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आयकर राहत से दूर होगी आर्थिक सुस्ती

Posted On December - 5 - 2019

जयंतीलाल भंडारी
हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने कहा है कि वित्त वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितम्बर, 2019 में विकास दर फिसलते हुए 4.5 फीसदी पर जा पहुंची है, जो पिछले साढ़े छह साल का सबसे निचला स्तर है। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ता मांग बुरी तरह डगमगा जाने के कारण उद्योग-कारोबार में भारी गिरावट आ गई है। ऐसे में उपभोक्ताओं की मुट्ठी में नई क्रय शक्ति दी जानी जरूरी है।
पिछले दिनों विश्व आर्थिक फोरम और भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देश के उद्योग प्रतिनिधियों ने देश में आर्थिक सुस्ती के मद्देनजर उपभोक्ता मांग को पूरा करने के लिए व्यक्तिगत आयकर दरों में कटौती करने की जोरदार मांग की। भले ही इसमें राजकोषीय घाटा बढ़ जाए तो भी अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए और कारोबारियों में भरोसा पैदा करने के लिए आयकर दरों में राहत जरूर दी जानी चाहिए।
वस्तुतः सरकार भी उद्योग-कारोबार के लिए कारपोरेट टैक्स में कमी करने के बाद अब करदाताओं के लिए टैक्स में उपयुक्त कमी करके करदाता वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाने पर विचार करते हुए दिखाई दे रही है। यही कारण है कि देश में पहली बार वित्त मंत्रालय ने टैक्स सुधार को लेकर सुझाव आमंत्रित किए हैं। हाल ही में 13 नवंबर को वित्त मंत्रालय ने परिपत्र जारी कर एक फरवरी 2020 को पेश किए जाने वाले वित्त वर्ष 2020-21 के केंद्रीय बजट के लिए उद्योग और व्यापार संघों से आयकर व अन्य करों में बदलाव के बारे में सुझाव मांगे हैं। अब तक वित्तमंत्री विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों से बजट पूर्व विचार-विमर्श करते आए हैं। देश के उद्योग-कारोबार, उपभोक्ता संगठनों, कर सलाहकार संगठनों और आयकरदाताओं द्वारा वित्तमंत्री से एकमत से आयकर राहत की अपेक्षा की जा रही है। आर्थिक सुस्ती से बढ़ रही मुश्किलों से राहत के लिए छोटे आयकरदाता और मध्यम वर्ग के करोड़ों लोगों द्वारा इनकम टैक्स में राहत की जरूरत अनुभव की जा रही है। अर्थ विशेषज्ञों का मत है कि राहत से उनके पास जो रुपए बचेंगे, उससे मांग में वृद्धि होगी तथा उससे आर्थिक गतिविधियां भी तेज होंगी।
निश्चित रूप से कारपोरेट टैक्स घटाने के बाद अब पूरा देश वर्ष 2020-21 के नए बजट में नए डायरेक्ट टैक्स कोड और नए इनकम टैक्स कानून को शीघ्र आकार दिए जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। गौरतलब है कि नई प्रत्यक्ष कर संहिता का मसौदा तैयार करने के लिए गठित टास्क फोर्स के अध्यक्ष अखिलेश रंजन ने अपनी रिपोर्ट वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपी है। इस रिपोर्ट में प्रत्यक्ष कर कानूनों में व्यापक बदलाव और वर्तमान आयकर कानून को हटाकर नए सरल व प्रभावी आयकर कानून लागू करने की बात कही गई है। नए आयकर कानून में छोटे करदाताओं की सहूलियत के लिए कई प्रावधान सुझाए गए हैं। असेसमेंट की प्रक्रिया सरल किए जाने और आयकर कानून के किसी प्रावधान को लेकर करदाता सीधे केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड से व्यवस्था ले सकेंगे। इसके अलावा कमाई पर दोहरे कर का बोझ भी खत्म करने की सिफारिश की गई है।
