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कल के लिए बचाना होगा आज

Posted On January - 13 - 2020

अमलेंदु भूषण खां
पहले उत्तर प्रदेश फिर बिहार और अब राजस्थान के कोटा में लगातार हो रही बच्चों की मौत पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष कोई भी इन मौतों की गहराई तक जाना नहीं चाहता। पूरी दुनिया में सेहतमंद देश कहलाने के लिए शिशु मृत्यु दर पर अंकुश लगाना जरूरी माना जाता है। मृत्यु दर जितनी कम होगी, देश उतना अधिक सेहतमंद कहलाएगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में नवजात शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आई है, लेकिन आजादी के 73 साल गुजरने के बावजूद दुनिया के कई देशों से भारत अभी भी काफी आगे है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 में भारत की शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 पर 129 थी, जो 2005 में घटकर 58 हो गई। वर्ष 2017 में यह आंकड़े प्रति 1000 पर 39 रह गया। साथ ही, दुनियाभर में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा घटकर 18 प्रतिशत हो गया। यानी भारत में दुनिया के 18 फीसदी बच्चे पैदा होते थे और इनमें से 18 फीसदी बच्चों की मौत हो जाती थी। लेकिन साल 2017 में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का आंकड़ा पहली बार 10 लाख से कम रहा। भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर पहली बार दुनिया के बराबर आ गई। इससे पहले तक भारत की दर पूरी दुनिया के मुकाबले कहीं ज्यादा थी।
बच्चों की मौत के मामले में लड़कों की तुलना में लड़कियों की मौतें ज्यादा होती थीं, लेकिन लोगों में बढ़ती जागरूकता से इसमें भी कमी आई है। इसी का परिणाम है कि लड़के और लड़कियों की मौत का अंतर भी कम हुआ है। पहले लड़कों के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा लड़कियों की मौत होती थी, लेकिन वर्ष 2017 में यह घटकर 2.5 फीसदी रह गई।
2017 के दौरान दुनियाभर में बच्चों की जितनी भी मौते हुईं, उनमें से आधी अफ्रीका और 30 फीसदी दक्षिण एशिया में हुईं। दक्षिण एशिया में बड़े-बड़े देश हैं और अफ्रीका में छोटे-छोटे देश हैं, इसलिए इन महाद्वीपों में मौतों की संख्या ज्यादा दर्ज की जाती है। शिशु मृत्यु दर के हिसाब से देखें तो अफ्रीका की दर 76 है और एशिया की शिशु मृत्यु दर 44 है। अफ्रीका के कुछ देशों में 80, 90 तो किसी में शिशु मृत्यु दर 100 तक है, जबकि दक्षिण एशिया के देशों में ऐसा नहीं है। हालांकि, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत की शिशु मृत्यु दर कम है, लेकिन लैंगिक आधार पर देखा जाए तो पाकिस्तान की स्थिति भारत से बेहतर है।
2017 के दौरान भारत में लड़कों की मृत्यु दर प्रति 1,000 बच्चों पर 39 थी, जबकि लड़कियों में यह प्रति 1,000 बच्चियों पर 40 थी। वहीं, पाकिस्तान में लड़कों की मृत्यु दर प्रति 1,000 बच्चे पर 78 थी, जबकि लड़कियों में यह प्रति 1,000 बच्चियों पर 71 थी।
बच्चों की मौत के लिए जो सबसे बड़ा कारक है, वह है गरीबी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2018 बहुआयामी वैश्विक गरीबी सूचकांक रपट की मानें तो वित्त वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच के एक दशक में भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं। इस समय देश की आबादी लगभग 135 करोड़ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में 1.3 अरब लोग बहुआयामी गरीबी में जीवन बिता रहे हैं, जो 104 देशों की कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में दस बरसों की अवधि में गरीब लोगों की संख्या घटकर आधी रह गई है, जो 55 फीसदी से कम होकर 28 फीसदी रह गई है।
रिपोर्ट में कहा गया भारत में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गरीबों की संख्या सबसे अधिक है। करीब 19.6 करोड़ की आबादी वाले इन चारों राज्यों में पूरे देश के आधे से ज्यादा गरीब रहते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली, केरल और गोवा में गरीबों की संख्या सबसे कम है। भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है। आजादी के 71 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। अब तक यही कहा जा रहा था कि सरकार के प्रयासों के बाद भी देश में गरीबी कम होने का नाम नहीं ले रही है। विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया में करीब 76 करोड़ गरीब हैं, इनमें भारत में करीब 22.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। भारत के 7 राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और यूपी में करीब 60 प्रतिशत गरीब अाबादी रहती है। 80 प्रतिशत गरीब भारत के गांवों में रहते हैं। लोकसभा में भारत सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से अनुसूचित जनजाति के 45 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 31.5 प्रतिशत लोग इस रेखा के नीचे आते हैं।
