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एकदा

Posted On December - 11 - 2019

समर्पण का सम्मान
एक बार एक राजा भोजन कर रहा था। खाना परोस रहे सेवक के हाथ से अचानक थोड़ी सी सब्जी राजा के कपड़ों पर छलक गई। राजा की त्योरियां चढ़ गयीं। यह देख सेवक घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा के क्रोध की सीमा न रही। उसने क्रोध से आगबबूला हो सेवक से पूछा—तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया? सेवक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया—महाराज ! पहले आपका गुस्सा देखकर मैंने समझ लिया था कि अब जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर सोचा कि लोग कहेंगे कि राजा ने छोटी-सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दे दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती। तब मैंने सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं, जिससे दुनिया आपको बदनाम न करे और मुझे ही अपराधी समझे। राजा को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश मिला और पता चला कि सेवक भाव कितना कठिन है। जो समर्पित भाव से सेवा करता है, उससे गलती भी हो सकती है फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो या परिवार का कोई सदस्य। ऐसे समर्पित लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए।
प्रस्तुति : शशि सिंघल


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