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जीवन दृष्टि-दिशा भी बदल सकती है ईर्ष्या

Posted On January - 13 - 2020

अंतर्मन

दिनेश चमोला ‘शैलेश’
जिस प्रकार एक सुंदर चरागाह अथवा जड़ी-बूटी के उद्यान में उपयोगी, खिलखिलाती हरी-हरी व पौष्टिक घास के साथ-साथ विषाक्त व जंगली जड़ी बूटियां भी उगी रहती हैं, उसी प्रकार मानव मन रूपी क्यारी में अच्छे के साथ-साथ कई-कई बुरे भाव भी सहज रूप में उग आते हैं। बहुत बार ज्ञान के अभाव में किसी बात अथवा भाव को हम बुरा सोच-सोच कर अथवा मान-मानकर और अत्यधिक बुरा बना डालते हैं।
वस्तुतः प्रकृति ने संसार अथवा मानव मन की हर वस्तु, पदार्थ व भाव को बहुप्रयोजनी तथा बहुउद्देशीय बनाया है। मानव विशेष की योग्यता, क्षमता, कौशल व ज्ञान-दोहन क्षमता पर यह बात निर्भर करती है कि किसी भी भाव, विचार व वस्तु रूपी दुग्धकोशी-कामधेनु से कितनी कुशलता से वह कितना पयपान करा सकता है। जो अग्नि किसी के चहकते-महकते आनंदरूपी उद्यान को धू-धू कर जला सकती है, वही अग्नि यज्ञ की समिधा के रूप में वेद-ऋचाओं की आधारशिला बन किसी के जड़ व अज्ञानता के हृदय अथवा मानस में भक्ति अथवा अध्यात्म की निर्झरिणी प्रवाहित कर रुखे-सूखे जीवन को भक्ति की मंदाकिनी में भी बदलने की सामर्थ्य भी रखती है। ऐसा ही एक सशक्त भाव मनुष्य को प्रभु से ईर्ष्या के रूप में मिला है।
सामान्य रूप में ईर्ष्या मानव के मन में पनपने वाला, असमर्थता का वह भाव है जो दूसरे की उन्नति व उपलब्धि के कारण अपनी हीन भावना के कारण स्वयं में पैदा होता है। वह व्यक्ति किसी न किसी रूप में स्वयं को उनकी तुलना में अयोग्य, अक्षम व कमतर पाता है व स्वयं वैसा न कर पाने या न बन सकने के कारण ईर्ष्या की चपेट में आकर अपना चैन-अमन अव्यवस्थित कर देता है। ईर्ष्या जहां मन को कुंठित कर प्रगति में स्वयं का मार्ग अवरुद्ध कराती है, वहीं कई प्रकार की मानसिक व शारीरिक बीमारियों को जन्म दे उसे रुग्ण भी बना देती है। लेकिन ईर्ष्या केवल विनाश का ही कारण हो, यह जरूरी नहीं है। इसका सकारात्मक प्रयोग जीवन की दिशा व दृष्टि दोनों ही बदल सकता है।
हॉवर्ड मेडिकल स्कूल में हुई खोजों के अनुसार जीवन में 80 प्रतिशत बीमारियां तनाव से होती हैं। मूल रूप में ईर्ष्या ही तनाव की जन्मदात्री है। प्रसिद्ध तनाव राहत विशेषज्ञ लॉरेन ई. मिल्लर का मानना है कि ईर्ष्या से तनाव पैदा होता है…और तनाव की सीढ़ियां चढ़, रोग, शरीर से मष्तिष्क तक को अपनी चपेट में ले लेता है। दिनभर की कई शारीरिक क्रियाएं व घटनायें तनावी हार्मोनों को तेजी से बढ़ा सकती हैं, जिससे उच्च रक्तचाप के साथ-साथ शरीर में कई गड़बड़ियां तुरंत अपना असर दिखाने लग जाती हैं। इस बात का खुलासा मिल्लर ने अपनी चौथी पुस्तक ’99 थिंग्स यू विश टू नो बिफोर स्ट्रेसिंग आउट’ में खुलकर किया है।
सही मायने में ईर्ष्या, विष व अमृत दोनों ही है। यह हमारी उस बात पर निर्भर करता है कि हम उसका सेवन किस रूप में करते हैं? यदि हम विष रूप में इसका प्रयोग करते हैं तो यह हमारी प्रगति के साथ-साथ हृदय, मष्तिष्क व मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पंगुकर हमें कहीं का भी नहीं छोड़ती। लेकिन यदि अमृत रूप में करें तो यह छोटा सा जीवन उपलब्धियों का गुलदस्ता बन स्मरणीय भी हो सकता है।
जेसिका स्टिलमेन ने अपनी पुस्तक ‘5 स्टेप्स टू स्टॉप बीइंग जेल्स ऑव सम वन्स सक्सेस’ में इन शक्तियों व कमियों को व्यापक दृष्टि से विश्लेषित कर किया है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ईर्ष्या के बिना, मानव जीवन बिना रीढ़ की तरह है। यदि हममें किन्हीं बड़े लोगों की प्रगति, उपलब्धि अथवा विलक्षणता को देख बड़े बनने, बड़े होने या बड़े सपने देखने की ईर्ष्यात्मक ललक पैदा नहीं होती तो हम इस दुनिया में कुछ नहीं कर सकते। कुछ कर या पाकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना हमें गर्वित कर स्वाभिमानी बनाता है। ईर्ष्या जलाने का नहीं, बल्कि सही दिशा में स्वयं के दुर्लभ ज्ञानदीप को जलाकर अपने उद्देश्य में सफल हो स्वयं आगे बढ़, दूसरों को भी आग बढ़ाने की प्रेरणा देने का नाम है।
बहुचर्चित ईर्ष्या विश्लेषक लिंडा बेवान ने अपनी पुस्तक ‘लाइफ विदाउट जैलसी’ के दस अध्यायों में इसका गहन विश्लेषण कर सकारात्मक ईर्ष्या को जीवन की ऊर्जा का सर्वथा सशक्त कैप्सूल माना है। इसके व्यावहारिक व उपयुक्त सेवन से कोई भी अपनी आकांक्षाओं, कामनाओं व सपनों के माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल कर सकता है।
ईर्ष्या की सही आग में जलो… और अपने शत्रु के षड्यंत्रकारी किले ध्वस्त कर स्वयं उपलब्धियों का सरताज पहन सफलता के शहंशाह बन जाओ।


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