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फ्लैशबैक

Posted On December - 7 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म गुमराह

शारा
वर्ष 1963 सिल्वर स्क्रीन की महिला अदाकारों और उनके किरदारों के लिए बहुत-सी सौगातें लेकर आया। सौगातें इसलिए कि परम्पराओं के नाम पर रूढ़ियों को ढोने वाली स्त्री नयी सोच, एकदम आधुनिक दृष्टिकोण के साथ पर्दे पर आयी; बेशक दर्शकों को शुरू-शुरू में उसका यह रूप अटपटा लगा लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें यह क्रांतिकारी बदलाव भला प्रतीत होने लगा। भारतीय समाज के माइंड-सेट में रची-बसी भारतीय नारी की इमेज इस साल की जिन फिल्मों ने बदली, उनमें आलोच्य फिल्म के अलावा बंदिनी, ये रास्ते हैं प्यार के, शामिल थीं। ये सभी महिला केंद्रित फिल्में थीं। अगर सिल्वर स्क्रीन समाज सुधार का एक जरिया है तो उस दशक में उसने यह काम बखूबी किया है। फ्लैश बैक के पाठकों को याद होगी फिल्म बंदिनी की कल्याणी (नूतन) जो आदर्शवाद के लबादे को उतार फेंकती है और अपने जज्बों को तरजीह देते हुए प्रेमी विकास (अशोक कुमार) को चुनती है क्योंकि वह उसे प्यार करती है। हालांकि, वह जानती है कि देवेन (धर्मेंद्र) एक अच्छा डाक्टर है लेकिन इस मामले में वह मन की बात सुनती है, समाज की नहीं। नानावटी हत्याकांड पर आधारित ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ में नायिका से उसके पति का दोस्त बलात संबंध स्थापित कर लेता है। ये संबंध दोतरफा सहमति से नहीं बने, लेकिन वह फिर भी पतिता कहलाती है। पति और समाज के लिए वह कुलटा और चरित्रहीन है, परपुरुष-गामिनी भी। इसी तरह गुमराह भी लीक से हटकर विषय परोसती फिल्म थी, जिसने बाद के सिनेमा के लिए नये दरीचे खोले। फिल्मी जगत में तब दबे सुर में बातें की जाती थीं कि गुमराह फिल्मी अदाकारा कामिनी कौशल के जीवन पर आधारित थी, जिसे अपने बहनोई से महज इसलिए शादी करनी पड़ी क्योंकि उसकी बहन की अकस्मात मृत्यु हो गयी थी और पीछे छूटे तीन बच्चों की परवरिश के लिए मासी से बढ़कर भला कौन हो सकता है?
गुमराह बीआर चोपड़ा की उत्कृष्ट फिल्मों में आती है, जिन्होंने समाज को नयी राह दिखायी। बीआर चोपड़ा समय से आगे सोचते थे—आधुनिक तरीके से, रूढ़ियों को नहीं, परंपराओं को खंडित किए बिना। दर्शकों को दिलीप कुमार की ‘नया दौर’ फिल्म याद होगी, जिसमें मशीनों को तरजीह तो दी गयी है लेकिन इनसानी हाथों के साथ। ऐसी ही उन्होंने ‘कानून’ फिल्म बनाई थी, जिसमें कोई गीत ही नहीं था जबकि उस जमाने की फिल्मों में गीतों के बगैर फिल्म हिट ही नहीं होती थी। याद कीजिए 1969 में बनी इत्तफाक को। फिर 1973 में बनी जीनत अभिनीत फिल्म धुंध भी तो बोल्ड विषय पर बनी उनकी फिल्मों में से एक है, जिसमें जीनत की शादी एक अपंग व्यक्ति से कर दी गयी है लेकिन वह चुनती अपने प्रेमी को है। इसी तरह गुमराह भी परंपराओं पर चोट करती है। जब इसकी नायिका को उसका प्रेमी सुंदर जीवन की परिभाषा समझाता है तो वह समाज की परवाह किए बगैर अपने अतीत को छोड़ देती है। फिल्म गुमराह के केंद्र में तीन धांसू अदाकार हैं। तीनों के ही रोल निर्देशक ने क्या संजीदगी से बुने हैं। दो पुरुषों (एक पति, दूसरा प्रेमी) के बीच पिसती मीना का किरदार निभाया है माला सिन्हा ने जो अब तक दुखी प्राणी महिलाओं के रोने वाले रोल निभाने के लिए लोकप्रिय थी। इस रोल के लिए बीआर चोपड़ा पहले मीना कुमारी को लेना चाहते थे। और माला सिन्हा ने भी मीना के किरदार को अमर कर दिया। अशोक कुमार तो वैसे भी अच्छे पति की भूमिकाओं में खरे ही साबित होते हैं, ऐसा ही इस फिल्म में भी हुआ है। सुनील दत्त की अदाकारी का कौन मुरीद नहीं है। इस फिल्म में शशिकला भी है, माला उर्फ मीना को ब्लैकमेल करती हुई। उन्होंने कितना अच्छा रोल किया है कि स्पोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड झटक कर ले गयी?
