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राजग में दरार

Posted On December - 2 - 2019

26 अप्रैल 2019… एनडीए की तस्वीर

हरीश लखेड़ा
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ने वाली शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा-शिवसेना के अलगाव के साथ केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कुनबे में से एक महत्वपूर्ण सदस्य अलग हो गया है। हालांकि, अभी इस कुनबे में डेढ़ दर्जन से अधिक सदस्य हैं, लेेकिन प्रमुख दलों के नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। बिहार में जनतादल (यू), पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (बादल) और तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक जैसे बड़े दल ही भाजपा के साथ रह गये हैं। हालांकि, शिवसेना प्रकरण के बाद भाजपा अब राजग का कुनबा बढ़ाने की बजाय खुद के जनाधार बढ़ाने पर जोर देगी। पार्टी का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उसने 303 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि वह अकेले भी बहुमत पा सकती है।
भाजपा, अकाली दल और समता पार्टी (अब जनतादल यू) के साथ शिवसेना भी राजग के संस्थापक सदस्यों में शामिल रही है, लेकिन राजनीतिक समीकरण ऐसे बदले कि वह अब भाजपा को अलविदा कहने के साथ ही राजग के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के पाले में चली गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कार्यकाल में शिवसेना से पहले तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) भी राजग से अलग हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ शिवसेना ही राजग से अलग हुई है। झारखंड में भी राजग के घटक दल अलग-अलग ताल ठोक रहे हैं। वहां भाजपा पहली बार अकेले चुनाव मैदान में है। झारखंड में भाजपा के साथ 5 साल तक सरकार में सत्तासुख भोगने वाला ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) भी मन मुताबिक सीटें नहीं मिलने पर अब विधानसभा चुनाव में अलग से ताल ठोक रहा है। केंद्र में एनडीए सरकार में भागीदार रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) भी वहां चुनाव में अलग से मैदान में है, जबकि राजग का एक अन्य घटक दल जनता दल (यू) पहले से ही अलग से मैदान में है। वहां, राजग घटक दलों के अलग-अलग ताल ठोकने से सत्तारूढ़ भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
दरअसल, राजग में आई इस दरार से अब नये सियासी समीकरण बनने लगे हैं। कभी कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा अब खुद प्रदेशों में सिमटती जा रही है। महाराष्ट्र में भाजपा जीती बाजी हार गई है, लेकिन इससे पहले वह मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी सत्ता खो चुकी है। जम्मू- कश्मीर का अब हालांकि राजनीतिक नक्शा बदल चुका है, लेकिन कभी भाजपा वहां पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ मिलकर राज कर रही थी। अब देश के सबसे धनी राज्य महाराष्ट्र के भाजपा के हाथ से निकल जाने के बाद मध्य भारत के अधिकतर राज्यों से भाजपा सत्ता से दूर हो गई है। कर्नाटक में भी भाजपा सरकार पर संकट के बादल छाए हैं। वहां मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी बचाने के लिए उपचुनाव में कम से कम 6 सीटें जीतनी होंगी। अभी झारखंड विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और इसके बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव हैं। वास्तव में राजग में दरार की नींव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोबारा शपथ ग्रहण करने के दिन से पड़ गई थी। तब भाजपा के दो सहयोगी जनता दल (यू) और अपना दल की नाराजगी खुलकर सामने आ गई थी। जदयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी पार्टी को तवज्जो नहीं दिए जाने से नाराज हो गये, इसलिए राजग का हिस्सा होने पर भी जदयू मोदी सरकार में शामिल नहीं हुई। इसी तरह, उत्तर प्रदेश का ‘अपना दल’ पिछली मोदी सरकार में राज्यमंत्री रही अनुप्रिया पटेल को तरक्की देने की मांग कर रहा था। जिसे भाजपा नेतृत्व ने अनसुना कर दिया। यहां तक कि बाद में ‘अपना दल’ से संपर्क भी नहीं किया गया। इसलिए ‘अपना दल’ खुश नहीं है।
इन दलों का तर्क रहा है कि लोकसभा में बिना सांसद वाली रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) (आरपीआई) के रामदास अठावले को मंत्री बना दिया गया, तो सदस्यों वाले दलों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। जदयू का भाजपा से टकराव होता रहा है और अटकलें लगती रही हैं कि बिहार के विधानसभा चुनाव में वह भाजपा से अलग राह ले सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी जदयू ने भाजपा से अलग होकर लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन कर चुनाव लड़ा था।
