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पुस्तक समीक्षा

Posted On December - 8 - 2019

स्त्री संघर्ष की इंद्रधनुषी कहानियां

कमलेश भारतीय

आधारशिला प्रकाशन के डॉ. कमलेश बहुगुणा की सोलह कहानियों के संग्रह प्रतिबिम्ब की कहानियां स्त्री संघर्ष की इंद्रधनुषी कहानियां हैं। साहित्यकार डॉ. दिवाकर भट्ट के कथनानुसार इनमें स्त्री समाज का संघर्ष सामने रखा गया है। स्त्री समाज का केंद्र होते हुए भी अपना पूरा संसार खपा देती है। इसके बावजूद स्त्री की स्थितियां अभी ज्यादा नहीं बदलीं।
इस रोशनी में देखा जाए तो ‘इंद्रधनुष’ में जो परिवार नायिका मालिनी के नौकरी करने का विरोध करता है, वही परिवार और पति व्यापार में घाटा पड़ने पर मालिनी को अपनाकर घर ले आता है क्योंकि अब वही सम्बल है। इसी प्रकार ‘दीप स्तम्भ’ कहानी है, जिसमें दहेज की प्रताड़ना सह रही नायिका है लेकिन कथाकार कमलेश बहुगुणा हर कहानी को सुखांत बना देती हैं। मंथन हटकर एक कहानी है, जिसमें भाई को भाई से और खासतौर पर मां से अलग करती है वैभव की दीवार। यहां तक कि भाई के वैभव की चकाचौंध में मां उस बेटे को चिता को अग्नि देने के अधिकार से वंचित कर जाती है। यही मंथन है कि ऐसा क्यों किया? मैंने कहां भूल की? यही एक कहानी में नायक अलग नजर आता है।
‘समर्पिता’ भी एक अच्छी व पठनीय कहानी है। इसमें नायिका प्रिया अपने अशक्त व लकवाग्रस्त पति सुधाकर की सेवा कर यह संदेश देती है कि सौंदर्य मन का होता है। इसी प्रकार भोर का उजाला में अहं की दीवार गिरने पर ही पति-पत्नी सहज रूप से एक हो पाते हैं। मां बहुत सरल और सामान्य कहानी है। परिवार भी एक सुखद अंत वाली कहानी है। दरख्त होता है पति और परिवार इसी की छाया में सुखी रहता है। आकांक्षा में बहुत छोटी आकांक्षा है कि सुकृत पढ़-लिख जाए। ऐसी छोटी-छोटी आकांक्षाएं कमलेश बहुगुणा की नायिकाओं की हैं और सुखांत बनाने की कोशिश। इससे थोड़ा बचतीं तो कहानियां स्त्री विमर्श में ज्यादा योगदान दे पातीं। कहानियों में पठनीयता सबसे बड़ा गुण है और पाठक को निराश नहीं करेंगी।

पुस्तक : प्रतिबिम्ब कथाकार : डॉ. कमलेश बहुगुणा प्रकाशन : आधारशिला प्रकाशन, हल्द्वानी, उत्तराखंड पृष्ठ : 80 मूल्य : रु. 200.

