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पिताजी का थप्पड़

Posted On January - 5 - 2020

सतीश शर्मा माजरा

यह बात उन दिनों की है जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था। विद्यालय से लौटने के बाद मैं अपने दोस्तों के साथ घर के आंगन में खेल रहा था। खेलते-खेलते मुझे एक दोस्त ने कहा-अरे! हमने स्कूल से मिला गृह कार्य (होमवर्क) भी तो करना है। मैंने कहा-आओ हम सभी हमारे घर में बैठकर ही काम करते हैं। सभी दोस्तों ने मेरे सुझाव पर सहमति जताई। सभी दोस्त अपने-अपने घरों में वापिस गए जो कि मेरे घर के पास ही रहते थे।
थोड़ी ही देर में हम सभी दोस्त मेरे घर में इकट्ठे हो गये। हमने अपनी अपनी किताब-कापियां निकालकर काम करना शुरू किया। कुछ ही देर में मेरे एक दोस्त ने कहा-लगता है आज आपके पिता जी घर पर नहीं हैं, मैंने कहा-नहीं। शायद कहीं बाहर गए हैं। तभी वह दोस्त बोला-आज मेरा मन है कि हम धूम्रपान करें। मैंने भी हां में हां मिला दी। हम अपना होमवर्क कर रहे थे। काम करते-करते वह दोस्त पास की दुकान पर गया और बीड़ी और माचिस लेकर आ गया। उसने मुझसे कहा-लो बीड़ी पीओ। मैंने तुरन्त उसके हाथ से बीड़ी व माचिस ली। परन्तु जैसे ही मैंने बीड़ी के बंडल से बीड़ी निकाल कर हाथ में ली व इसे सुलगाने के लिए माचिस की तीली जलाई तभी न जाने कहां से अचानक पिताजी मेरे पीछे से आए अैर एक थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ दिया। मैं पिताजी को देखकर हैरान रह गया। दूसरे दोस्त भी हैरान थे। बीड़ी हाथ से छूटकर बहुत दूर जा पड़ी। फिर मैं जोर-जोर से रोने लगा। मुझे रोते हुए देख पिताजी ने समझाया धूम्रपान करना बुरी बात है। उसके बाद मैंने धूम्रपान करना तो दूर, इसके बारे में कभी सोचा भी नहीं। पिताजी की यह सीख मुझे आज भी याद है और पूरे जीवन याद रहेगी।


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