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क्यों नहीं हो पाया कमाल?

Posted On January - 6 - 2020

कलाम का विजन 2020
पुष्परंजन
भारत में जो विजन तैयार हुआ, उसकी आवश्यकता सिंगापुर को क्यों आन पड़ी? डेढ़ साल पहले 21 जुलाई 2018 को, जिसने भी अब्दुल कलाम विज़न सोसायटी (एकेवीएस) के बारे में सुना, उसके दिमाग में सबसे पहला सवाल यही कौंधा था। उस समय 400 लोगों की उपस्थिति में ‘एकेवीएस’ को सिंगापुर में लांच किया गया था। उस समारोह में सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त जावेद अशरफ थे, तो ज़ाहिर था कि भारतीय विदेश मंत्रालय की स्वीकृति इसके लिए मिली होगी। पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम के तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार डाॅ. वी पोनराज ने उस मौके पर कहा था कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि, ऊर्जा, जल और अधोसंरचना के क्षेत्र में दुनिया के जिस हिस्से में दिक्कतें आएंगी, ‘एकेवीएस’ की ओर से हम सुझाव देंगे, सहयोग करेंगे।
लांच के समय ‘एकेवीएस’ द्वारा सालाना संगोष्ठी कराने पर भी विचार किया गया था। पूर्व राजनयिक के. केशवापानी ने तब कहा भी था कि सामाजिक समरसता, वैज्ञानिक सहयोग, आर्थिक असमानता दूर करने का जो सपना पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. कलाम ने संजोया था, उसे हम पूरा करेंगे। उन तमाम संकल्पों पर ‘एकेवीएस’ कितना आगे बढ़ पाया? इस सवाल का उत्तर संतोषजनक नहीं है। ‘एकेवीएस’ सिंगापुर का फेसबुक पेज खोलेंगे, इस सच से रूबरू हो जाएंगे।
क्या चाहते थे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम? एक लाइन में कहा जाए, तो उन्होंने भारत को 2020 तक एक विकसित राष्ट्र के रूप में तैयार हो जाने का सपना देखा था। उसके लिए 500 विशेषज्ञों की टीम ने ‘इंडिया विजन-2020’ नामक दस्तावेज तैयार किया था। मिसाइल मैन ने उन लक्ष्यों की प्राप्ति के वास्ते 5 सूत्र दिये थे। पहला, भारत में बढ़ती आबादी को देखते हुए देश में कृषि और खाद्य प्रसंस्करण का उत्पादन दोगुना करने की आवश्यकता है। दूसरा, बिजलीकरण को गांवों तक ले जाना होगा, और सौर ऊर्जा उत्पादन को आगे बढ़ाना होगा। तीसरा, देश में निरक्षरता को समाप्त करना होगा और सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सबको उपलब्ध हो, यह सुनिश्चित करना होगा। चौथा सूत्र, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी को दुरुस्त करना व शिक्षा के क्षेत्र में ई-गवर्नेंस, टेलीकम्युनिकेशन, टेली-मेडिसिन्स को बढ़ावा देना। पांचवां, नाभिकीय तकनीक में विकास, अंतरिक्ष व रक्षा के क्षेत्र में मजबूती देना। ये 5 सूत्र एक दृष्टिपत्र के माध्यम से पूरे देश को दिए गए थे।
जब यह सब कुछ हुआ था, उस समय तक एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति नहीं बने थे। 1982 में जब वे ‘डीआरडीओ’ में प्रक्षेपास्त्र विकसित करने के कार्यक्रम में लगे हुए थे, देश उन्हें ‘मिसाइल मैन’ के रूप में जानता था। पता नहीं ऐसा क्या कुछ हुआ, मिसाइल के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम से हटकर उन्होंने 1992 से 1997 तक तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री का वैज्ञानिक सलाहकार होना पसंद किया। मगर, मई 1998 में पोखरण-टू नाभिकीय परीक्षण के बाद पूरी दुनिया जान गई कि एपीजे अब्दुल कलाम किस महान कार्य को अंजाम दे रहे थे। उसके तुरंत बाद एपीजे अब्दुल कलाम विजन-2020 के साथ देश के सामने आये, जिसकी परिकल्पना कोई राष्ट्र निर्माता ही कर सकता था।
