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इंद्रधनुषी रक्षा कवच के लिए सार्थक पहल

Posted On January - 13 - 2020

आज़ाद भारत और भारतीयों ने कई युद्ध जीते। इनमें से दो हमेशा याद रखे जाएंगे। एक तो था चेचक (बड़ी माता) के देश से उन्मूलन की लड़ाई और दूसरा पोलियो। इन दोनों के भारत की ज़मीन से खात्मे में सारे देश ने हाथ बंटाया। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले और विभिन्न समुदायों, जातियों तथा प्रदेशों के लोगों ने इसमें बहुत बड़ा योगदान दिया। हर शहर, हर गांव, हर बस अड्डे, हर रेलवे स्टेशन और हर स्कूल में पोलियो की खुराक बच्चों को पिलाई गई। कहीं-कहीं प्रतिरोध भी हुए लेकिन यह पूरी तरह से सफल रहा और इसके लिए भारत की जनता को दुनिया भर से बधाइयां मिलीं।
अब एक बार और करोड़ों बच्चों तथा गर्भवती माताओं को रक्षा कवच देने के लिए एक बहुत बड़ा अभियान चल रहा है। यह है सघन मिशन इंद्रधुनष 2.0 और यह पूरे देश में तीव्रता से चल रहा है। राह में कांटे भी आ रहे हैं लेकिन इसकी रफ्तार बनी हुई है। इसके तहत 12 बीमारियों से बचाने के लिए एक ही टीका इज़ाद किया गया है जो शिशुओं और बच्चों को लगाया जाता है। हालांकि 1985 में इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी लेकिन 2 दिसंबर 2019 से शुरू और मार्च 2020 तक चलने वाले इस अभियान के तहत देश के 28 राज्यों के 271 जिलों में टीकाकरण किया जा रहा है। इसका दायरा 2 करोड़ 67 लाख शिशुओं और 3 करोड़ गर्भवती माताओं तक फैला हुआ है। यह दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम है और पूरा होने पर देश का नाम एक बार फिर रोशन होगा।
दरअसल, देश में रुटीन टीकाकरण कवरेज धीमा रहा। 2016 में लगभग 38 प्रतिशत बच्चे जिंदगी के पहले वर्ष में मूलभूत टीकाकरण से वंचित रह गए। इसके कई कारण थे लेकिन सबसे बड़ा कारण यह था कि वे घुमंतू तथा दूरदराज के क्षेत्रों में फैले हुए थे। इसके अलावा लोगों में जागरूकता की कमी के कारण भी ऐसा हुआ। ऐसे लोगों में साइड इफेक्ट्स का भय तो था ही, उन्हें टीके के विरोध वाले भ्रामक संदेश भी मिलते रहे थे। लक्ष्य से कम टीकाकरण होने के कारण भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय ने 2014 में मिशन इंद्रधनुष आरंभ किया ताकि अनुपयुक्त, अतिसंवेदशील, प्रतिकार वाले और पहुंच से बाहर बच्चों को लक्षित किया जा सके। यह कार्यक्रम अप्रैल 2015 से जुलाई 2017 तक चला। इस दौरान 2 करोड़ 55 लाख बच्चों और 69 लाख महिलाओं को टीके लगाए गए। इससे पूर्ण टीकाकरण में 6.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी (7.9 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में और 3.1 प्रतिशत शहरी इलाकों में) हुई। यह कोई आसान काम नहीं था और इसके लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों के साथ लाखों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बहुत मेहनत की।
2017 के अक्तूबर में भारत के प्रधानमंत्री ने सघन मिशन इंद्रधनुष का लोकार्पण किया ताकि इस महत्वाकांक्षी योजना की गति को तीव्र किया जा सके। इसका लक्ष्य उन जिलों तथा शहरी इलाकों में 90 प्रतिशत पूर्ण टीकाकरण करने का था जहां इसकी पैठ कम थी। अब इसके मिशन 2.0 की शुरुआत की गई है ताकि देश का कोई बच्चा न छूटने पाए। इसका लक्ष्य है 90 प्रतिशत नवजात शिशुओं का 2020 तक पूर्ण टीकाकरण। इसके लिए बहुत ही आधुनिक तकनीक अपनाई गई है। टीकों की सप्लाई को इलेक्ट्रॉनिक टीका इंटेलीजेंस नेटवर्क और कोल्ड चेन ट्रोकिंग प्रोग्राम से ट्रैक किया जाता रहा और वैकल्पिक टीका डिलीवरी मेकनिज्म से बांटा जाता रहा।
यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। कोशिश है कि इसमें स्लम में, आदिवासी इलाकों में रहने वाले बच्चों के अलावा घुमंतू जातियों के बच्चों को भी शामिल किया जाए ताकि टीकाकरण की इस कड़ी से कोई बच्चा न छूटने पाए। इसके लिए जबरदस्त प्लानिंग की गई और सात सूत्री प्रक्रिया अपनाई गई। इसके लिए गैर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को भी इसमें शामिल किया गया ताकि इसका दायरा बढ़े और लक्ष्य समय पर पाया जा सके। इसके लिए घर-घर को सूचीबद्ध किया गया और विकेन्द्रीकरण भी किया गया ताकि टीकाकरण की जद में सभी आ जाएं। इस तरह के तमाम प्रयास किए गए हैं कि कोई भी बच्चा छूटने न पाए। यह एक महारथ प्रयास है और इसके लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के मुलाजिमों के अलावे यूनिसेफ, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और कुछ अन्य संस्थाए भी सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। इन सभी के मिले-जुले प्रयास से यह विशाल अभियान देश भर में चल रहा है।
लेकिन ऐसे मामलों में तरह-तरह की बाधाएं आती हैं। अफवाहें फैलती हैं, सोशल मीडिया पर भ्रामक समाचार या वीडियो अचानक ही राह रोक लेते हैं। सोशल मीडिया अक्सर इस अभियान में खलनायक की भूमिका निभाने लगता है। इससे इसकी गति थमने लगती है। कुछ इलाकों में तो जानबूझकर एक खास समुदाय को भड़काने की कोशिशें की गईं। इसका प्रतिकार करने के लिए अब धार्मिक गुरुओं की भी मदद ली जा रही है। इस तरह के कदमों से कई बार बिगड़ी बात बन जाती है और फिर अभियान तेजी से चलने लगता है। कई मामलों में ऐसा भी हुआ है कि टीका या सूई देने के बाद अचानक ही कोई बालक या बालिका किसी अन्य कारण से मूर्छित हो जाती है तो फिर उसका असर दूसरों पर पड़ता है। ऐसे में कई स्कूलों में तो फिर टीकाकरण करना ही मुश्किल हो जाता है।

मधुरेन्द्र सिन्हा

इस अभियान के लिए जरूरी है कि टीकाकरण के योग्य बच्चे को किसी निर्धारित केन्द्र पर लाया जाए जहां टीकाकरण की सुविधा हो। यह पल्स पोलियो की तरह हर जगह नहीं हो सकता। इसलिए यह थोड़ा कठिन है। बच्चों को ऐसे केन्द्रों पर लाने के लिए उनके मां-बाप को प्रेरित करना एक कठिन प्रक्रिया है लेकिन आशा कार्यकर्ताएं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताएं और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी इसे अच्छे से निभा रहे हैं। यह उनके अथक प्रयासों से ही संभव हो रहा है।
स्वस्थ बच्चे हमारे देश के भविष्य के लिए जरूरी हैं। बीमारियों से जीडीपी में कमी आती है और देश पिछड़ता है। इसलिए इस अभियान में देश के हर क्षेत्र के नागरिकों की भागीदारी जरूरी है। इंद्रधनुष मिशन 2.0 टीकाकरण अभियान में साथ देना हर किसी का कर्तव्य है। इस दिशा में तेजी आ गई है और लक्ष्य ज्यादा दूर नहीं है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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