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नेताजी के जीवन से करें बच्चों को प्रेरित

Posted On January - 19 - 2020

पेरेंटिंग

स्वाति गुप्ता
महान पुरुषों के प्रेरक प्रसंग बच्चों के मन पर गहरा असर डालते हैं। ऐसी ही एक महान शख्सियत हैं नेता जी सुभाष चंद्र बोस। इनके जीवन से बच्चे प्रेरणा ले सकते हैं। नेता जी का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक नामक शहर में जानकीनाथ बोस और प्रभावती देवी के घर में हुआ था। उनके पिता एक प्रसिद्ध वकील थे और उनकी मां एक धार्मिक महिला थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए काफी संघर्ष किया। उनकी जयंती पर हम आपको बता रहे हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे ही पहलुओं के बारे में, जिससे आप अपने बच्चों को प्रेरित करके देशभक्त के साथ ही एक अच्छा इनसान भी बना सकते हैं।
असहाय लोगों की मदद करना
सुभाष चंद्र बोस के घर के सामने एक भिखारिन रहती थी। उसकी दयनीय हालत देखकर उनका दिल दुखता था। उन्हें ये देखकर बहुत कष्ट होता था कि उस औरत को दो समय की रोटी भी नसीब नहीं होती। घर न होने की वजह से बारिश, ठंड व धूप में वह अपनी रक्षा नहीं कर पाती थी। उन्होंने प्रण किया कि यदि हमारे समाज में एक भी व्यक्ति ऐसा है जो अपनी आवश्यकताएं पूरी नहीं कर सकता, तो मुझे सुखी जीवन जीने का क्या अधिकार है। उन्होंने ठान लिया कि सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होगा, कोई ठोस कदम उठाना ही होगा। इसके बाद उन्होंने कॉलेज जाने के लिए मिलने वाले जेब खर्च व किराए को बचाकर उस भिखारिन की मदद शुरू की। उनके घर से कॉलेज 3 कि.मी. दूर था, लेकिन वह किराया बचाकर उसकी मदद के लिए खुद पैदल जाते। इस प्रसंग के जरिये आप बच्चों को असहाय और जरूरतमंद लोगों की मदद करना सिखा सकते हैं।
देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझना
नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल से की थी। इसके बाद की कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से की। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए नेताजी इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। उस समय सिविल सर्विस की परिक्षा में नेताजी ने चौथा स्थान प्राप्त किया था। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर नेताजी सिविल सर्विस छोड़ कर कांग्रेस के साथ जुड़ गए। इसके बाद नेताजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। यहां से वह भारत को आजाद कराने की मुहिम से जुड़ गये। इस प्रसंग के जरिये आप बच्चों को देश के प्रति भी उनका कर्तव्य होता है , बता सकते हैं।
लगन और एकाग्रता से मिलती है कामयाबी
बचपन से ही सुभाष चन्द्र बोस बहुत होशियार थे और सारे विषयों में उनके अच्छे अंक आते थे, लेकिन वे बंगाली में कुछ कमजोर थे। बाकी विषयों की अपेक्षा बंगाली मे उनके अंक कम आते थे। सुभाषचंद्र बोस ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह अपनी भाषा बंगाली सही तरीके से जरूर सीखेंगे। इसलिये उन्होंने बंगाली का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया। उन्होंने कुछ ही समय में उसमें महारथ हासिल कर ली। धीरे-धीरे वार्षिक परीक्षायें निकट आ गई। वे सिर्फ कक्षा में ही प्रथम नहीं आये बल्कि बंगाली में भी उन्होंने सबसे अधिक अंक प्राप्त किये। यह देखकर विद्यार्थी और शिक्षक सभी दंग रहे गये। उन्होंने सुभाष से पूछा-यह कैसे संभव हुआ? तब सुभाष बोले-यदि मन में लगन और एकाग्रता हो तो इनसान कुछ भी हासिल कर सकता है।


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