बोल्ड विषय के अलावा इस फिल्म को एक अन्य कारण से भी याद किया जाता है। संगीतमय शाहकार थी यह फिल्म। इस फिल्म के सभी गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे, जिन्हें धुन दी थी रवि ने। चलते-चलते फ्लैश बैक के पाठकों को एक जानकारी भी दे दूं। बताते हैं कि फिल्म में महेंद्र कपूर ने जो गाना गया है ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ साहिर ने अपनी गर्लफ्रेंड सुधा मल्होत्रा पर तब लिखा था जब वे दोनों लम्बे वक्फे के बाद मिले थे। यह गीत गाने के लिए महेंद्र कपूर को सर्वोत्तम गायक का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था। यह उनकी आवाज के जादू के साथ रवि की धुन का भी कमाल था। वैसे रवि को एक अन्य कारण से भी जाना जाता है—आशा भोसले से लता मंगेशकर के गीत गवाने के लिए। याद करिए ‘तोरा मन दर्पण कहलाए।’ ऐसा लगता है कि यह गीत लता ने गाया है लेकिन इसे दरअसल आशा भोसले ने गाया है। बहरहाल, गुमराह ने ढेरों पुरस्कार जीते। इसकी सफलता से उत्साहित होकर बीआर चोपड़ा ने दहलीज (1986) बनायी। 2005 में इसी विषय पर आधारित धर्मेश दर्शन ने ‘बेवफा’ फिल्म बनायी। हिन्दू मिथक में अहम बनी ‘सीता की लक्ष्मण रेखा’ पर अब भी फिल्में बन रही हैं लेकिन इस बोल्ड टॉपिक पर सबसे पहले हाथ किस निर्देशक ने डाला—इसलिए पाठकों को यह फिल्म देखनी चाहिए। कहानी बस तीन किरदारों की है। उसे कैसे पेश किया—यह देखने पर पता चलेगा। ड्रामा जॉनर की इस फिल्म की कहानी में सस्पेंस भी कम नहीं है। मीना (माला सिन्हा) और कमला (निरूपा राय) नैनीताल के सेठ की बेटियां हैं। बड़ी बेटी मुंबई के नामी वकील (अशोक कुमार) को ब्याही है लेकिन छोटी बेटी मीना पड़ोस के ही कलाकार राजेंद्र (सुनील दत्त) से प्यार करती है। कमला का अकस्मात निधन होने के कारण मीना को कमला के बच्चों के पालन-पोषण की मजबूरी की बात बताकर उसके जीजा उसके साथ शादी कर लेते हैं। शादी के बाद मीना पति अशोक कुमार के घर मुंबई चली जाती है कुछ समय के बाद राजेंद्र मुंबई आ जाता है। चूंकि वह सिंगर भी है, इसलिए अपने गीतों की रिकार्डिंग करवाता है। दोनों चोरी-छिपे मिलना शरू करते हैं कि राजेंद्र के वापस नैनीताल जाने के बाद शशिकला खुद को राजेंद्र की पत्नी बताकर मीना को द्वंद्व में डाल देती है। वह तसदीक करने के लिए राजेंद्र को बुलाती है तो अशोक कुमार बताता है कि शशिकला उसकी सेक्रेटरी है और वह राजेंद्र के साथ जा सकती है। इस दरियादिली पर मीना मर-मिटती है और अशोक से माफी मांगती है।
प्रोड्यूसर एवं निर्देशक : बीआर चोपड़ा
पटकथा व संवाद : अख्तर-उल-रहमान.
एडिटिंग : प्राण मेहरा.
गीतकार : साहिर लुधियानवी.
संगीतकार : रवि.
सितारे : अशोक कुमार, सुनील दत्त, माला सिन्हा, निरूपा राय, शशिकला व देवेन आदि.
गीत
आ भी जा : महेंद्र कपूर
आ जा रे आ जा रे : आशा भोसले, महेंद्र कपूर.
आप आये तो ख्याले-दिले-नाशाद : महेंद्र कपूर.
चलो इक बार फिर से : महेंद्र कपूर.
इक परदेसी दूर से आया : आशा भोसले.
एक थी लड़की मेरी सहेली : आशा भोसले.
तुझको मेरा प्यार पुकारे : महेंद्र कपूर, आशा भोसले.


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