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बर्फ से बेबस ज़िंदगी

Posted On January - 19 - 2020

अभिषेक कुमार सिंह
ठंड में अगर थोड़ी नरमाई शामिल हो तो उस सर्दी को गुलाबी कहने का चलन है। पर क्या हो, जब हड्डियों के भीतर घुसकर शरीर को कंपा देने वाली सर्दी खत्म होने का नाम ही न ले। यही नहीं, दुनिया के बर्फीले इलाकों की तरह हमारे देश के उत्तर भारतीय राज्यों में बर्फबारी का लंबा सिलसिला चल निकले। इधर एक ओर दुबई एयरपोर्ट भारी बारिश के कारण पानी में डूबा नज़र आ रहा था, तो सऊदी अरब के कुछ इलाकों में हुई बर्फबारी लोगों को चौंका रही थी। अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान के क्वेटा में हुई भारी बर्फबारी और इधर हमारे हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में सड़क मार्ग पर आए एवलांच (हिमखंड) से लेकर उत्तरांचल के मसूरी-नैनीताल आदि में जमी बर्फ के नज़ारों को देखकर एकबारगी लगा है, मानो सर्दी ने यहां आकर कभी न जाने की ठान ली हो। हालांकि हमें पता है कि एक बार जब कसकर धूप खिलेगी, मौसम थोड़ा बदलेगा तो लोगबाग गर्मी से परेशान होकर फिर ठंड की वापसी की दुआ करेंगे, पर इससे पहले यह ठंड और बर्फ सुकून और मज़ा दिलाने के साथ कई सज़ाओं के ऐलान की जो भूमिका बांध रही है, उसे देखकर यही मांग की जा सकती है कि जब ऐसी सर्दी सताए तो इससे मुकाबले का किया जाए कोई ठोस उपाय।
ये सर्दी अच्छी है ?
असल में जो बर्फ शीत की अनहोनी घटना है, फसलों की पैदावार तथा पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है, वही बर्फ सफेद आतंक में भी बदल जाती है। यह बर्फ जीवन की डोर काटने लगती है और पर्वतीय इलाकों में कहर बनकर टूट पड़ती है। इधर, इसकी एक मिसाल जम्मू-कश्मीर के माछिल सेक्टर में बीते मंगलवार (14 जनवरी, 2020) को मिली, जब वहां मौजूद एक सैन्य चौकी हिमस्खलन की चपेट में आ गई और वहां तैनात चार सैनिकों की मौत हो गई। इससे पहले दिसंबर, 2020 में भी उत्तर कश्मीर में नियंत्रण रेखा के नजदीक हिमस्खलन की दो अलग-अलग घटनाओं में चार जवान शहीद हो गए थे। इससे पहले नवंबर, 2020 में केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में दक्षिणी सियाचिन ग्लेशियर में लगभग 18 हजार फुट की ऊंचाई पर गश्त कर रहा सेना का एक दल हिमस्खलन की चपेट में आ गया, जिसमें दो जवानों की मौत हो गई थी।
सर्दी में सेना की मुश्किलें
एवलांच से होने वाली दुर्घटनाओं का हमारे देश में एक सालाना क्रम है। इनके मद्देनजर यह मांग उठती रही है कि बेहद दुर्गम बर्फीले स्थानों से सेना को वापस बुला लेना चाहिए। कम से कम से उस अवधि के लिए, जब तक कि वहां बर्फबारी होती है। ऐसी एक मांग चार साल पहले भी खास तौर से सियाचिन के संदर्भ में उठी थी। वहां तीन फरवरी, 2016 को आए एवलांच के 6 दिन बाद एक सैनिक को बर्फ के अंदर से जीवित निकाला गया था। वहां 19,600 फीट की ऊंचाई पर एक बर्फीली चट्टान खिसकने से भारी हिमस्खलन हुआ था, जिसकी चपेट में सोनम पोस्ट नामक भारतीय चौकी आ गई थी। इस चौकी पर मद्रास रेजीमेंट के एक जूनियर अधिकारी और 9 सैनिक तैनात थे। वहां किए गए बचाव कार्य के बावजूद नौ सैनिकों को मृत निकाला जा सका, लेकिन भूस्खलन के छह दिन बाद एक सैनिक लांस हनुमनथप्पा कोप्पाड जीवित मिले थे। लांस नायक हनुमनथप्पा को इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। हालांकि वे कोमा से बाहर नहीं आ सके और अंतत: उनका निधन हो गया था।