नीति आयोग ने हाल ही में अपने एक प्रस्तुतीकरण में कहा था कि साल 2022 तक देश को गरीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता-इन छह समस्याओं से निजात दिलाने के लिए जमीन तैयार कर ली जाएगी। जब देश 2022 में स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा। देश की तरक्की को कोई नकार नहीं सकता, लेकिन गरीबी से कोई भी सरकार मुंह नहीं चुरा सकती। सच्चाई यह है कि आजादी के 73 साल बाद भी देश गरीबी और भुखमरी की चपेट में है। गरीबी के कारण कई बच्चों को भरपेट खाना नहीं मिलता और वे कुपोषण की चपेट में आकर काल के गाल में समा जाते हैं। भुखमरी के चलते बच्चों की मौत शरीर में पोषक तत्वों की कमी और काफी समय से पौष्टिक खाना नहीं मिलने से हो जाती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्ष बाद भी भारत में एक बहुत बड़ी आबादी रोजाना भूखे पेट सोने को मजबूर है तो दूसरी तरफ हजारों टन अनाज फेंक दिया जाता है या सड़ दिया जाता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल एवं 21 टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के चलते खराब हो जाती हैं।
भारत में भूखमरी गंभीर समस्या है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 119 देशों की सूची में हम 103वें पायदान पर हैं। भुखमरी की गंभीरता को अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में भुखमरी गंभीर समस्या है।
भूखे पेट कोई भी व्यक्ति न सोये इसके लिए गरीब परिवारों को बीपीएल कार्ड जारी किया गया है। बीपीएल कार्ड के जरिए हर महीने 35 किलो चावल 3 रुपये की दर से उपलब्ध कराती है। चावल के साथ-साथ गेहूं, चीनी, नमक, कैरोसिन तेल भी मिलता है। इतना ही नहीं, बच्चों के भूख और कुपोषण से निपटने के लिए एकीकृत बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत 1975 से आंगनबाड़ी केंद्र भारत सरकार ने शुरू किया था। जो भारतीय गांवों में बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करता है। यह भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का एक हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 15 लाख आंगनबाड़ी और मिनी आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं। ये केंद्र पूरक पोषण प्रदान करते हैं। प्राथमिक स्कूलों में दोपहर का भोजन भी छात्रों को उपलब्ध कराया जाता है, जिससे बच्चे कुपोषित होकर किसी गंभीर बीमारी की चपेट में न आएं। लेकिन कई राज्यों में इस कार्यक्रम में भारी अनियमितता बरती जाती है। सेहतमंद होने के बावजूद यह जरूरी है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत हो। ऐसा तभी संभव है जब स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए काफी बजट आवंटित किया जाए, लेकिन सरकार हमेशा से स्वास्थ क्षेत्र में कंजूसी दिखाती आई है। साल 2019 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 62,398 करोड़ रुपये बजट आवंटित किया गया, जो पिछले बजट की तुलना में 19 फीसदी अधिक था। साल 2018-2019 के लिए पेश बजट में इस क्षेत्र को 52,800 करोड़ रुपये दिये गए थे। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से ज्यादा बच्चों की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि अगर देश की स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत होती तो चमकी बुखार से बच्चों की इतनी संख्या में मौतें न होती। हालात ये हैं कि देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के बीच अगर यह अपेक्षा रखें कि बच्चों की हो रही मौतों पर काबू पाया जा सकता है तो यह नामुमकिन है, इसलिए सरकार को चाहिए कि स्वास्थ्य बजट में पड़ोसी देशों की नीति को अपनाएं।
राजस्थान कोटा का जेके लोन अस्पताल
20 दिन में 104 मौतें
