संविधान के 126वें संशोधन पर हरियाणा की मुहर, राज्य में रिजर्व रहेंगी 2 लोकसभा और 17 विधानसभा सीट !    गुस्साये डीएसपी ने पत्नी पर चलायी गोली !    गांवों में विकास कार्यों के एस्टीमेट बनाने में जुटे अधिकारी !    जो गलत करेगा परिणाम उसी को भुगतने पड़ेंगे : शिक्षा मंत्री !    आस्ट्रेलिया भेजने के नाम पर 9.50 लाख हड़पे !    लख्मीचंद पाठशाला से 2 बच्चे लापता !    वास्तविक खरीदार को ही मिलेगी रजिस्ट्री की अपाइंटमेंट !    वायरल वीडियो ने 48 साल बाद कराया मिलन !    ऊना में प्रसव के बाद महिला की मौत पर बवाल !    न्यूजीलैंड एकादश के खिलाफ शाॅ का शतक !    

निश्चित समय में सज़ा पर अमल जरूरी

Posted On January - 14 - 2020

अनूप भटनागर

निर्भया कांड के दोषियों को फांसी देने की तारीख मुकर्रर होने के बावजूद अभी भी कहना मुश्किल है कि इन मुजरिमों को 22 जनवरी को सज़ा मिल ही जायेगी। चूंकि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार को सबसे ऊंचे पायदान पर रखा गया है, इसलिए मौत की सज़ा के मामले में दोषी को फांसी के फंदे से बचने के लिए सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करने का अवसर मिलता है।
मगर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इस प्रक्रिया में मौत की सज़ा के फैसले पर अमल में विलंब नहीं हो क्योंकि अत्यधिक विलंब भी मौत की सज़ा को आजीवन कारावास की सज़ा में तब्दील करने का मार्ग उपलब्ध कराता है। निर्भया कांड की दिल दहलाने वाली वारदात दिसंबर, 2012 में हुयी थी और अब तक सात साल बीत चुके हैं। इसके बाद इस तरह के अपराध के लिए कानून में कठोरतम सज़ा का प्रावधान कर दिया गया लेकिन ऐसे अपराधों में अभी तक कमी नहीं आयी है।
कारगर अंकुश के लिए ऐसी घटनाओं से संबंधित कानूनी कार्यवाही के लिए एक तर्कसंगत समय-सीमा निर्धारित हो ताकि इन मुकदमों पर फैसला समय से आ सके। यही नहीं, अगर निचली अदालत अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाती है तो ऐसे फैसले की उच्च न्यायालय से पुष्टि करने की प्रक्रिया और फिर उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने से संबंधित सारे विकल्पों के लिए भी समय-सीमा निर्धारित होना जरूरी है। सरकार अगर वास्तव में यौन अपराध करने वाले वहशियों को कठोरतम सज़ा देने के प्रति गंभीर है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह के अपराधियों की सज़ा पर अमल के मामले में विलंब नहीं हो।
संसद भवन आतंकी हमले की घटना में दोषी मोहम्मद अफजल, मुंबई में हुये बम विस्फोटों की वारदातों के सिलसिले में याकूब मेमन और मुंबई में आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी अजमल कसाब की मौत की सज़ा पर अमल से पहले तमाम मानवाधिकार प्रेमियों के प्रयासों को शायद ही कोई भूला हो। याकूब मेमन के मामले में तो उसकी फांसी की सज़ा पर अमल से चंद घंटे पहले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने देर रात उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
किसी अपराधी को अदालत से मिली मौत की सज़ा पर अमल का मुद्दा चूंकि सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है, इसलिए फांसी देने में अनावश्यक विलंब के आरोपों से बचने के लिए सरकार और प्रशासन को आतंकी देविन्दर सिंह भुल्लर के मामले में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित मानकों को ध्यान में रखना होगा। अदालत द्वारा निर्भया के अपराधियों को मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाने का फरमान जारी किये जाने के बाद कम से कम दो अपराधियों ने एक बार फिर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इन्होंने उच्चतम न्यायालय में सुधारात्मक याचिका दायर की है। इन याचिकाओं पर आज न्यायालय विचार करेगा।
दोषी विनय कुमार ने निर्भया मामले में उसकी मौत की सज़ा बरकरार रखने के मई, 2017 के फैसले को कानून की नजर में त्रुटिपूर्ण बताते हुये दलील दी है कि उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज करते समय न्यायालय ने दोषी के सुधरने की संभावनाओं पर विचार ही नहीं किया। यही नहीं, दोषी ने इस तथ्य की ओर भी न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया है कि मई, 2017 के इस फैसले के बाद इसी तरह के कम से कम 17 मामलों में तीन न्यायाधीशों की पीठ दोषियों की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल चुकी है। न्यायालय अगर अपने फैसले में किसी प्रकार के सुधार के लिए दायर याचिका अस्वीकार कर देता है तो भी इन मुजरिमों के पास संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के पास और अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल के पास दया याचिका दायर करने का विकल्प उपलब्ध है। फिलहाल तो यह देखना है कि क्या 22 जनवरी से पहले ये मुजरिम सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर पायेंगे और क्या अंत में राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका, अगर दायर हुयी, का निपटारा निश्चित समय के भीतर हो सकेगा।
निर्भया मामले में हालांकि मुजरिमों की मौत की सज़ा पर अमल में विलंब, चाहे यह कानूनी दांवपेंचों का ही नतीजा क्यों न हो, को लेकर जनता में आक्रोश है। इसके लिए सरकार को कानूनी प्रावधानों और संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के अधिकार को सर्वोच्च पायदान पर रखे जाने की वजह से मौत की सज़ा के मामले में वकीलों द्वारा अंतिम समय तक किये जाने वाले प्रयासों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
नि:संदेह मौत की सज़ा के मामलों में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास आने वाली दया याचिकाओं के निपटारे के लिए एक समय सीमा निर्धारित की जाये। ऐसा करके ही दोषियों की मौत की सज़ा के फैसले पर अमल में अनावश्यक विलंब के आरोपों से बचा जा सकेगा। साथ ही कानून के शासन के तहत घृणित अपराध के लिए मृत्युदंड पाने वाले दोषियों की सज़ा पर एक निश्चित समय के भीतर अमल सुनिश्चित करके समाज को भी यह भरोसा दिलाया जा सकेगा कि इस तरह के अपराध करने वाला कोई व्यक्ति सज़ा से बच नहीं सकता।


Comments Off on निश्चित समय में सज़ा पर अमल जरूरी
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.