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मजे-मजे में पढ़ाई

Posted On January - 13 - 2020

ब्लॉग चर्चा

अभिषेक ओझा
उड़ीसा में तूफ़ान आने के बाद हिंदी की ख़बरों में भी ‘मिलियन’ शब्द कई बार दिखा। आजकल सोशल मीडिया में फ़ालोअर, व्यू इत्यादि की गणना भी मिलियन में ही होती है। ये एक छोटा उदाहरण है कि पिछले कुछ सालों में भाषा कैसे बदली है। हमने गिनती-पहाड़ा पढ़ा था एक सांस में— एक इकाई, दो इकाई, तीन इकाई, चार इकाई, पांच इकाई, छह इकाई, सात इकाई, आठ इकाई, नौ इकाई, दहाई में दस! इकाई-दहाई-सैकड़ा-हजार-दस हजार-लाख-दस लाख-करोड़-दस करोड़-अरब-दस अरब-खरब-दस खरब-नील-दस नील-पद्म-दस पद्म-शंख-दस शंख-महाशंख! कंठस्थ। अब सोचना भी उसी प्रणाली में होगा! सोचना भला कभी दूसरी भाषा में हो सकता है?
मैं ऐसे लोगों को हमेशा शक की दृष्टि से देखता हूं जो कहते हैं कि वो अपने बचपन में बोली गयी भाषा भूल गए। थोड़ी-थोड़ी याद है। कैसे भूल सकता है कोई?! वो दिन याद आते हैं। ये लय में कंठस्थ करने के दिन थे। गिनती का पहला प्रैक्टिकल एप्लिकेशन था अनाज तोलने वालों को देखना। फ़्लो में। सुंदर। वो बोरे का बोरा तोलते—रामह जी रामह, दुई जी दुई। या रामह जी रामह, दुई राम दुई— रामनाम का संपुट ज़रूर होता। ऐसी कितनी बातें याद है। बिन पढ़े। केवल सुनकर। जो कभी पढ़नी नहीं पड़ी वो भी। पाठ्यक्रम के बाहर के श्लोक। चौपाई। दोहा। कहावतें। मानस की अनेक चौपाइयां जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं थी। कितने श्लोक भी तो हमने ऐसे ही याद कर लिए थे। कितनी कविताएं जो पाठ्यक्रम में नहीं थी… या पुस्तक देखने के पहले से ही याद होता। अंताक्षरी के लिए। किताब में देखकर लगता… अरे ये तो मुझे याद है!
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था।/ राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था।/ गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था…
वो चीजें भी सुन कर याद हुई जो हमारे बचपन में समाप्त हो गयी थी—मन-सेर-छटाक। रत्ती-माशा-तोला। रुपया-आना-पैसा-पाई। उसी दौर में भूगोल के शिक्षक ग्लोब पर हाथ फिराते— डन-फिनलैंड-इंग्लैंड- आइसलैंड… संभवतः अपने जमाने के रटे क्रम में हाथ फिराते दुनिया पर। लगता रैप कर रहे हैं। वैसे कंठस्थ करने और कंठस्थ रह जाने में संस्कृत ही एक नंबर रही— शैले शैले न माणिक्यं। मौक्तिकं न गजे गजे। साधवे ना ही सर्वत्रं चन्दनं न वने वने। अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम‍्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम‍्। वगैरह वगैरह। वे भी दिन थे। लगता है हमने मजे-मजे में पढ़ाई कर ली! कैसे लोग रोना रोते हैं पढ़ाई का।

साभार : उवाच डॉट ओझा डॉट इन


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