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कृषकाय और शर्मीले कालीनाथ रे थे एक कठोर संपादक : रामचंद्रन

Posted On January - 28 - 2020

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान में चर्चा में भाग लेते द ट्रिब्यून के संपादक राजेश रामचंद्रन व अन्य। -ट्रिन्यू

नोनिका सिंह
क्या जलियांवाला बाग कांड ब्रिटिश हुकूमत की पहले से सोची-समझी साजिश का नतीजा था, ठीक इसके विपरीत जैसा कि व्यापक तौर पर माना जाता है कि यह निर्णय में मामूली चूक थी? क्या रबिंद्रनाथ टैगोर के नाइटहुड की उपाधि त्यागने के पीछे द ट्रिब्यून के संपादक कालीनाथ रे की कोई भूमिका थी? किस चीज ने मितभाषी रे को ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बोलने को विवश कर दिया?
इन सब बातों को ‘द ट्रिब्यून’ के संपादक राजेश रामचंद्रन की किताब ‘मार्टर्डम टू फ्रीडम’ पर एक विचारपूर्ण एवं चीरफाड़ करने वाले सत्र में न केवल उठाया गया बल्कि इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब भी दिये गये। सत्र में इस घटना पर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को वक्रता देने वाले एक उत्प्ररेक के तौर पर भी रोशनी डाली गयी। रामचंद्रन के जानकारीप्रद निबंध के साथ संपादित की गयी द ट्रिब्यून की पुस्तक ‘मार्टर्डम टू फ्रीडम : 100 ईयर्स आफ जलियांवाला बाग’ पर बातचीत में को-पैनलिस्ट सलिल मिश्रा ने इस पर जोर दिया कि कैसे द ट्रिब्यून का राष्ट्रवाद के साथ एक लंबा साथ रहा है। रामचंद्रन ने याद दिलाया कि कैसे कृषकाय और शर्मीले से दिखने वाले कालीनाथ रे कितने कठोर थे, उन्होंने याद किया कि कैसे उन दिनों सही अर्थों में राष्ट्रवाद शब्द का अस्तित्व था। आज की तरह नहीं कि गाहे-बगाहे जब देखो ‘भारत माता की जय’ के नारे लगा दिये जाते हैं, तब केवल किसी मकसद से ही ऐसे नारे लगाये जाते थे। रे जैसे व्यक्ति जो कहते थे वो ही उनका सही में मतलब होता था। इसके अलावा लोग उन्हें पसंद करते थे, कोई विद्वेष नहीं रखते थे।
रामचंद्रन ने रहस्योद्घाटन किया कि कैसे एक पल के लिये भी रे ने कार्यकारी ब्रिगेडियर-जनरल रेनाल्ड डायर की बेरहमी और बेहया निर्लज्जतापूर्ण रवैये को दर्ज करने के प्रति जीवटता में कोई कमी नहीं दिखायी, जिसने ब्रिटिश भारत की सेना को निहत्थी जनता पर गोलियां चलाने का हुक्म दिया था। लेखक व पत्रकार अनिता आनंद ने सत्र को मॉडरेट किया, उन्होंने खुद भी ‘द पेशंट ऐसासिन’ नाम से शहीद उधम सिंह पर एक पुस्तक लिखी है, ने भी भारतीय इतिहास के इस दर्दनाक कालखंड के बारे में कई अहम बातें बतायी। यह निश्चित तौर पर एक उत्प्ररेक था और जैसा कि मिश्रा का मत है ब्रिटिश की उदारवादी लोकतांत्रिक छवि को गहरा आघात पहुंचा, इसने सभी वर्गों के भारतीयों को एक कर दिया। असल में, 13 अप्रैल 1919 आज भी सालता है और लोगों को जोड़ता भी है। आनंद और पूर्व कूटनीतिज्ञ एवं लेखक नवदीप सूरी ने इस त्रासदी में बचे और इसके गवाह रहे अपने दादाओं के अनुभव साझा किये। जैसे ही नवदीप ने अपने दादा, पंजाबी के बड़े उपन्यासकार नानक सिंह, की खुद ही अंग्रेजी में अनुवाद की कविता ‘खूनी वैसाखी’ पढ़ी तो बर्बरतापूर्ण वो दृश्य सबकी आंखों के सामने तैरने लगा और सभी लोग सिहर उठे। रामचंद्रन ने हालांकि आज के युवाओं में भरोसा जताया कि वे प्रदर्शन का साहस रखते हैं, और भारत के विचार को प्राप्त करने के लिये गलियों-सड़कों पर उतरने का माद्दा है। इस पुस्तक में कई अहम ऐतिहासिक चिन्ह एवं प्रेरणादायी कहानियां हैं।


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