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पराया धन नहीं, जिगर का टुकड़ा हैं बेटियां

Posted On January - 5 - 2020

शिखर चंद जैन

‘प्रिया, सुनो! तुम्हारे चाचाजी के यहां पोता हुआ है। मैं और पापा 10 दिनों तक मंदिर में दीया नहीं जलाएंगे। अब तो बेटी तुम ही 10 दिनों तक दीया-बत्ती जलाना।’ मधु ने अपनी 16 वर्षीय बेटी प्रिया से यह बात कही तो वह चकित रह गई। प्रिया ने पूछा, ‘मम्मी ऐसा क्यों? आप और पापा दीया क्यों नहीं जलाएंगे? मधु ने बताया कि घर में बच्चे का जन्म होता है तो 10 दिनों तक सूतक यानी स्यावड रहती है। इसलिए घर के सदस्य पूजा पाठ नहीं करते। प्रिया की जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी। उसने दोबारा पूछा, “लेकिन, मैं भी तो घर की सदस्य हूं ना।’ मधु ने हंसते हुए कहा,“अरे पगली, तू नहीं समझेगी। तू घर की सदस्य है। लेकिन बेटियां पराया धन होती हैं। उन्हें पराए घर जाना होता है। इसलिए ऐसी ही परंपरा है।’ मम्मी की बात सुनकर प्रिया का मन बुझ गया। उसकी आंखों में नमी आ गई।
उसने इतना ही कहा, “तो इसका मतलब बस बेटे ही घर के मेंबर होते हैं और बेटियां पराया धन।’
पुरानी सामाजिक मान्यताएं
सदियों से हमारे समाज में बहुसंख्य महिलाओं की पहचान उनके पिता, पति या पुत्र से ही रही है। बेटों को वंश चलाने वाला, बुढ़ापे में सहारा देने वाला, मुखाग्नि देकर मुक्ति दिलाने वाला माना गया है और बेटियों को जिम्मेदारी और पराया धन। शुरू से ही बेटियों के प्रति यही दृष्टिकोण अपनाया जाता है और यदा-कदा उन्हें इस बात का अहसास भी करवा दिया जाता है। वह जोर से हंसे, घरेलू कामकाज में हाथ ना बंटाए या बालसुलभ हठ के कारण किसी बात की जिद कर ले तो उसे झट कोई ऐसा डायलॉग सुना दिया जाता है, “तेरे ये लक्षण अच्छे नहीं हैं। कल को पराए घर जाएगी तो क्या कहेंगे तेरे सास-ससुर कि बेटी को कुछ लक्खन नहीं सिखाए।”
किसी से कम कहां हैं बेटियां
पढ़े-लिखे लोग भी संतुलित परिवार के लिए एक लड़का और एक लड़की होने की बात करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि बेटियों को पर्याप्त मौका दिया जाए, उनकी पढ़ाई की सही व्यवस्था की जाए, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए, खेलकूद प्रशिक्षण दिया जाए तो वह बेटों से कतई कम नहीं। हाल में ऐसे बहुत से उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें बेटियों ने अपने माता-पिता को कंधा दिया है, मुखाग्नि दी है और बेटों द्वारा माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति में बुढ़ापे में उनका सहारा बनी हैं।
पढ़ाते हैं लेकिन बढ़ाते नहीं
इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड के एक शोध के अनुसार यदि हमारे देश में श्रम शक्ति में लैंगिक भेदभाव को खत्म कर दिया जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था 27 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है। रिसर्च के अनुसार लड़कियों की प्राइमरी एवं हायर सेकेंडरी शिक्षा की दर बढ़ रही है लेकिन यह श्रम शक्ति यानी वर्क फोर्स में तबदील होती नजर नहीं आ रही। ज्यादातर लड़कों को भी होममेकर पत्नी ही चाहिए होती है जो पत्नी की कमाई खाने में अपनी हेठी समझते हैं । इसी वजह से भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी महज 33 फीसद के आसपास है। जबकि वैश्विक अनुपात 50 फ़ीसदी का है और पूर्वी एशिया में यह 63 फीसदी है। इसलिए अपनी बेटी को सिर्फ बढ़ाएं ही नहीं बल्कि उसे अपनी प्रतिभा और पढ़ाई लिखाई का समुचित फायदा भी मिलने दें।
जिगर का टुकड़ा है बेटी
ध्यान रहे, जिस कोख से बेटे ने जन्म लिया है, उसी कोख से बेटी भी आई है। उसकी रगों में भी आपका ही खून दौड़ता है। बेटी को घर में दोयम दर्जे का सदस्य ना मानें। उसे वही सुख-सुविधाएं दें जो आप अपने बेटे को देती हैं। उसका खानपान पौष्टिक हो, फल-सब्जियां आदि समुचित मात्रा में खाए, खेलकूद या अन्य फिजिकल एक्टिविटीज में हिस्सा ले, इन बातों का ध्यान रखें।
मौजूदा युग की इस सच्चाई को भी समझें कि बड़ी संख्या में बेटे शादी होते ही पराए होने लगे हैं। लोगों के अनुभव बताते हैं कि उन्हें मां-बाप की उतनी फिक्र नहीं रहती जितनी बेटियों को रहती है।


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