संवेदना के धरातल पर धड़कती ग़ज़लें
मीनाक्षी वाशिष्ठ

एक चिकित्सक जब ऐसी पंक्तियों की रचना करता है तो संवेदना के धरातल पर उसकी धड़कनें स्वत: ही मुखर हो उठती हैं। डॉ. महेश प्रसाद सिंघल ऐसे ही शायर हैं जो अपने मरीजों का उपचार करने के साथ-साथ गहन अनुभूतियों का आस्वादन करते हुए बेहतरीन ग़ज़लों का सृजन भी करते हैं। ‘ग़ज़ल, ग़ज़ल के नाम’ उनका द्वितीय ग़ज़ल संग्रह है।
ग़ज़ल के विभिन्न रंगों की एक बानगी पेश करते हुए वह कहते हैं, ‘झूला झुलाती है ये तमन्ना को रात-दिन, दिल से कभी है दूर कभी पास है ग़ज़ल।’ उनके शे’रों में कभी खुदा की रहमत का जि़क्र है तो कहीं इनसानी हौसलों की मिसाल दी गयी है।
शायर ने अपनी कई ग़ज़लों में हुस्न, इश्क, प्यार, दुनियादारी व बेटियों का हवाला देते हुए बहुत खूबसूरती से अपनी बात रखी है—
‘हाथों में अपने ले के मुहब्बत का इक चराग, कितने घरों के दीप जलाती हैं बेटियां।’
डॉ. सिंघल की ग़ज़लों का कैनवास बहुत विशाल है। वे कभी वक्त को, तो कभी संस्कारों को तलाशते लगते हैं—
‘वक्त ने सब रिवाज़ बदले हैं, पायलें अब नहीं हैं पावों में।’
नये ज़माने के बदलते रंगों का उल्लेख करते हुए डा. सिंघल ने इस पुस्तक में उम्मीदों की लौ जगाये रखी है। इसीलिए वे कहते हैं—
‘दस्तक दे रहा है क्यों बार-बार कोई, बाहर खड़ी हुई है शायद बहार कोई।’
इस पुस्तक में डॉ. सिंघल ने विभिन्न मुद्दों का गंभीरता से विवेचन करते हुए अपनी बात साफगोई से रखी है। उन्होंने कुल सौ ग़ज़लें यहां पेश की हैं, जिनमें हसरतों, खुशबुओं, इम्तिहानों व हौसलों का जि़क्र किया गया है। भाषा के धरातल पर हिंदी व उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल बखूबी किया गया है। उर्दू के कठिन अल्फाज़ों के अर्थ भी ग़ज़ल के अंत में ही दिये गये हैं, जिससे शब्दों की गहराई समझने में समस्या नहीं होती और प्रवाह सतत बना रहता है।

पुस्तक : ग़ज़ल, ग़ज़ल के नाम लेखक : डॉ. महेश प्रसाद सिंघल प्रकाशक : अभिनव प्रयास प्रकाशन, अलीगढ़ पृष्ठ : 112 मूल्य : रु. 300.

भारतीय संस्कृति का गौरव गान
राजेंद्र धवन

डॉ. हरीश चंद्र झंडई का काव्य-संग्रह ‘ज़िंदगी में धूप छांव’ जीवन का हर रंगरूप अपने में समेटे है। संग्रह में सजी उनकी 71 कविताएं मानव जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव, हर गम-खुशी का विवेचन करती हैं। इतिहासकार कवि ने जहां अपने अल्फाजों में जीवन के अनुभवों का निचोड़ डाला है, वहीं कल्पना का सहारा लेकर भविष्य की उज्ज्वल राह भी दिखायी है।
अध्यापन कार्य से सेवानिवृत्त झंडई इससे पूर्व 3 किताबें पाठकों को दे चुके हैं और रचनाधर्मिता को अपना उत्तरदायित्व मानते हैं। आलोच्य काव्य-संग्रह की कविताओं में यह खूबी है कि पाठक इसका जितना अध्ययन करते जाएंगे उतना जीवन के अनुभवों को आत्मसात‍् करते चले जायेंगे। कविताएं हर वर्ग के पाठक के अंतर्मन को छूती हैं पर युवा पीढ़ी को नवीन ऊर्जा का अहसास कराती हैं। नारी की पीड़ा व उसके आधुनिक जीवन पर भी कवि ने बखूबी कलम चलाई है। मॉडर्न जीवनशैली पर कवि तीखे तंज कसने में भी पीछे नहीं रहे हैं।
कवि के अनुसार ‘कला रस है, जीवन की है रचना/ रंग दो इसे अपनी कल्पना से/ सजा दो नई दुनिया, नया जीवन, कुछ नया पाने को।’ कवि का एक अन्य जगह कहना है ‘बिखरा हुआ चारों तरफ प्रकृति का सौंदर्य/आनंद लेने की फुर्सत नहीं, डूब जाते हैं, चंद पलों की भौतिक खुशियों में।’
आज देश पर्यावरण प्रदूषण के संकट से घिरा है। ऐसे में कवि ने भी अपना उत्तरदायित्व बखूबी निभाया है। पर्यावरण सुरक्षा को लेकर भौतिकवादियों को खरी-खरी सुनाई है और इसके दिनोंदिन बढ़ते खतरे के प्रति प्रेरित करती कविताएं संग्रह में संजोई है। वे कविताओं के जरिये पश्चिमी फैशन छोड़ भारतीय संस्कृति का भी गौरवगान करते हैं।
पुस्तक : ज़िंदगी में धूप छांव लेखक : डॉ. हरीश चंद्र झंडई प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, करनाल रोड, कैथल पृष्ठ : 136 मूल्य : रु. 300.


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