शिवसेना के भाजपा का साथ छोड़ने की पटकथा 5 साल पहले से लिखी जाने लगी थी। 2014 के विधानसभा चुनाव में अलग-अलग ताल ठोकने से दोनों दलों के बीच कटुता आने लगी थी। अब 2019 में मुख्यमंत्री पद के लिए शुरू हुए विवाद से 30 साल पुराना गठबंधन बिखर गया। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर की भाजपा और बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना ने 1989 में गठबंधन किया था। तब प्रदेश में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में थी और भाजपा छोटे भाई। दोनों मिलकर चुनाव लड़ते रहे और प्रदेश में सरकार भी बनाते रहे। तब शिवसेना का मुख्यमंत्री और भाजपा का उपमुख्यमंत्री रहा। विपक्ष में भी साथ ही रहे। 2012 में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना की कमान उनके बेटे उद्धव ठाकरे के हाथ में आ गयी। इसके बाद से भाजपा और शिवसेना के संबंधों में बदलाव आने लगा। 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा, लेकिन बहुमत नहीं मिलने पर फिर से एक साथ आ गये। तब मुख्यमंत्री भाजपा के देवेंद्र फडनवीस बने। शिवसेना इसे भुला नहीं पाई। 16वीं लोकसभा में सरकार में रहते हुए शिवसेना लगातार मोदी सरकार पर हमले करती रही। हालांकि, 2019 के लोकसभा और विधानसभा दोनों ने मिलकर लड़ा, लेकिन इस कटुता का पटाक्षेप अब हो गया। भाजपा ने महाराष्ट्र में राकांपा के अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने का जो असफल प्रयास किया, उससे शिवसेना के साथ उसके संबध और कटु हो गए हैं।
झारखंड में भी भाजपा और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) का गठबंधन टूट चुका है, हालांकि दोनों ही गठबंधन टूटने को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं। प्रदेश की 81 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव में आजसू अब तक 3 दर्जन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार चुकी है, जबकि वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनने के समय से ही भाजपा और आजसू एक साथ रहे हैं। पिछली बार आजसू को 8 सीटें दी गयी थीं, लेकिन इस बार वह ज्यादा सीटें मांग रही थी। सीटों के विवाद के चलते झारखंड में भी राकांपा में दरार आ गयी। बिहार में जदयू के साथ-साथ पंजाब में भी शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा के रिश्तों में खटास की खबरें आती रहती हैं।
मोदी और शाह की कार्यशैली पर सवाल
राजग हो या भाजपा दोनों में ही अब तक अधिकतर मामलों में वही होता रहा है, जो मोदी और शाह की जोड़ी चाहती है। अलबत्ता शिवसेना उन्हें आंखें अवश्य दिखाती रही है, जबकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीतिक दांव से उन्हें पटखनी देते रहे हैं। लेकिन 2019 के चुनाव में प्रचंड बहुमत पाने के बाद से इन दोनों के फैसलों पर उंगली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अब शिवसेना के राजग को अलविदा कहने तथा लोजपा जैसे दलों के भी आंखें दिखाने से दोनों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या राजग में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का तिलिस्म खत्म होने लगा है। महाराष्ट्र में चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने से चूक गयी। इसके बाद, राकांपा के अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश से भाजपा की फजीहत होने के साथ ही मोदी-शाह की जोड़ी की रणनीति भी ध्वस्त हो गयी। अब तक भाजपा कहती रही है कि मोदी है तो मुमकिन है, लेकिन शरद पवार ने इसे गलत साबित कर दिया। इससे अब कांग्रेस समेत विपक्षी दलों में यह उम्मीद जगने लगी है कि यदि वे एकजुट हो जाएं तो भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है। महाराष्ट्र के असफल प्रयोग ने राजग के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
महाराष्ट्र से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा पहले ही कांग्रेस से मात खा चुकी है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। सरकार बनाने के लिए उसे चौधरी देवीलाल के पोते दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जजपा) के साथ गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। हरियाणा में राजग को एक नया साथी तो मिल गया, लेकिन 5 साल तक पूर्ण बहुमत से सरकार चलाने वाली भाजपा को गठबंधन सरकार बनाने पर मजबूर होना पड़ा। जानने लायक यह है कि ये चुनाव जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद हुए। मोदी और शाह की जोड़ी ने चुनाव में इन मुद्दों को भुनाया भी था, लेकिन वे बेअसर साबित हुए।
भाजपा पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह अपने सहयोगी के साथ सही व्यवहार नहीं करती है, इसलिए वे नाराज होकर उसे झटका देने के लिए मौके की तलाश में रहते हैं। इस साल मई में मोदी-शाह की जोड़ी ने राजग को प्रचंड बहुमत दिलाया, लेकिन महाराष्ट्र प्रकरण ने भाजपा का जोश कम कर दिया है। हरियाणा में भी भाजपा की सरकार इसलिए बन गई कि भाजपा को चुनाव बाद गठबंधन के साथी के तौर पर जजपा का साथ मिल गया।
वास्तव में मोदी और शाह की जोड़ी ही अब भाजपा की सर्वेसर्वा है। जैसे कभी अटल-आडवाणी की जोड़ी हुआ करती थी। मोदी और शाह 1987 से एक दूसरे के साथ हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी जीता। इस जीत में शाह की भूमिका अहम रही। वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव थे। बाद में शाह को भाजपा की कमान सौंप दी गयी और वे देश के अधिकतर राज्यों में भाजपा को जीत दिलाते रहे। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से भाजपा सत्ता में लौटी। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों ने मोदी-शाह की जोड़ी के फैसलों पर उंगली उठाने का मौका दे दिया है।