यह 22 साल पहले की बात है, जब 1998 में उन्होंने ‘टेक्नोलाॅजी विजन-2020’ की रूपरेखा एक टीम को नेतृत्व देते हुए तैयार कराई थी। इस दृष्टि दस्तावेज को तैयार करने के लिए ‘टेक्नालाॅजी इन्फार्मेशन, फाॅरकास्टिंग एंड असेसमेंट काउंसिल’ (टीआईएफएसी) जैसे अदारे के 500 शोधार्थी-वैज्ञानिक लगाये गये थे। डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस रोडमैप को देश और दुनियाभर में सराहा गया था। विजन-2020 को उस समय का छात्र और सामान्य पढ़ा-लिखा आदमी समझे, इसके लिए उन्होंने देशभर में सैकड़ों मीटिंग और सेमिनार आयोजित किये थे।
इस महत्वाकांक्षी दृष्टि दस्तावेज को एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक, ‘इंडिया 2020 : ए विजन फाॅर द न्यू मिलेनियम’ में विस्तार से बताया था। पुस्तक में यह सुझाव दिया गया कि भारत में सौर ऊर्जा को सस्ता करने के वास्ते नैनो सोलर सेल विकसित किये जाएं, उससे गांव के गरीबों तक को रोशनी मुहैया हो जाएगी। डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने डेयरी इंडिया पर एक लेख लिखकर अपना विजन स्पष्ट किया था कि देश में दूध उत्पादन को बढ़ाने के वास्ते क्या-क्या उपाय किये जा सकते हैं।
यह स्मरण रखने लायक बात है कि राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी से डाॅ. कलाम मुक्त हुए, तो लक्ष्य रखा कि देश के एक लाख छात्रों से विभिन्न अवसरों पर मिलें, और न्यू मिलेनियम के बारे में संवाद करें। 83 साल की उम्र में भी वे कितने जीवट वाले थे, वह उनके जीवन की अंतिम वेला से स्पष्ट हो जाता है। 27 जुलाई 2015 को आईआईएम शिलांग के मंच पर ‘रहने योग्य ग्रह’ विषय पर डाॅ. कलाम व्याख्यान दे रहे थे, अचानक मूर्च्छित होकर गिर पड़े, इसके प्रकारांतर हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई। यह सोचकर तकलीफ होती है कि उनकी मृत्यु पर हर दल-जमात के लोगों ने संवेदना व्यक्त की, लेकिन उन सपनों को साकार करने की बात नहीं हुई, जिसका इंतज़ार वर्ष 2020 कर रहा था। उस समय हमारे पास उन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए 5 साल और थे। लेकिन, राजनीति की राह में कुछ ऐसे विषयों को आगे रख दिया गया, जिसकी वजह से विकास के वो 5 मंत्र हाशिये पर चले गये।
प्रश्न यह है कि उन 5 लक्ष्यों को हम कितना छू पाये हैं? 2020 में जो चेतनशील पीढ़ी है, वह तो पूछेगी ही। देश की जीडीपी में कृषि से पैदा आय की भागीदारी 18 प्रतिशत है। कृषि मंत्रालय ने 2018-19 की जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार, ‘भारत में सकल बुआई क्षेत्र कुल भौगोलिक क्षेत्र का 43 प्रतिशत है।’ सरकार बोल रही है हम किसानों का कर्ज़ माफ कर रहे हैं, 2022 तक किसानों की इनकम डबल करने जा रहे हैं। फसल बीमा सफल कार्यक्रम है। तो फिर किसानों की आत्महत्या में कमी क्यों नहीं आई? कृषि मंत्रालय ने 2018-19 की रिपोर्ट में महसूस किया कि पशुधन व मछली पालन से किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। तो 20 साल से क्या कर रहे थे?