यह जरूरी है कि नए बजट 2020-21 के तहत 5 लाख तक की आय पर जो मौजूदा आयकर छूट है वह आगे भी जारी रखी जाए। 5 से 10 लाख रुपए तक की वार्षिक आय पर जो मौजूदा 20 फीसदी की दर से आयकर है, उसे घटाकर 10 फीसदी किया जाए। 10 से 20 लाख रुपए तक की वार्षिक आय पर जो मौजूदा 30 फीसदी आयकर की दर है, उसे घटाकर 20 फीसदी किया जाए। इससे मध्यम वर्ग के लोग बड़ी संख्या में लाभान्वित होंगे। नए बजट में टैक्स विवादों के जल्द निपटारे के लिए भी अहम कदम उठाए जाने चाहिए। स्थिति यह है कि इस समय आयकर अपील ट्रिब्यूनल और उच्च अदालतों में 1.15 लाख करोड़ रुपए के मामले फंसे हैं। 3.41 लाख मामले आयकर कानून आयुक्त (अपीलीय) के पास लंबित हैं, जिनकी राशि 5.71 लाख करोड़ रुपए के लगभग है। वस्तुतः कर विवादों का बढ़ना और लंबे समय तक निपटारा न होना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
वर्ष 2020-21 के नए बजट के तहत आयकर के संबंध में विचार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हमारे देश में सरकार की आय में प्रत्यक्ष कर में आयकर सबसे प्रमुख कर है। इस कर में राहत से लाखों छोटे करदाता लाभान्वित हो सकते हैं। यद्यपि देश की आजादी के बाद वर्ष 1961 तक देश की प्रत्यक्ष कर नीति व आयकर कानून में कुछ सुधार किए गए। फिर 1961 में आयकर अधिनियम लागू किया गया। लेकिन इस अधिनियम में एक ओर कार्यान्वयन संबंधी जटिलताएं रहीं, वहीं दूसरी ओर विभिन्न रियायतों और अनेक छूटों के कारण कर अनुपालन में मुश्किलें बढ़ती गईं। चूंकि मौजूदा प्रत्यक्ष कर एवं आयकर कानून दुरूह हैं और बीते 58 साल के विभिन्न अदालतों के फैसलों के बाद यह कानून काफी अस्पष्ट और भ्रामक हो चुका है। पिछले एक दशक से आयकर कानून में परिवर्तन की बात आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र से लगातार उठती रही है।
नई प्रत्यक्ष कर संहिता के लिए टास्क फोर्स का गठन किया था। इस टास्क फोर्स के द्वारा विभिन्न देशों की प्रत्यक्ष कर प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू प्रत्यक्ष कर संधियों का तुलनात्मक अध्ययन करके भारत के लिए श्रेष्ठ नए आयकर कानून व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष कर प्रणाली संबंधी रिपोर्ट 19 अगस्त, 2019 को सरकार को सौंप दी गई है। यह उपयुक्त दिखाई दे रहा है कि वर्ष 2020-21 के नए बजट के तहत नई प्रत्यक्ष कर संहिता के लिए सौंपी गई रिपोर्ट को कार्यान्वित किया जाए।
नए बजट 2020-21 के तहत नए आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाना होगा। देश के वर्तमान आयकर कानून की कमियों का संभावित करदाताओं द्वारा अनुचित फायदा उठाया जाता रहा है। अच्छी कमाई होने के बाद भी लोग आयकर देने से बचते रहे। नोटबंदी और कर प्रशासन द्वारा डाटा विश्लेषण के बाद मालूम हुआ है कि बड़ी संख्या में लोग आय छिपाते रहे तथा आवश्यक आयकर के भुगतान में बेईमानी करते रहे। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार नोटबंदी के कारण वित्त वर्ष 2016-17 के लिए रिटर्न दाखिल करने वालों की तादाद में भारी इजाफा हुआ। नोटबंदी के कारण काला धन जमा करने वाले लोगों में घबराहट बढ़ी। ऐसे में आयकरदाताओं की संख्या बढ़ी। आयकरदाताओं की संख्या 2016-17 में बढक़र 6.26 करोड़ पर पहुंच गई है, जो 2015-16 की तुलना में 23 फीसदी अधिक है। वर्ष 2017-18 में आयकरदाताओं की संख्या और बढ़कर 7.4 करोड़ हो गई।

जयंतीलाल भंडारी

चूंकि इस समय देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है, ऐसे में वर्ष 2020-21 के बजट में वित्तमंत्री के द्वारा उद्योग-कारोबार जगत और आयकरदाताओं को राहत देने के लिए रंजन समिति द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों के आधार पर ऐसी सरल और प्रभावी नई प्रत्यक्ष कर संहिता और नए आयकर कानून को शीघ्र आकार दिया जाना होगा, जिससे करदाताओं को सहूलियत होगी और कर संग्रह भी बढ़ेगा। हम आशा करें कि वर्ष 2020-21 के नए बजट के तहत नए आयकर कानून के आकार लेने के बाद बड़ी संख्या में नए आयकरदाता दिखाई देंगे और टैक्स संबंधी मुकदमेबाजी कम करने में मदद मिलेगी।

लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं।


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