सीमा-सियाचीन और सर्दी से जंग
सियाचीन में हुई इस दुर्घटना के बाद ज़ोरशोर से कहा गया था कि वहां से सेना को वापस बुला लेना चाहिए, जिसे शीर्ष स्तर पर फौरन से नकार दिया गया था। यहां नोटिस करने वाली एक अहम बात और है। हमारे देश के सीमांत इलाकों में हिमस्खलन को दुश्मन देश की हरकतों का परिणाम भी बताया जा चुका है। वर्ष 2017 में 25 जनवरी को कश्मीर के सोनमर्ग में जब एवलांच की चपेट में आकर सेना के करीब एक दर्जन जवानों की मौत हो गई, तो इस पर तत्कालीन सैन्य प्रमुख बिपिन रावत ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर जैसी जगहों पर ग्लोबल वॉर्मिंग, पारिस्थितिकीय बदलाव यानी इकोलॉजिकल चेंज के अलावा पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी की वजह से भी हिमस्खलन यानी एवलांच की घटनाएं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि असल में, पाक सैनिकों द्वारा संघर्ष विराम उल्लंघन और भारी हथियारों के इस्तेमाल से मिट्टी को नुकसान पहुंचता है, इससे दूसरे मौसम में भूस्खलन जबकि सर्दियों में हिमस्खलन का खतरा पैदा होता है। करगिल घुसपैठ के बाद बर्फीली चौकियों पर उपस्थिति बनाए रखने की सावधानी असल में हमारी सेना को बहुत भारी पड़ रही है। पिछले दस सालों के हादसों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि बर्फ और हिमस्खलन सेना और पर्यटकों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। 2011-12 में कश्मीर में सेना की एक पूरी फील्ड-वर्कशॉप कंपनी (टुकड़ी) हिमस्खलन में दब गई थी। एवलांच से पैदा बर्फ की लहर इतनी शक्तिशाली थी कि उसने भारी फौजी ट्रकों को 300 मीटर दूर तक उछाल फेंका था।
पर्यावरण पर भारी पर्यटन
बर्फ का एक त्रासद पहलू पर्यटकों की समस्याओं से जुड़ा है। हर साल दिसंबर से लेकर जनवरी-फरवरी तक के महीनों में बर्फ की सफेद चादर में लिपटे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक के नजारे पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। हजारों-लाखों पर्यटक वहां सैर-सपाटे को जाते हैं, जिससे इन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पड़ता है। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरे पहलू में देश से कटे हुए, बिजली-पानी और रसद की भीषण कमी से जूझते इन्हीं इलाकों के ज्यादातर हिस्से होते हैं। इन राज्यों में बर्फबारी के कारण न सिर्फ पर्यटक यहां-वहां फंस जाते हैं, बल्कि स्थानीय बाशिंदे भी बिजली-पानी आदि मूलभूत समस्याओं की शिकायत करने लगते हैं। हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय राजमार्ग बर्फ की मोटी चादर जमा हो जाने के कारण जगह-जगह बाधित हो जाता है। यातायात बंद