कृषि मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, ‘देश में सकल सिंचित क्षेत्र 68.4 मिलियन हेक्टेयर है।’ पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव परमेश्वरन अय्यर पिछले हफ्ते बंगलुरू की एक संगोष्ठी में बोल रहे थे कि गेहूं, धान, गन्ना की फसलें तैयार करने में पानी का इस्तेमाल बहुत होता है, इसलिए सरकार का प्रयास है कि कम पानी वाली फसल की तरफ हम शिफ्ट हो जाएं। उसके लिए सरकार प्रोत्साहन राशि भी दे रही है। परमेश्वरन ने हरियाणा के किसानों का उदाहरण दिया, कि वहां के किसान इसके बदले बाजरा की खेती के लिए प्रोत्साहित किये जा रहे हैं। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव परमेश्वरन के अनुसार, ‘भारत में अमेरिका और चीन के बराबर जल की खपत है। भारत में कुल जल उपलब्धता का 90 फीसद केवल खेती में खर्च हो जाता है।’
ब्राजील के बाद भारत गन्ना पैदा करने के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर है। हमारे देश में बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलांगाना, कर्नाटक में गन्ने की बड़े पैमाने पर खेती होती है। विश्व के कुल गेहूं उत्पादन का 12 प्रतिशत भारत के किसान पैदा करते हैं। धान भी विश्व में कुल उत्पादन का 21.6 प्रतिशत हमारे यहां होता है।
अब पानी के लिए जो विजन और समाधान लेकर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव परमेश्वरन लेकर आये हैं, वो तो किसानों के लिए हाहाकारी है। हर नल से जल देने के बदले, आप क्या खेती का पूरा मानचित्र बदल देंगे? बंगलुरू में शेखर गुप्ता के शो में परमेश्वरन बोल रहे थे, ‘गन्ने के वास्ते इतना जल बर्बाद करने से अच्छा है कि हम विदेश से चीनी आयात कर लें!’ ऐसे विजन पर अमल हो, तो देश में जर्जर होती, दशकों से कराह रही चीनी मिलों का क्या होगा?
फूड प्रोसेसिंग उद्योग की हालत को नीति आयोग की रिपोर्ट से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘भारत में 90 हजार करोड़ के कृषि उपज जिनमें फल-सब्जियां शामिल हैं, बर्बाद हो जाती हैं।’ देश में 60 प्रतिशत कोल्ड स्टोरेज गुजरात, पंजाब, पश्चिम बंगाल और यूपी में है। पूरे देश में क्यों नहीं है कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता? दूसरे इलाकों में कोल्ड स्टोरेज नहीं बनने की सबसे बड़ी वजह बिजली सप्लाई का नहीं होना भी रहा है।
1998 में ‘विजन-2020’ के बावजूद, खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में हम कछुआ चाल ही चलते रहे। हम बगल में थाईलैंड को नहीं देखते, जो फूड प्रोसेसिंग के व्यापार में पूरी दुनिया में नंबर वन पर है। थाईलैंड की जीडीपी में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का 23 फीसद योगदान है। दुनिया के फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में थाईलैंड की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत है, दूसरे नंबर पर अर्जेंटीना है, जिसकी हिस्सेदारी 7 फीसद है, और ब्राजील का 4 प्रतिशत योगदान है। कैसा दुर्भाग्य है, कृषि प्रधान देश कहे जाने वाले भारत की सूई सिर्फ 2 फीसद पर अटकी हुई है। 2018-19 के बजट में सरकार ने 22 हजार ग्रामीण हाट खोले जाने की घोषणा की थी, ताकि किसानों का माल सीधा फूड प्रोसेसिंग फैक्टरी वाले ख़रीदें। मगर, क्या वाकई ऐसे हाट दिखने लगे हैं? आप इन हाटों की रियलटी चेक करें, तो पता चल जाएगा कि किसानों को अब भी उनके उत्पादों का सही मूल्य नहीं मिलता, और बिचौलिये मंडी को नियंत्रित कर रहे हैं।
डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम का शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर जबरदस्त जोर था। आब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार, 2019 तक भारत में 15 वर्ष से ऊपर के 73.2 प्रतिशत वयस्क शिक्षित रिकार्ड किये गये हैं। अब भी इस देश में 31 करोड़ 30 लाख लोगों का साक्षर होना बाकी है। इन निरक्षरों में 59 प्रतिशत महिलाएं हैं। विकसित देशों से सामाजिक सुरक्षा की तुलना हम करें तो भारत अभी कोसों दूर है। हेल्थ केयर, मातृत्व सुविधा, वृद्धावस्था, विकलांगता, बेरोजगारी, निराश्रित, रोजगार गारंटी बेनीफिट, काम करते समय घायल हो जाने पर सामाजिक सुरक्षा की जो सुनिश्चितता यूरोप-अमेरिका में है, उससे हम कोसों दूर हैं।
डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम इन्हीं सामाजिक सुरक्षा की बात कर रहे थे। केवल 5 लाख के स्वास्थ्य बीमा की घोषणा हमने कर दी और सरकारी अस्पतालों में भीड़ को नजरअंदाज कर नारे देने में लग गये, इससे सामाजिक सुरक्षा के लक्ष्य पूरे नहीं होते। श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने लोकसभा में सोशल सिक्योरिटी कोड-2019 पेश कर यह बताना चाहा है कि देश के 50 करोड़ वर्कर इससे लाभान्वित होंगे। इसके जमीन पर उतरने के बाद पता चलेगा कि ऐसे कोड से कितनों का भला हुआ।
ऊर्जा, ई-कामर्स, नाभिकीय अनुसंधान और अंतरिक्ष : जहां किया हमने बेहतर
जहां सरकार उपलब्धियों का दावा कर सकती है, वह है गांवों तक बिजली को ले जाना। इसमें 90 फीसदी कामयाबी को हमें उपलब्धि मानना चाहिए। 2019 तक सरकार ने देश के बाकी 18 हजार 452 गांवों तक विद्युत मुहैया करा दी? इस प्रश्न का उत्तर मिलना बाकी है। मगर, बड़ा सवाल यह भी है कि गांवों और देश के छोटे-छोटे कस्बों को क्या 24 घंटे बिजली मिल रही है? 2 मई को केरल के महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी कोट्ठयम में नैनो इंडिया नेशनल काॅन्फ्रेस-2019 आयोजित हुआ था। ऊर्जा और कृषि के क्षेत्र में सस्ते नैनो सोलर पैनल की आवश्यकता क्यों है, इसे समझाने की कोशिश सम्मेलन में आये प्रोफेसर सीएनआर राव ने की थी।
सौर व पवन ऊर्जा के क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। 20 गीगावाट सोलर पावर का ल़क्ष्य चार साल पहले भारत ने प्राप्त कर लिया, ऐसी घोषणा डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाॅजी (डीएसटी) के प्रमुख अखिलेश गुप्ता ने कर दी। इनके अनुसार, ‘2022 में भारत 100 गीगावाट सोलर पावर वाला देश बन जाएगा।’ डीएसटी के प्रमुख अखिलेश गुप्ता के अनुसार, ‘पवन ऊर्जा के क्षेत्र में 36 हजार 625 मेगावाट बिजली की क्षमता हासिल कर भारत, विश्व का चौथा विंड पावर उत्पादक देश बन चुका है।’ भारत में ई-कामर्स का मार्केट 2017 में 39 अरब डाॅलर का था, 2020 में इसे 120 अरब डाॅलर को छू लेना है। यह ग्रोथ 51 फीसद है, जो पूरी दुनिया में सबसे अधिक बतायी जा रही है। 2020 में हम 5-जी की सुविधाओं से लैस होंगे, यह संचार प्रौद्योगिकी और टेली-मेडिसिन्स के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम होने जा रहा है। संभवतः 5जी की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में ई-गवर्नेंस की भूमिका बड़ी हो जाए। टेली-मेडिसिन्स और शिक्षा एक बड़ी मार्केट है, जिस पर विकसित देशों का एकाधिकार है। बावजूद इन उपलब्धियों के, जब साइबर लुटेरों और डाटा चोरी रोकने की जवाबदेही लेने से सरकार के मंत्री मुंह मोड़ते हैं, तब सारी सूचना क्रांति छलावा साबित होने लगती है। इसमें कहने की आवश्यकता नहीं कि डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम का पांचवा मंत्र, ‘नाभिकीय तकनीक, अंतरिक्ष व रक्षा के क्षेत्र में विकास’ पर गंभीरता से काम हुआ है। 2019 में चंद्रयान-2 को भेजना चरम उपलब्धि थी। आज मिसाइल कार्यक्रमों के मामले में भारत दुनिया के उन्नत देशों की पांत में खड़ा है। इस महकमे की बुनियाद को डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे महानुभावों ने मजबूत किया था।


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