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मकर संक्रांति : मंगल कार्यों का श्रीगणेश

Posted On January - 12 - 2020

मदन गुप्ता सपाटू
स्नान, दान का महापर्व मकर संक्रांति मंगल कार्यों के श्रीगणेश का अवसर भी है। इस बार 14 जनवरी को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में रात 2 बजकर 7 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगा। इसका पुण्यकाल 15 जनवरी की दोपहर तक रहेगा। इसके साथ ही 14 जनवरी को खरमास व मलमास खत्म हो जाएगा। खरमास खत्म होने के बाद विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे।
संक्रांति हर महीने आती है, लेकिन मकर संक्रांति का विशेष महत्व माना जाता है। कर्क और मकर राशि में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक माना गया है। इसी दिन सूर्य का उत्तरायण शुरू हो जाता है। शास्त्रों में दक्षिणायन को देवताओं की रात और उत्तरायण को दिन यानी सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। पौराणिक संदर्भ में मान्यता है कि भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके गृह आते हैं। मकर राशि का स्वामी शनि है।
सनातन धर्म में मकर संक्रांति को मोक्ष की सीढ़ी बताया गया है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए इस समय अर्थात‍् सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी। यह भी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इसी दिन असुरों का संहार किया था। गंगा नदी इसी दिन गंगासागर तक पहुंची थी। मकर संक्रांति को सुख और समृद्धि का दिन माना जाता है। गंगा स्नान को मोक्ष का रास्ता माना जाता है, इसी कारण इस दिन गंगा स्नान के साथ दान करने की परंपरा है।

स्नान, दान का अवसर
मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान और गंगा तट पर दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। इस दिन पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान, दान, देव कार्य एवं मंगलकार्य करने से विशेष लाभ होता है। इस दिन पानी में तिल डालकर नहायें।
सूर्योदय के बाद खिचड़ी, तिल-गुड़ के लड्डू सूर्यनारायण को अर्पित करें। ॐ नमो भगवते सूर्याय नमः या ॐ सूर्याय नमः का जाप करें।
ज्योतिष में सूर्य को हड्डियों का भी कारक माना गया है, जिन्हें जोड़ों का दर्द सताता है या बार-बार दुर्घटनाओं में फ्रैक्चर होता है, उन्हें इस दिन सूर्य को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए।
देव स्तुति, पितरों का स्मरण करके तिल, गुड़, गर्म वस्त्र, कंबल आदि का दान जरूरतमंदों या धर्मस्थान पर करें। मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना फल देता है।
इस दिन को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। उत्तर भारत में इस त्योहार को माघ मेले के रूप में मनाया जाता है।

खिचड़ी सेहत से ग्रहों तक का नाता
मकर संक्रांति को खिचड़ी के रूप में भी मनाया जाता है। इसके पीछे पौराणिक और शास्त्रीय मान्यताएं हैं। मकर संक्रांति के इस पर्व पर खिचड़ी को मुख्य पकवान के तौर पर बनाया जाता है। खिचड़ी को आयुर्वेद में सुंदर और सुपाच्य भोजन की संज्ञा दी गई है। इसे औषधि माना गया है। मकर संक्रांति पर चावल, दाल, हल्दी, नमक और सब्जियां मिलाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इसके साथ दही, पापड़, घी और अचार भी खाया जाता है। चावल को चंद्रमा और उड़द की दाल को शनि का प्रतीक माना गया है। हल्दी बृहस्पति का प्रतीक है। नमक को शुक्र का प्रतीक माना गया है। हरी सब्जियां बुध से संबंध रखती हैं। खिचड़ी की गर्मी व्यक्ति को मंगल और सूर्य से जोड़ती है। इस प्रकार खिचड़ी खाने से सभी प्रमुख ग्रह मजबूत हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन नये अन्न की खिचड़ी खाने से शरीर पूरा साल आरोग्य रहता है। यह संक्रांति काल मौसम के परिवर्तन और इसके संक्रमण से बचने का होता है। इसलिए तिल या तिल से बने पदार्थ खाने से ऊर्जा का संचार होता है। तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल उबटन, तिल भोजन, तिल दान, गुड़ तिल के लड्डू सर्दी से लड़ने की क्षमता देते हैं।
शनि की प्रिय वस्तुओं के दान से बरसती है कृपा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव जब मकर राशि में आते हैं, तो शनि की प्रिय वस्तुओं के दान से सूर्य की कृपा बरसती है। इस कारण मकर संक्रांति के दिन तिल से बनी वस्तुओं के दान से विशेष फल मिलता है।


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