यूपीए का बढ़ा कुनबा
शिवसेना के पाला बदलने के साथ ही कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ‘संप्रग’ (यूपीए) के कुनबे में एक सदस्य का इजाफा हो गया है। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए 2004 से 2014 तक केंद्र में सरकार चला चुका है। 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार की हार के बाद यह गठबंधन अस्तित्व में आया। इस गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं।

अभी ये दल शामिल
0 कांग्रेस 0 द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (द्रमुक), तमिलनाडु 0 शिवसेना,महाराष्ट्र 0 राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) 0 राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), बिहार 0 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल 0 जनता दल (सेक्युलर), कर्नाटक 0 झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), झारखंड 0 केरल कांग्रेस (एम), केरल 0 मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (एमडीएमके),तमिलनाडु 0 क्रांतिकारी सोशलिस्ट पार्टी, केरल 0 विदुथलाई चिरुथिगाल काची, तमिलनाडु 0 ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, असम

21 साल पहले बना था राजग
केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) 1998 में अस्तित्व में आया था। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में बने इस गठबंधन में भाजपा के साथ समता पार्टी, शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना मुख्यतौर पर शामिल थे। हालांकि, तब अन्य दलों को जोड़कर इसमें 13 सदस्य थे। समता पार्टी के संस्थापक जाॅर्ज फर्नांडीस से लेकर अब कांग्रेस के पाले में जा चुके शरद यादव और तेलगू देशम पार्टी प्रमुख चंद्र बाबू नायडू भी इसके संयोजक रह चुके हैं। देश में गैर कांग्रेसी सरकार के खिलाफ एक प्रयास था। इस गठबंधन ने 1998 से लेकर 2004 तक केंद्र में सरकार चलाई। दूसरी पाली में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 से राजग की सरकार चल रही है। खास बात यह है कि एक समय ऐसा भी आया, जब राजग में 35 दल शामिल रहे। आज भी पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे दलों को मिलाकर डेढ़ दर्जन दल राजग में शामिल हैं। वाजपेयी के समय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक व बीजू जनतादल भी राजग का हिस्सा रह चुके हैं। तेलुगू देशम पार्टी मोदी और शाह के समय भी राजग में रही है।

अभी ये दल शामिल
0 भारतीय जनता पार्टी 0 अन्नाद्रमुक, तमिलनाडु 0 जनता दल (यू), बिहार 0 शिरोमणि अकाली दल, पंजाब 0 पट्टली मक्कल काची, तमिलनाडु 0 लोक जनशक्ति पार्टी, बिहार 0 भारथ धर्म जन सेना, केरल 0 डीएमडीके, तमिलनाडु 0 असम गण परिषद, असम 0 अपना दल (सोनेलाल), यूपी 0 आजसू, झारखंड 0 पुथिया तमिलम, तमिलनाडु 0 तमिल मानिला कांग्रेस, तमिलनाडु 0 पुठिया नधि काची, तमिलनाडु 0 अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस, पुड्डूचेरी 0 बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट, असम 0 राष्ट्रवादी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी, नगालैंड 0 केरल कांग्रेस (थॉमस), केरल) 0 राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, राजस्थान 0 सुमलथा, कर्नाटक

अब संयोजक बनाने की मांग
शिवसेना के अलग होने के बाद से राजग में संयोजक अथवा अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठने लगी है। संसद के शीतकालीन सत्र से पहले राजग की बैठक में घटक दलों के बीच ज्यादा सहयोग की आवश्यकता जताई गई। लोक जन शक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने हाल ही में यह मांग की। जेडीयू पहले ही एनडीए में समन्वय के लिए समिति बनाए जाने की मांग कर चुका है। दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद से राजग का कोई अध्यक्ष नहीं बनाया गया। वैसे भी वाजपेयी के बीमार होने पर भी उन्हें ही अध्यक्ष बनाये रखा गया, जबकि 2014 में लालकृष्ण अाडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता भी संसद में थे। इसके लिए भाजपा दलील देती रही कि वाजपेयी को सम्मान देने के लिए नया अध्यक्ष नहीं बनाया गया। अब वाजपेयी का निधन हो चुका है, लेकिन संसद में आज भी राजग को अलॉट किये गये कमरे के बाहर अध्यक्ष के तौर पर वाजपेयी की नेम प्लेट लगी है। मोदी-शाह के समय के राजग में अब कोई संयोजक अथवा अध्यक्ष जैसे पदों पर कोई नहीं है। यही वजह है कि लोजपा के नवनियुक्त प्रमुख चिराग पासवान ने संसद के शीतकालीन सत्र को लेकर एनडीए की एक बैठक के बाद कहा कि गठबंधन के घटक दलों के बीच बेहतर समन्वय के लिए राजग में संयोजक की नियुक्ति होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह चिंता की बात है कि पहले तेलुगू देशम पार्टी और फिर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने गठबंधन छोड़ दिया। चिराग की इस मांग पर प्रधानमंत्री मोदी भी सहमत दिखे। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे विवादों से हमें परेशान नहीं होना चाहिए और आपस में तालमेल के लिए समन्वय कमेटी बनाई जानी चाहिए। इससे उम्मीद की जा रही है कि शायद अब राजग में कोई संयोजक या अध्यक्ष बना दिया जाए।


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