होने और रुक-रुक कर चलने की वजह से रसद की सप्लाई करने वाले ट्रकों की आवाजाही भी थम सी जाती है। इससे इन राज्यों में राशन-पानी का संकट पैदा होने की आशंका पैदा होती है। जम्मू-कश्मीर में तो यह सालाना समस्या है क्योंकि जब भी वहां बर्फ गिरने का सिलसिला शुरू होता है, उसे देश से जोड़ने वाले 300 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों की आवाजाही रोक दी जाती है। उस दौरान न कोई आ सकता है और न कोई यहां से निकल सकता है।
बहरहाल, बर्फ के इन शानदार नजारों के पीछे की एक सच्चाई यह भी है कि शिमला-मनाली जैसे पर्यटक-स्थलों पर साफ-सफाई भी बर्फबारी के दौरान एक बड़ी समस्या बन जाती है। सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनी पहाड़ों की रानी शिमला के स्थानीय निवासी बीते सालों में यह शिकायत बार-बार करते रहे हैं कि स्थानीय प्रशासन न तो बर्फबारी के दौरान घरों के सामने पड़े कूड़े को उठाने का कोई प्रबंध करता है। नतीजा यह कि पर्वतीय शहरों में सैर-सपाटे को आए पर्यटक भी शहर में जगह-जगह बदबू की शिकायत करते हैं।
बर्फ से जूझने के इंतज़ाम नाकाफी
बर्फ से जुड़ी समस्याएं और भी हैं। जैसे राष्ट्रीय राजमार्गों से बर्फ हटाने के काम में देरी होना। विदेशों में बर्फबारी के दौरान ज्यादातर वक्त प्रमुख हाइवे को हर हाल हालत में चालू रखा जाता है। वहां इस बात की अहमियत समझी जाती है कि रास्तों के बंद हो जाने का मतलब है, देश का थम जाना। पर अपने देश में जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड में बर्फबारी के दौरान राजमार्गों को बंद करना बेहद आम है। कभी-कभी तो रास्ते 15 दिनों तक के लिए बंद कर दिए जाते हैं। ऐसे में पहली समस्या ट्रक ड्राइवरों को होती है, जिनके पास महज़ सात दिनों का ही राशन होता है। कभी-कभी वे भूखे सोते हैं या साथियों से खाना मांगकर खाते हैं। पर्यटक तो ऐसी स्थिति में सड़क छोड़कर विमान सेवाओं की शरण ले सकते हैं, लेकिन ट्रक-बस चालक कहां जाएं।
ताज्जुब नहीं कि बर्फबारी की सामान्य घटना जिस तरह हमारे देश में भीषण रूप ले लेती है, अमेरिका या यूरोप के किसी देश में प्रायः वैसा नहीं होता। मौसमी बदलाव की एक सामान्य प्रक्रिया यदि तंत्र की नाकामी और इंतजामों की कमियों के कारण संहारक बन जाती है तो यह हमारी नाकामी ही है। यह विडंबना है कि हमारा तंत्र भीषण बारिश, चक्रवात और सुनामी की तो फिक्र करता नज़र आता है, पर बर्फ के नीचे दब रही व्यवस्थाओं पर निगाह नहीं डालता।
पोलर वोर्टेक्स का खतरा : बीते कई वर्षों के मुकाबले इस बार सर्दी का मौसम उत्तर भारत के लिए काफी जटिल रहा है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के ज्यादातर पहाड़ी इलाके भारी बर्फबारी से जूझ रहे हैं तो समूचा मैदानी उत्तर भारत कड़ाके की ठंड में ठिठुर रहा है। मौसम विभाग बता रहा है कि इस बार पश्चिमी विक्षोभ ने उत्तर भारत की हालत बिगाड़ रखी है और बताते हैं कि जनवरी बीतते-बीतते ध्रुवीय चक्रवात यानी पोलर वोर्टेक्स नामक मौसमी परिघटना एक खतरनाक ट्रेंड के रूप में पिछले साल (2019) की तरह