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ऊर्जामय पर्व

Posted On January - 13 - 2020

शीत के संताप से मुक्ति की उत्सवधर्मिता
अब चाहे लोहड़ी हो या फिर मकर संक्रांति अथवा पोंगल, सबका मकसद लोगों को शीतकालीन अवसाद से मुक्ति दिलाकर नई ऊर्जा का संचार करना ही है। लोकमानस को जाड़े के भय से मुक्त कराने का सार्थक प्रयास है। मूलत: ये खेती-किसानी के पर्व हैं। खेतों में पाले के प्रकोप से मुक्त लहलहाती फसलें हैं। पतझड़ की विदाई और वसंत का स्वागत है। पौष की विदाई और माघ का स्वागत है। मान्यता रही है कि ठंड के प्रकोप से जो बड़े-बूढ़े सुरक्षित बच निकले हैं, उनके लंबे जीवन की कामना का पर्व हैं। वहीं प्रकृति का आभार व्यक्त करना भी मकसद है। हम इन पर्वों में उन्हीं चीजों का सेवन करते हैं, जो मौसम के अनुरूप सेहत की जरूरत भी है। खासकर गुड़-तिल आदि जो हमारी पाचन-शक्ति को बढ़ाते हैं और शरीर में शीत से मुकाबले के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। इसमें अग्निदेव व सूर्य की पूजा करके जीवन में ऊष्मा का संचार करने का आह्वान है। यज्ञ की समिधा की तरह अग्नि देव को रेवड़ी-गजक व मूंगफली की भेंट चढ़ाकर इनका प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है। त्योहारों की सार्थकता सिद्ध करने के मकसद से इनसे लोककथाएं और पौराणिक प्रसंग जोड़े गये हैं जो पर्वों का उत्साह दुगना करते हैं। सामाजिकता का विस्तार और जीवन में नई ऊर्जा व  ऊष्मा का संचार हो ताकि वह जड़ता खत्म हो जो शीत ऋतु ने हमारे जीवन में भर दी है।
इन पर्वों में प्रकृति, हमारे सहचर पशुओं-पक्षियों, अग्नि देव और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी भाव है। इस मौसम में प्रकृति अपना आवरण बदल रही होती है। वृक्ष पर नये पत्ते और फूल खिलने लगते हैं। खेतों में सरसों की खिली फसल हमारे मन को मुदित करती है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह परिवर्तनकाल है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य देव उत्तरायण होते है। इस दिन से शुभकाल की भी शुरुआत होती है। गीता में उल्लेख मिलता है कि उत्तरायण में प्राण त्यागने वालों को सीधे मोक्ष मिलता है। पौराणिक कथाओं में इस बात का उल्लेख मिलता कि सरशैया पर लेटे भीष्म पितामाह ने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। मकर संक्रांति पर इलाहाबाद के संगम और गंगा सागर में स्नान का विशेष महत्व है। यूं तो हरिद्वार समेत कई पवित्र नदियों में स्नान की परंपरा है। यानी जाड़े के भय से मुक्त करने का प्रयास भी है। कहीं यह खिचड़ी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है तो कहीं पतंग उत्सव के रूप में। कुल मिलाकर सामाजिकता का विस्तार और लोकजीवन में  उमंग व उत्साह भरने का ही प्रयास है। देश की विविधता की कड़ी में दक्षिण भारत में मकर संक्रांति वाले दिन पोंगल मनाने की परंपरा है। पहले दिन पुराने सामान को जलाया जाता है। दूसरे दिन मीठे पकवान सूर्यदेव को अर्पित किये जाते हैं। तीसरे दिन जीविकोपार्जन में सहायक पशुओं को सजा-संवार कर पूजा जाता है। चौथे दिन नाते-रिश्तेदारों से मिलना-जुलना होता है।


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