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पिहोवा जल रूप में पूजी जाती हैं सरस्वती

Posted On January - 26 - 2020

पिहोवा स्थित सरस्वती तीर्थ। फोटो सुभाष पौलस्त्य

सुभाष पौलस्त्य
पिहोवा में कल से अंतर्राष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव शुरू हो रहा है। एक तरफ यह समारोह जहां कला और हरियाणा की संस्कृति की झलक दिखाएगा, वहीं दूसरी तरफ सरस्वती तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। वसंत पंचमी के अवसर पर पिहोवा में पिछले 40 वर्षों से सरस्वती महोत्सव मनाया जा रहा है। महंत बंसीपुरी जी ने इसकी शुरुआत की थी। स्कूली बच्चों के हाथों में पीली झंडियां देकर नगर में शोभायात्रा निकाली जाती थी। इसके बाद युवाओं ने सरस्वती युवा संगठन के माध्यम से इसे मनाना शुरू किया। पांच दिनों तक वसंत पंचमी सरस्वती महोत्सव मनाया जाने लगा। साल 2017 के बाद से सरकार इसे अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के तौर पर आयोजित कर रही है।
मां सरस्वती को पिहोवा की आराध्या देवी माना जाता है। पिहोवा ऐसा स्थान है, जहां सरस्वती जल-रूप और मूर्ति-रूप, दोनों में दिखाई देती हैं। मान्यता है कि यहां पावन सरस्वती नदी के तट पर अनेक ऋषि-मुनियों ने तपस्या की। शहर के भीतर मुख्य सरोवर के किनारे मां सरस्वती का विशाल मंदिर है। इतिहासकार विनोद पंचौली के अनुसार वर्षों पहले यहां सरस्वती के जल-रूप की ही पूजा-अर्चना होती थी। सन‍् 1900 में पंडित ईश्वरीप्रसाद ने मंदिर का निर्माण कराया। सन‍् 1902 में खुदाई के दौरान मिली चौखट को मंदिर के मुख्यद्वार पर लगा दिया गया, जो सातवीं शताब्दी की मानी जाती है। साल 2013 में मंदिर का नवनिर्माण शुरू किया गया, जो अब भी जारी है। सरस्वती नदी के पूर्वी तट पर मंदिर स्थित है, पश्िचमी तट पर महोत्सव मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के नवम अंश महाराज पृथु ने इस नगर की स्थापना की थी। नाम रखा पृथुदक। जो बाद में पिहोवा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
किंवदंती है कि भगवान कृष्ण की जिह्वा से जब वाणी रूप में सरस्वती प्रकट हुईं, तब माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी थी। इसी पंचमी को भगवान कृष्ण ने सर्वप्रथम सरस्वती का पूजन किया। यह भी मान्यता है कि माघ की सुदी पंचमी को ही पृथुदक की भूमि पर सरस्वती का पावन जल रसातल से बाहर आया था। तभी इस पंचमी को सरस्वती के प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है।


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