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जन संसद

Posted On January - 13 - 2020

सार्वजनिक संपत्ति की क्षतिपूर्ति

विकास थमता है
नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा हो या अन्य कोई भी विरोध प्रदर्शन लेकिन सार्वजनिक संपत्ति और जनता की संपत्ति को क्षति नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों की पहचान करके संपत्ति का हर्जाना वसूलने का जो फैसला किया है, वह सराहनीय कदम है। जरूरत इस बात की है कि किसी निर्दोष को जिम्मेदार न ठहराया जाए। कानून किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाने का अधिकार नहीं देता। इससे देश का विकास थम जाता है, जिसका बोझ आम जनता पर ही पड़ता है।

रमेश चन्द्र पुहाल, पानीपत

हमारा ही नुकसान
पिछले दिनों देश में सीएए पर काफी बवाल हुआ। यही नहीं, इस कानून के विरोध में सार्वजनिक और सरकारी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया गया। विरोध प्रदर्शन का यह तरीका शायद ही किसी ने ठीक ठहराया हो। इन कृत्यों पर उ.प्र. सरकार ने दंगों में शामिल दंगइयों की संपत्ति नीलाम कर नुकसान की भरपायी की घोषणा की है। इसी प्रकार की घोषणा हरियाणा सरकार ने भी ‘राम रहीम’ प्रकरण के समय पर की थी। इससे जहां दंगइयों के मन में दंड का भय पैदा होगा, वहीं आमजन पर खाक हुई संपत्ति का बोझ कम होगा। दंगइयों को समझना चाहिए कि दीर्घकाल में नुकसान का प्रभाव आमजन पर ही पड़ता है।

अंकित शर्मा, दिल्ली

वसूली सबक
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर जो लोग विरोध कर रहे हैं उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। जो नुकसान हुआ है उसकी वसूली उन आंदोलनकारियों से होनी चाहिए। आंदोलन चाहे राजनीतिक हो या गैर-राजनीतिक, लोकतंत्र के दायरे में रहकर ही होने चाहिए। समय आ गया है कि कानून में जरूरी फेरबदल करके ऐसा प्रावधान होना चाहिए, जिसमें दंगइयों से क्षति की पूरी रकम वसूलकर सख्त से सख्त जेल होनी चाहिए। यह देशहित में भी होगा।

दिव्येश चोवटिया, गुजरात

राष्ट्रहित सर्वोपरि
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के अधिकार कर्तव्य निश्चित किये गये हैं। अगर इनका दुरुपयोग करके व्यक्ति आगजनी, हिंसा के जरिये सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। राजनीति की रोटियां सेंकने वाले विपक्षी नेताओं को हिंसक गतिविधियों में भागीदारी करने के आरोप में दंडित किया जाए, उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाए। विरोध की आड़ में हिंसा उपद्रव रचने वालों से भारी जुर्माना वसूला जाए। इसके लिए जेल का प्रावधान भी उचित है। वरना राष्ट्र विकास की दौड़ में पीछे रह जायेगा। राष्ट्रहित ही सर्वोपरि होना चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क कैथल

सज़ा का दायरा बढ़े
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों से वसूली का फैसला सरकार का उचित कदम है। लेकिन ऐसी व्यवस्था देश में तभी कामयाब हो सकती है, जब सत्ताधारी और राजनेता धरने-प्रदर्शनों पर राजनीति की रोटियां सेंकने की कोशिश न करें। पुलिस को भी अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी। सार्वजनिक संपत्ति को क्षति मतलब मात्र तोड़फोड़ तक ही सीमित न रखा जाए बल्कि सड़कों, रेल लाइनों को अवरुद्ध करने या बाजार बंद को भी इसके दायरे में लाया जाना चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

नेता भी नपें
लोकतंत्र की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति, रेल, बस, एम्बुलेंस, पुलिस वैन आदि तोड़फोड़ की जाती है। इस कारण स्कूली बच्चों, मरीजों और उसके परिजन व रोजमर्रा के काम में लगे लोगों को न केवल परेशानी झेलनी पड़ती है अपितु कभी-कभी जान भी खतरे में पड़ जाती है। उ.प्र. सरकार ने अराजक तत्वों के खिलाफ कमर कसी है तो इससे न केवल उन्मादियों में एक भय व्याप्त हुआ है अपितु ‘रूल आॅफ लाॅ’ की अवधारणा को भी व्यावहारिक बल मिला है। कोशिश हो कि जो कोई भी राजनीतिक पार्टी आंदोलन को उकसाने में हो, उस पर भी सख्त कार्रवाई हो।

हर्षवर्द्धन, कदमकुआं, पटना, बिहार

दायरा बढ़े
उ.प्र. सरकार का सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली करना सराहनीय कदम है, जिसका खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। अन्य राज्य सरकारों को भी देशहित में पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ऐसा ही कदम उठाना चाहिए। यह कदम तभी सार्थक होगा जब बगैर किसी भेदभाव के सभी से सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की वसूली की जाए। इस तरह के कदम उठाने से उन असामाजिक तत्वों, राजनीतिक दलों व संगठनों को सबक सिखाया जा सकेगा, जो सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने में जरा-सा भी नहीं हिचकिचाते हैं। राजनीतिक आंदोलन भी इसी श्रेणी में आने चाहिए।

राम मूरत ‘राही’, सूर्यदेव नगर, इंदौर, म.प्र.


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