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लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग से जलवायु को ख़तरा

Posted On December - 1 - 2019

कुमार गौरव अजीतेन्दु

वीडियो स्ट्रीमिंग का ट्रेंड लोगों में बढ़ता जा रहा है। ओरिजनल और नए प्रकार का कंटेंट होने के कारण इन्हें काफी पसंद किया जा रहा है। इन प्लेटफॉर्म द्वारा अपना कंटेंट किसी के साथ शेयर न करने के कारण इनकी डिमांड बनी रहती है लेकिन हाल ही में हुई एक स्टडी के मुताबिक लगातार स्ट्रीमिंग सर्विसेस पर वीडियो देखने का शौक आपके आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। विशेषज्ञों ने लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग को जलवायु परिवर्तन के लिए नया खतरा बताया है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि हम छह किलोमीटर तक कोई वाहन चलाकर जितना कार्बन उत्सर्जन करते हैं, उतना सिर्फ वीडियो स्ट्रीमिंग से आधे घंटे की फिल्म देखने से हो जाता है।
फ्रांस की शोध संस्था शिफ्ट प्रोजेक्ट में बताया गया है कि पिछले साल ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग से उतना कार्बन उत्सर्जित हुआ, जितना सालभर में स्पेन में होता है। इसके अगले छह वर्षों में दोगुना होने की आशंका है। आईटी सेक्टर की ऊर्जा दोहन पर नजर रखने वाली संस्था ग्रीनपीस के गैरी कुक का कहना है कि डिजिटल वीडियो बहुत बड़े आकार की फाइल में आते हैं। इनका आकार भी बड़ा होता जा रहा है। स्ट्रीमिंग सेवाओं के लिए आवश्यक अधिकांश ऊर्जा का उपयोग डेटा सेंटर द्वारा किया जाता है, जो कम्प्यूटर या डिवाइस को डेटा डिलीवर करता है। नेचर पत्रिका में छपे एक लेख के अनुसार ऐसे डेटा सेंटर दुनियाभर के कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन में 0.3% की हिस्सेदारी रखते हैं जो वक्त से साथ और अधिक बढ़ने की आशंका है। इस बीच, वीडियो देखने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। कंज्यूमर टेक्नोलॉजी एसोसिएशन के मुताबिक औसत स्क्रीन साइज बढ़कर 2021 तक 50 इंच हो जाएगा। नेचुरल रिसोर्स डेफेंस काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 4K रिज़ॉल्यूशन वाली स्क्रीन हाई-डेफिनेशन स्क्रीन की तुलना में लगभग 30% अधिक ऊर्जा का उपयोग
करती है।
विशेषज्ञों ने सुझाव देते हुए कहा कि है दर्शकों को ऑटोप्ले मोड को डिसेबल कर वाईफाई पर लोअर डिफिनेशन में लाइव वीडियो देखनी चाहिए। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किया गया अध्ययन बताता है कि दुनिया का सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन चीन में होता है। दुनिया में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में 27 प्रतिशत योगदान चीन का है। इसके बाद अमेरिका (15 प्रतिशत) दूसरे और यूरोपीय यूनियन (10 प्रतिशत) तीसरे स्थान पर है। चौथे नंबर पर भारत (सात प्रतिशत) है।
ध्यान देने वाली बात ये भी है कि एक गूगल सर्च 0.2 ग्राम से 7 ग्राम के बीच कार्बन का उत्सर्जन करती है। 7 ग्राम में हम एक केतली चाय को उबाल सकते हैं। इसके अलावा 04 फीसदी उत्सर्जन दुनिया में डिजिटल टेक्नोलॉजी की वजह से हो रहा है, यह दुनिया में यह पूरे नागरिक उड्डयन क्षेत्र के छोड़े गए धुएं से ज्यादा है। 2018 में ऑनलाइन वीडियो से 30 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होते पाया गया है।


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