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कालका-शिमला रेल सेक्शन पर टेल्गो ट्रेन चलना कठिन

Posted On December - 2 - 2019

कालका-शिमला रुट पर परवाणू के समीप घुमावदार मोड़ से गुजरती टाॅय ट्रेन। -निस

शहबाब सेमुअल/निस
पिंजौर, 1 दिसंबर
कालका-शिमला रेल सेक्शन पर 3 घंटों में सफर पूरा करने का सैलानियों का सपना फिलहाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा। गत वर्ष भारतीय, विदेशी इंजीनियरों ने नैरोगेज रेलमार्ग का बारीकि से निरीक्षण कर तेज गति की ट्रेन चलाने की संभावनाएं तलाशी थीं और इंजन के साथ जुड़े हुए डिब्बों वाली टेल्गो ट्रेन चलाने पर भी विचार किया गया था। कालका से शिमला तक 96 किलोमीटर लंबी लाइन के दौरान 102 सुरंगें, 988 फुल, 917 घुमावदार मोड़ हैं जिनमें से कई 48 डिग्री के तीव्र मोड़ हैं। कनोह रेलवे स्टेशन के समीप चार मंजिला स्टोन आर्च गैलरी ब्रिज है।
इस लाइन पर टाॅय ट्रेन समुद्र तल से 2075 मीटर की ऊंचाई पर 25 तीखे ढलान से होकर गुजरती है। ऊपर से लाइन की चौड़ाई मात्र ढाई फुट है, इसलिए हर मोड़ पर इंजन और डिब्बों का झुकाव विपरीत दिशा की ओर होता है। यदि स्पीड बढ़ाई गई तो ट्रेन के डीरेल होने का खतरा बना रहता है। इसलिए इस रूट पर मात्र 20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ही ट्रेनें चलाई जा रही हैं। ऐसे में 96 किलोमीटर का सफर लगभग 6 घंटे में पूरा होता है। रेलवे का इस सफर का समय आधा करने की योजना है। गत दिवस रेलवे जीएम टीपी सिंह ने टेल्गो ट्रेन चलाने की रेलवे की किसी भी योजना से इंकार किया था, इसलिए टेल्गो ट्रेन चलाने पर पूरी तरह से विराम लग गया है। फिलहाल रेलवे नई तकनीक के डिब्बों को मॉडिफाई कर रहा है जिनका मोड़ पर झुकाव कम होगा और ट्रेन की रफ्तार केवल 5 से 6 किलोमीटर प्रति घंटा तक बढ़ाई जा सकेगी जिससे सफर लगभग डेढ़ घंटे तक कम हो सकेगा।
2015 में हो चुका है हादसा
यह रेल सेक्शन यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। इसलिए इस रेललाइन में किसी प्रकार के बदलाव संभव नहीं है। गौरतलब है कि सितंबर 2015 में टॉय ट्रेन की हल्की सी स्पीड बढ़ाई गई थी तब कालका से कुछ दूरी पर परवाणू टकसाल स्टेशन के पास चार्टेड ट्रेन डिरेल हो गई थी जिसमें सवार दो ब्रिटिश महिलाओं की मृत्यु हो गई थी और दर्जनों सैलानी घायल हो गए थे। इसलिए रेलवे विभाग इस रूट पर ट्रेन की स्पीड बढ़ाने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।


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