लौट सकती है। जहां तक उत्तर भारत को कंपकंपाने वाली सर्दी का सवाल है तो इस बारे में भारतीय मौसम विभाग की औसत व्याख्या यह है कि आर्कटिक से निकलने वाली ठंड यूरोप और अमेरिका में दक्षिण की ओर फैलती रही है, जो पश्चिमी विक्षोभ को उत्तर भारत की ओर ठेलती रही है। पिछले साल जनवरी, 2019 में 7 पश्चिमी विक्षोभों ने उत्तर भारत को प्रभावित किया था, जबकि इनका सामान्य आंकड़ा 4 से अधिकतम 6 तक ही होता है। इस बार भी कुछ वैसा ही खतरा पैदा होने की आशंका है। इनमें ज्यादा बड़ी समस्या पोलर वोर्टेक्स को लेकर हो सकती है।
पोलर वोर्टेक्स की सबसे ज्यादा चर्चा पिछले ही साल 2019 में हुई थी। उत्तरी ध्रुव की ओर से चले बर्फीले-ध्रुवीय चक्रवात यानी पोलर वोर्टेक्स की वजह से 2019 की शुरुआत में अमेरिका में दो दर्जन से ज्यादा मौतें हुई थीं और दावा किया गया था कि उस दौरान अमेरिका के 9 करोड़ से अधिक लोग शून्य से -17 डिग्री तापमान में रहने को मजबूर हुए थे। यही नहीं, एक वक्त तो ऐसा भी आया था, जब अमेरिकी मौसम विभाग ने पोलर वोर्टेक्स की वजह से तापमान के शून्य से -40 से -70 डिग्री सेल्सियस तक नीचे जाने की चेतावनी जारी की थी। मौसम के बदलावों पर नजर रखने वाली एक अहम वेबसाइट- एक्यूवेदर के मुताबिक इस साल भी जनवरी के अंतिम सप्ताह से अमेरिका और दुनिया के कई अन्य हिस्से ध्रुवीय चक्रवात की जद में आ सकते हैं और तब बर्फबारी के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं। विज्ञान की नजर से देखें तो पृथ्वी के दोनों (दक्षिणी और उत्तरी) ध्रुवों के बड़े इलाके में बेहद कम दबाव के साथ हमेशा मौजूद रहने वाली अत्यधिक ठंडी और तीखी हवाओं (चक्रवात) को पोलर वोर्टेक्स कहते हैं। वैसे तो ये बर्फीले चक्रवात इन ध्रुवों के इर्दगिर्द ही मौजूद रहते हैं लेकिन ध्रुवों पर मौसम ठंडा या गर्म होने पर वहां से छिटककर दूसरे इलाकों में भी पहुंच जाते हैं। वर्ष 2014 में यही हुआ था, जब पोलर वोर्टेक्स कमजोर पड़ा तो ग्रीनलैंड के ऊपर अचानक उच्च दबाव वाला वायु क्षेत्र बन गया। इसने आमतौर पर ठंडे रहने वाले ग्रीनलैंड की ओर आ रही ठंडी जेट धाराओं को बाहर की तरफ दक्षिणी दिशा में ठेल दिया, जिससे फ्लोरिडा जैसे इलाकों में बेतहाशा ठंड पड़ने लगी। उस दौरान कनाडा और अमेरिका के मध्य-पश्चिमी इलाकों का मौसम अलास्का से भी ज्यादा ठंडा हो गया था।
सऊदी भी हुआ सफेद
यह बात लोगों को हैरान कर सकती है कि सऊदी अरब में बर्फबारी भी होती है। सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बीते सप्ताह कई इलाकों में बर्फबारी भी हुई। इस मुल्क के लोग इस समय मौसम के उतार-चढ़ाव से हैरान है। भारी बर्फबारी के बाद यहां पर कई जगहों पर बर्फ की मोटी चादर बिछ गई है और पर्यटकों को मौसम का यह रंग काफी पसंद आ रहा है। सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं बल्कि संयुक्‍त अरब अमीरात (यूएई) के कई हिस्‍सों में मौसम काफी बदला हुआ है। ताबुक, मदीना और उत्तरी सीमावर्ती इलाके में हुई बर्फबारी से लोगों को आफत भी हुई। ताबुक में भरपूर प्राकृतिक खूबसूरती