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बैंक लॉकर और आपके अधिकार

Posted On January - 19 - 2020

उपभोक्ता अधिकार

पुष्पा गिरिमाजी
सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक में पिछले 15 सालों से मेरा एक सेफ डिपॉजिट लॉकर है। साल 2018 में मैं देश से बाहर थी और अपने लॉकर के किराये का भुगतान करना भूल गयी। हालांकि बैंक ने न तो कोई रिमांइडर (तकाजे के लिए पत्र) भेजा और न ही मेरे लॉकर खोलने के बारे में कोई नोटिस। वापस आने के बाद जब मैं बैंक गयी तो मैंने पाया कि बैंक ने मेरा लॉकर खोल दिया, उसमें से सामान हटाकर वह लॉकर किसी अन्य ग्राहक को दे दिया। जब मैंने इसका विरोध किया तो उन्होंने कहा कि लॉकर उपभोग करार की शर्तों के मुताबिक यदि ग्राहक किराया नहीं चुकाता है तो वे ऐसा कर सकते हैं। खैर, इस दौरान जब मैंने अपना सामान चेक किया तो पाया कि उसमें से सोने का एक जोड़ा कंगन गायब था। क्या मैं अपने कंगनों के खोने के लिए बैंक को जिम्मेदार ठहरा सकती हूं, यदि हां, तो किस आधार पर?
जी हां, आप अपने कंगनों की भरपाई के लिए बैंक से इस आधार पर कह सकते हैं कि बैंक ने लॉकर खोलने से पहले आपको कोई नोटिस नहीं दिया। उपभोक्ता द्वारा किराये का भुगतान न करने पर बैंक के पास लॉकर को खोलने का अधिकार हो सकता है, लेकिन ऐसा करने में उसे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा। पहले तो उसे बकाया किराये के संबंध में रिमांइडर भेजना चाहिए और उसके बाद भी अगर ग्राहक यह भुगतान नहीं करता तो उसे लॉकर को खोलने संबंधी नोटिस भेजना चाहिए। बैंक को निश्चित रूप से ग्राहक को नोटिस का जवाब देने के लिए पर्याप्त समय भी देना चाहिए। बैंक ने इस नियत प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उपभोक्ता न्यायालयों ने माना है कि इस तरह का नोटिस भेजने में विफल रहना बैंक की ओर से ‘सेवा में कमी’ है और इस तरह की कमी वाली सेवा के परिणामों के लिए जिम्मेदारी लेनी होती है, जिसका अर्थ है कि यदि उनकी कार्रवाई में कोई कमी रह गयी हो, जिसके कारण ग्राहक को नुकसान उठाना पड़ा तो उन्हें वह वहन करना होगा।
क्या आप इस मुद्दे पर हाल के किसी केस के बारे में बता सकते हैं?
पंजाब नेशनल बैंक बनाम अनुराग गुप्ता (2019 का एफए नंबर 1756 तिथि 1 नवंबर, 2019) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने समान मामले की सुनवाई की। यहां शिकायतकर्ता का आरोप था कि उन्होंने 1994 में एक लॉकर किराये पर लिया और इससे पहले उन्होंने अपने बचत खाते से लॉकर के किराये के तौर पर पैसा लेने के लिए अनुमति पत्र दे दिया, बाद में वह लॉकर के किराये के तौर पर 800 रुपये नकद जमा कराने लगे। जब कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण वह वर्ष 2012-2013 के लिए किराया देने से चूक गए तो बैंक ने उन्हें देय किराये के बारे में 28 जून 2013 को एक नोटिस भेजा था। इसके बाद उन्होंने तुरंत देय राशि जमा करा दी थी। हालांकि फरवरी 2015 को बैंक ने बिना कोई नोटिस दिए उनका लॉकर खोल दिया और उसमें रखे सामान को बैंक के नियंत्रण वाले लॉकर में जमा करा दिया। उन्हें इस बात की जानकारी तब मिली जब वह 18 अप्रैल 2015 को लॉकर देखने गये। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कुछ सामान गायब था।
यहां बैंक ने यह तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने दो सालों का किराया नहीं दिया और उन्होंने इस बारे में ग्राहक को तीन नोटिस भेजे, लेकिन वे सभी अधूरे पते के संदेश के साथ लौट गए। यहां तक कि उन्होंने उस पते पर अपने एक कर्मचारी को भी भेजा, लेकिन उसे शिकायतकर्ता का पता नहीं चला।
बैंक ने अपने पक्ष में भारतीय रिजर्व बैंक के उस दिशा-निर्देश का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि यदि कोई लॉकर खास समय तक निष्प्रभावी (नॉन ऑपरेटिव) रहता है तो बैंक के पास ताला खोलने का अधिकार है। इसने यह भी उद्धृत किया कि ग्राहक के साथ हुए करार के क्लॉज 8 में कहा गया है कि यदि ग्राहक द्वारा लॉकर के किराये का भुगतान नहीं किया गया तो बैंक उसके सामान के निजी या सार्वजनिक तौर पर बिक्री से बकाया रकम को ले सकता है।
हालांकि राष्ट्रीय आयोग ने आरबीआई के दिशानिर्देशों और बैंक द्वारा तैयार किए गए समझौते की शर्तों की ओर इशारा करते हुए कहा कि ग्राहक को इस तरह की कार्रवाई करने से पहले उचित नोटिस दिया गया था, लेकिन यह स्पष्ट था कि बैंक द्वारा भेजे गए नोटिसों में से एक भी ग्राहक तक नहीं पहुंचा। यह इंगित करते हुए कि बैंक को ऐसी परिस्थितियों में शिकायतकर्ता को सार्वजनिक नोटिस जारी करना चाहिए था, आयोग ने माना कि बैंक ने करार में उल्लिखित क्लॉज 8 का पालन नहीं किया। बैंक को सेवा की कमी का दोषी मानते हुए आयोग ने लखनऊ राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को बरकरार रखा, जिसके तहत उपभोक्ता को बतौर मुआवजा 5 लाख रुपये देने और मुकदमे के खर्च के तौर पर 10 हजार रुपये भुगतान करने का आदेश दिया गया था।


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