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अयोध्या पर पुनर्विचार याचिका दायर

Posted On December - 3 - 2019

नयी दिल्ली, 2 दिसंबर (एजेंसी)
अयोध्या मामले में सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए सोमवार को एक मुस्लिम पक्षकार ने याचिका दायर की। इस प्रकरण के मूल वादकारों में शामिल एम. सिद्दीक के कानूनी वारिस और उप्र जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहाद रशीदी ने याचिका में कहा है कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देने पर ही पूरा न्याय हो सकता है।
अधिवक्ता एजाज मकबूल के माध्यम से दायर याचिका में 14 बिन्दुओं पर पुनर्विचार करने और 9 नवंबर के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि राम लला को सौंपने और मस्जिद निर्माण के लिए उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन आबंटित करने का केंद्र को निर्देश दिया था। इसके साथ ही अदालत ने मंदिर निर्माण के लिये 3 महीने के भीतर एक ट्रस्ट गठित करने का निर्देश केंद्र को दिया है।
याचिका में दलील दी गयी है कि विवादित स्थल पर मस्जिद गिराने सहित हिन्दू पक्षकारों द्वारा अनेक अवैधताओं का संज्ञान लेने के बावजूद शीर्ष अदालत ने उन्हें माफ कर दिया और भूमि भी उनको दे दी। पुनर्विचार याचिका के अनुसार, ‘इस फैसले के माध्यम से अदालत ने बाबरी मस्जिद नष्ट करने और उसके स्थान पर वहां भगवान राम के मंदिर के निर्माण का परमादेश दे दिया है।’ रशीदी ने याचिका में कहा है कि वह पूरे फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध नहीं कर रहे, उनकी याचिका हिन्दुओं के नाम भूमि करने जैसी त्रुटियों तक सीमित है, क्योंकि यह एक तरह से बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के परमादेश जैसा है। रशीदी ने 93 पेज की याचिका में यह भी कहा है कि पीठ ने अनुच्छेद 142 का गलत तरीके से इस्तेमाल करके गलती की है।
मस्जिद के लिए जमीन देने पर भी सवाल
रशीदी ने मस्जिद निर्माण के लिए जमीन आबंटित करने के लिए केंद्र और यूपी सरकार को अदालत के निर्देश पर भी सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि मुस्लिम पक्षकारों ने इस तरह का कोई भी अनुरोध कभी नहीं किया। रशीदी ने कहा कि वह इस प्रकरण की संवेदनशीलता के प्रति सजग हैं और शांति तथा सद्भाव बनाये रखने के लिए इस विवाद को खत्म करने की आवश्यकता भी समझते हैं, लेकिन न्याय के बगैर किसी प्रकार की शांति नहीं हो सकती है।

‘शीर्ष अदालत का फैसला सबूतों और तर्कों पर आधारित नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाये जाने के सबूत नहीं होने की बात कोर्ट ने मानी। इससे मुस्लिमों का दावा साबित हुआ, लेकिन अंतिम फैसला इसके उलट था। फैसला हमारी समझ से परे है, इसलिए हमने पुनर्विचार याचिका दायर की है। इससे देश का माहौल खराब नहीं होगा।’

-मौलाना सैयद अरशद मदनी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख


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