है। विशाल पर्वत, लाल सागर और ऐतिहासिक धरोहरें इस जगह को बेहद खास बनाते हैं। ताबुक की बर्फबारी पूरे सऊदी अरब को लुभाती है. ताबुक में एक साल के भीतर दूसरी बार बर्फबारी हुई है। इससे पहले अप्रैल महीने में भी पूरा ताबुक बर्फ की सफेद चादर से ढक गया था। सऊदी अरब की विशाल धरती पर आधुनिक शहर बसे हैं और दूर-दूर तक फैली रेत भी है, तेल के भंडार भी हैं और पहाड़ भी। ऐसे में यहां सफेद आफत जहां पर्टन को राहत दे रही है वहीं, मौसम का यह मिजाज़ समझ नहीं आ रहा।
मौसम के तीखे तेवर
एक ओर यूरोप, अमेरिका से लेकर भारत तक में बेतहाशा ठंड का आलम है, तो ऑस्ट्रेलिया में गर्मी और जंगल की आग जैसे पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ने को आमादा है। इस देश के जिन दक्षिणी-पश्चिमी इलाकों में इन दिनों ठंड पड़ती थी, वहां भी तापमान बीते कुछ वर्षों से 30 डिग्री सेल्सियस को पार करने लगा है। पिछले तीन-चार वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में जनवरी का महीना सबसे अधिक गर्म रहा है। इससे पहले केवल 2005 और 2013 में 2018 की अपेक्षा गर्मी अधिक पड़ी थी। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में नदियों का पानी सूखने लगा और कुछ नदियों में लाखों मछलियां तक मारी गईं। इस साल ऑस्ट्रेलिया के 11 करोड़ हेक्टेयर इलाके के जंगलों में लगी आग से अरबों वन्यजीवों के स्वाह हो जाने का अनुमान लगाया गया। इस समस्या के मद्देनजर ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 13 जनवरी, 2020 को जंगल की आग को एक पारिस्थितिकी आपदा घोषित करते हुए पांच करोड़ डॉलर के फंड की घोषणा की ताकि वन्यजीवों को बचाने का अभियान चलाया जा सके। बहरहाल, दुनिया के बड़े हिस्से में मौसम के इन अतिवादी तेवरों को देखकर सवाल उठा है कि आखिर ऐसी कौन सी वजहें हैं जो सर्दी और गर्मी, दोनों मौसमों के खतरनाक रुख अचानक पैदा हो गए हैं। कहीं इसके पीछे वही जलवायु परिवर्तन नामक परिघटना तो नहीं है, जिसके बारे में वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् अरसे से चेतावनी देते रहे हैं। देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हलचल पैदा करने वाली मौसमी घटनाओं से एक बात तो साफ है कि मौसम की बदलती चाल हमें जो संदेश दे रही है, वह काफी गंभीर है। इसे समझने में जिस तरह की सतर्कता और तत्परता हमें दिखानी चाहिए, वह हम नहीं दिखा पा रहे। यूं तो मौसम विभाग मानसून, सूखे या सर्दी-गर्मी के इन संकेतों को पकड़ कर देश व जनता को सतर्क करता रहा है, लेकिन आधी-अधूरी भविष्यवाणियों से और मौसम की अतिवादी करवटों से बचाने वाले इंतजामों की कमियों के कारण मौसमी मुसीबतें हम पर कहर बनकर टूटने लगी हैं। अब सिर्फ यह जरूरी नहीं रह गया है कि मौसम विभाग हमें यह बताए कि तापमान कितने डिग्री के बीच रहेगा या आसमान में बादल रहेंगे या नहीं, बल्कि इस बारे में भी उसे सचेत करना होगा कि मौसम कब और कैसी करवट लेगा और उससे बचाव के लिए हमें क्या-क्या इंतजाम करने होंगे।


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