालों की कीमतों में उछाल के बाद खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति 14.12 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि वर्ष 2018 में यह ऋणात्मक थी। दरअसल, दिसंबर में प्याज-लहसुन की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के कारण सब्जियों से जुड़ी महंगाई दर साठ फीसदी रही। वहीं मुख्य महंगाई बढ़कर 3.7 फीसदी रही, जो नवंबर में 0.2 फीसदी थी। लेकिन खुदरा महंगाई दर के आरबीआई द्वारा निर्धािरत छह फीसदी की ऊपरी सीमा को पार करने के निहितार्थ अर्थव्यवस्था के हित में नहीं कहे जा सकते। इस बात का एहसास देश के केंद्रीय बैंक को भी था। पिछले महीने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत के नेतृत्व वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने ब्याज दरों को यथावत बनाये रखने का फैसला किया था। इससे पहले केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को गति देने के मकसद से कई बार ब्याज दरों के आधार अंकों में कटौती कर चुका है। अब नहीं लगता कि फरवरी में होने वाली इसकी बैठक में ब्याज दरों में कटौती पर विचार हो। खुदरा महंगाई दर में वृद्धि के बाद हाल-फिलहाल नीतिगत दरों में कटौती की गुंजाइश नजर नहीं आती। लगता है कि आने वाले आम बजट में कुछ नये कदम उठाकर ही सरकार तसवीर बदलने का प्रयास करे। पिछले एक दशक में न्यूनतम विकास दर की चिंताओं के बीच देश की मोदी सरकार से बड़े बदलावकारी फैसलों की उम्मीद जगी है।
हालांकि, कुछ अर्थशास्त्री उम्मीद जता रहे हैं कि फरवरी व मार्च में प्याज व अन्य सब्जियों की आपूर्ति में सुधार से खुदरा महंगाई नियंत्रण में आ सकती है। मगर अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दे चिंता बढ़ाने वाले हैं। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर की हालिया रिपोर्ट इस चिंता को और बढ़ाती है। डॉ. सौम्य कांति घोष की रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष में सोलह लाख नौकरियां कम मिलेंगी। बीते वित्तीय वर्ष में 89.7 लाख नई नौकरियां मिली थीं। चिंता की बात यह भी है कि सरकारी नौकरियों में भी 39 हजार की कमी आने की बात कही है। नि:संदेह यह देश में आर्थिक सुस्ती का संकेत है। विभिन्न एजेंसियों के आंकड़े बताते रहे हैं कि देश में बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है। पिछले एक दशक की सबसे कम विकास दर के चलते सरकार पर देश में आर्थिक सुधारों को तेज करने का दबाव होगा। ऐसे में बेरोजगारी और मुद्रास्फीति मिलकर देश की अर्थव्यवस्था के लिये नई चुनौती पैदा कर सकती हैं, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में स्टैगफ्लेशन कहा जाता है। यह कालांतर में जनाक्रोश का वाहक ही बनेगा। इससे एक ओर क्रय शक्ति कम हो जायेगी और दूसरी ओर महंगाई बढ़ जायेगी। नि:संदेह इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को समय रहते बदलावकारी फैसले लेने होंगे। चिंता की बात यह भी है कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती को दूर करने के लिये केंद्र सरकार ने जो कदम उठाये थे, उनका अपेक्षित परिणाम अर्थव्यवस्था में नजर नहीं आया। मोदी सरकार के लिये यह भी चुनौती का विषय होना चाहिए कि उसके कार्यकाल में पहली बार खाने-पीने के दामों में इतनी तेजी आई है। निश्चय ही मौसम की मार से सब्जी और अनाज के दामों का प्रभावित होना भी एक कारण है, मगर समय रहते प्रबंधन के कदम उठाने में भी कोताही भी हुई है। यही वजह है कि शहरी और ग्रामीण इलाकों में लोग महंगाई से समान रूप से परेशान हैं। सरकार को एक  झटका यह भी लगा कि मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार थोक मुद्रास्फीति भी बढ़कर 2.59 हो गई है। नवंबर में थोक मुद्रास्फीति 0.58 फीसदी थी। इसकी वजह खाद्य पदार्थों के दामों में वृद्धि ही है


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