पिछले साल 23-24 दिसंबर से राजस्थान के कोटा स्थित जेके लोन अस्पताल में शुरू हुआ नवजात बच्चों की मौत का सिलसिला नये साल 2020 की शुरुआत में भी नहीं रुका। इस दौरान अस्पताल में 104 नवजात बच्चे दम तोड़ चुके हैं। अहम सवाल यह है कि आखिर इतने बच्चों की मौत आखिर क्यों हुई? जेके लोन अस्पताल का कहना है कि सभी बच्चों की मौत कम वजन के कारण हुई। वहीं, कुछ अन्य रिपोर्ट की मानें तो बच्चों की कई अलग-अलग वजहों के कारण मौत हुई है। नवजातों की मौत का कारण निमोनिया, सेप्टिसिमिया, सांस की तकलीफ जैसी वजहें हैं। उधर, नेशनल कमिशन फॉर प्रॉटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ( एनसीपीसीआर) ने अस्पताल का दौरा करने के दौरान पाया कि अस्पताल की खिड़कियों में शीशे नहीं हैं और दरवाजे टूटे हुए हैं, जिससे बच्चों को ठंड लग गई। एनसीपीसीआर के चैयरमैन प्रियांक कानूनगो ने कहा कि अस्पताल परिसर में सूअर घूम रहे थे। स्टाफ की काफी कमी थी। उधर, इस मामले में सियासत भी खूब हो रही है। राज्य की कांग्रेस सरकार चौतरफा विरोध का सामना कर रही है। विपक्षी भाजपा अशोक गहलोत सरकार पर निशाना साध रही है। दूसरी तरफ गहलोत इस मुद्दे पर सियासत नहीं करने की अपील कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश गोरखपुर का बीआरडी अस्पताल
5 दिन में 64 मौतें
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 5 दिन में एक के बाद एक 64 नौनिहालों की मौत हो गई थी। शुरुआत में मौत की वजह अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी बताई गई। कहा गया कि 69 लाख रुपये का भुगतान नहीं होने की वजह से ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली फर्म ने ऑक्सीजन की सप्लाई ठप कर दी, जिसकी कमी से बच्चों की मौत होने लगी। हालांकि बाद में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मौत अस्पताल में चल रही राजनीति की वजह से हुई, न कि ऑक्सीजन की कमी से। मुख्य सचिव की जांच रिपोर्ट में भी ऑक्सीजन संकट का जिक्र नहीं था। इस मामले में कांग्रेस व अन्य सियासी दलों ने प्रदेश की भाजपा सरकार को घेरते हुए उसकी कार्यशैली पर सवाल उठाए थे।
बिहार मुजफ्फरपुर
22 दिन में 145 मौतें
बिहार के मुजफ्फरपुर व अन्य जगह मस्तिष्क बुखार (एईएस) से 22 दिन में 145 बच्चों की मौत हो गई थी। माना जाता है कि जब गर्मी 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक और नमी 70 से 80 प्रतिशत के बीच होती है तो इस बीमारी का कहर बढ़ जाता है। बीमारी में बच्चे को तेज बुखार के साथ झटके आते हैं। हाथ-पैर में ऐंठन होती है, वह देखते-देखते बेहोश हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे लेकर गाइडलाइन जारी की। इस बीमारी में मस्तिष्क में सूजन हो जाती है। यह उन जगहों पर पाई जाती है, जहां लीची के बागान अधिक हैं। 1-15 साल के बच्चे इसके अधिक शिकार होते हैं। बीमारी का लक्षण तेज बुखार, शरीर में चमकी, दांत बैठना, शरीर में ऐंठन और बेहोश होना है। खून में शुगर की मात्रा अचानक कम हो जाती है।
सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं देने में हम भूटान से भी पीछे
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सुलभ स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाने के मामले में भारत दुनिया के 195 देशों में 154वें पायदान पर है, जबकि हमारा पड़ोसी देश भूटान 134वें पायदान पर है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश, नेपाल, घाना और लाइबेरिया से भी भारत की हालत बदतर है। स्वास्थ्य सेवा पर भारत सरकार का खर्च (जीडीपी का 1.15 फीसदी) दुनिया के सबसे कम खर्चों में से एक है। स्वास्थ्य सेवा उपलब्धता के मामले में प्रति डॉलर प्रति व्यक्ति सरकारी खर्च की बात की जाए तो भारत में यह 1995 में 17 डॉलर था, जो 2017 में 58 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना हो गया। मलेशिया में यह खर्च 418 डॉलर है, जबकि हमारे प्रतिद्वंद्वी चीन में 322, थाइलैंड में 247 फिलीपींस में 115, इंडोनेशिया में 108, नाइजीरिया में 93 श्रीलंका में 88 और पाकिस्तान में 34 डॉलर है। भारत में जीडीपी का सिर्फ 1.25 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जबकि ब्राजील लगभग 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करते हैं। दक्षिण एशियाई देशों की भी बात करें तो अफगानिस्तान स्वास्थ्य सेवाओं पर कुल बजट का 8.2%, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है।
7000 लोगों पर एक डॉक्टर
देश में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे और इस क्षेत्र में काम करने वालों की बेतहाशा कमी है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति 1,000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, वहां भारत में 7,000 की आबादी पर मात्र एक डॉक्टर है। पैसों की कमी के कारण अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाएं नहीं मिल पाती तो वेंटिलेटर कैसे उपलब्ध हो पाएगा।


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