वर्तमान डगर और कर्म निरंतर !    लिमिट से ज्यादा रखा प्याज तो गिरेगी गाज !    फिर उठा यमुना नदी पर पुल बनाने का मुद्दा !    कश्मीर में चरणबद्ध तरीके से बहाल होगी इंटरनेट सेवा !    बर्फबारी ने कई जगह तोड़ी तारबंदी !    सुजानपुर में क्रिकेट सब सेंटर जल्द : अरुण धूमल !    पंजाब में नदी जल के गैर-कृषि इस्तेमाल पर लगेगा शुल्क !    जनजातीय क्षेत्रों में ठंड का प्रकोप जारी !    कर्ज से परेशान किसान ने की आत्महत्या !    सेना का 'सिंधु सुदर्शन' अभ्यास पूरा !    

त्वरित निपटारे को बने प्रभावी तंत्र

Posted On December - 3 - 2019

लंबित न्याय

अनूप भटनागर
न्यायपालिका और सरकारें अथक प्रयासों के बावजूद उच्चतम न्यायालय से लेकर अधीनस्थ अदालतों तक लंबित मुकदमों की संख्या पर काबू पाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं। इस समय देश की अदालतों में 3,16,48,934 मुकदमे लंबित हैं और इनमें दस साल ज्यादा पुराने मुकदमों की संख्या 65 लाख से अधिक है। अब सरकार चाहती है कि उच्च न्यायालयों में दस साल से ज्यादा समय से लंबित मुकदमों का तेजी से निपटारा किया जाये। सवाल यह है कि ऐसा कैसे हो?
उच्च न्यायालयों में आठ लाख से अधिक मुकदमे दस साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं जबकि देश की सारी अदालतों में इस तरह के 65 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। आखिर उच्च न्यायालयों में दस साल से ज्यादा लंबित मुकदमों का निपटारा तेजी से कैसे हो? इस स्थिति से निपटने के लिये जरूरी है कि न्यायपालिका में न्यायाधीशों के पद रिक्त होने से करीब छह महीने पहले ही नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाये। इसी तरह, अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्त स्थानों पर नियुक्तियों के लिये होने वाली प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार इस समय देश की अदालतों में पांच साल से ज्यादा समय से लंबित मुकदमों की संख्या 65,96,318 है। इनमें 30 साल से ज्यादा पुराने मुकदमों की संख्या 72,243 है जबकि 20 से 30 साल पुराने मुकदमों की संख्या 3,65,998 और 10 से 20 साल पुराने मुकदमों की संख्या 19,41,087 है। इन आंकड़ों के अनुसार अकेले पांच से दस साल पुराने मुकदमों की संख्या 42,16,990 है। अदालतों में महिलाओं द्वारा दाखिल मामलों की संख्या भी 30 लाख से ज्यादा है जबकि वरिष्ठ नागरिकों द्वारा दायर मुकदमों की संख्या भी 19,63,000 पार कर चुकी है।
यह सही है कि मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 35 कर दी है और वहां इस समय 59,800 से अधिक मुकदमे लंबित हैं जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या इस समय 1079 है और इनमें से 420 पद अभी भी रिक्त हैं। उच्च न्यायालयों में अभी भी 40 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं।
लंबित मुकदमों, विशेषकर दस साल से ज्यादा पुराने मामलों के संबंध में बेहतर होगा कि यदि उच्च न्यायालय भी अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद सहित कई मामलों में सुनवाई के लिये निर्धारित की गयी समय सीमा का सख्ती से पालन करे। साथ ही आवश्यक होने पर ही सुनवाई स्थगित करे तो इन मुकदमों का तेजी से निपटारा हो सकता है। इसके अलावा, मुकदमों की सुनवाई पूरी होने के बाद इनके फैसला सुनाने के बारे में शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों का पालन भी लंबित मुकदमों की संख्या कम करने में मददगार हो सकता है।
उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में मुकदमों के बढ़ते बोझ से निपटने के लिये जरूरी है कि दोनों ही स्तरों पर न्यायालय कक्षों और अदालतों की संख्या बढ़ाई जाये। जरूरी है केन्द्र और राज्य सरकारें न्यायिक सुधारों के साथ ही लंबित मुकदमों के तेजी से निपटारे के प्रति अधिक गंभीर हों।
उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद उच्च न्यायालयों की तरह ही अधीनस्थ अदालतों में भी बड़ी संख्या में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के पद रिक्त हैं। अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के 23,566 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 25 प्रतिशत पद अर्थात 6224 पद अभी भी रिक्त हैं। न्यायपालिका में इतनी बड़ी संख्या में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के पद रिक्त होने और तीन करोड़ मुकदमे लंबित होने के तथ्य के मद्देनजर शीघ्र न्याय की आस की सहज ही कल्पना की जा सकती है। जरूरी है कि उच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या के साथ ही अदालत कक्षों की संख्या में वृद्धि की जाये, वहीं कोई भी नया कानून बनाते समय सरकार इस तथ्य पर भी ध्यान दे कि अदालतों पर इसका कितना बोझ पड़ेेगा।
केन्द्र का कहना है कि उसने अदालतों की ढांचागत सुविधाओं में सुधार के लिये अनेक कदम उठाये हैं लेकिन स्पष्ट नहीं है कि मुकदमों के अनुपालन में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने की दिशा में क्या कदम उठाये जा रहे हैं। सरकार ने हालांकि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने से इनकार कर दिया है लेकिन उसे मुकदमों के तेजी से निपटारे के लिये अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए। इस समय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 साल और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 62 साल है।


Comments Off on त्वरित निपटारे को बने प्रभावी तंत्र
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.