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हिंद-प्रशांत कूटनीति के यक्ष प्रश्न

Posted On November - 8 - 2019

जब से अमेरिकी सेना ने हिंद-प्रशांत महासागरीय कमान की स्थापना की है तब से लेकर राष्ट्रपति ट्रंप समेत अमेरिकी काबिना के शीर्ष सदस्य इस पर अपना विशेष ध्यान दे रहे हैं। आज जब कभी बात मुख्य अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की स्थिति की चलती है तो इस क्षेत्र का जिक्र बतौर नया विषय अवश्य आता है। भारत ने भी अपने विदेश विभाग में अलग से ‘हिंद-प्रशांत उपभाग’ स्थापित कर दिया है, यहां तक कि ‘आसियान संगठन’, जहां निर्णय केवल सर्वसम्मति से होते हैं, उसने भी नया हिंद-प्रशांत प्रारूप अपनाया है। इस नये भू-राजनीतिक एवं सामरिक मंच को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए? क्या यह महासागरीय सामरिक खेल को एकदम पलटने वाली होगी या इसका मकसद केवल चीन के बढ़ते प्रभाव पर नियंत्रित करना है? इस पर चर्चा पुणे में 8-9 नवंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा पर आयोजित होने जा रहे विचार सम्मेलन में होगी।
बिना शक, पिछले कुछ दशकों से जिस भू-राजनीतिक बदलाव का असर दुनियाभर पर हुआ है, वह है चीन का बढ़ता प्रभाव। कई समीक्षकों का मानना है कि हिंद-प्रशांत अवधारणा का निर्माण भारत को शामिल करने के उद्देश्य से ही हुआ है, इस उम्मीद में ताकि इससे चीन के साथ संतुलन साधने में आसानी हो सके और इसी सोच को लेकर अमेरिका ने इस मंच के नामकरण में ‘हिंद-प्रशांत’ शब्द जोड़ा है क्योंकि इसके अंतर्गत लिया जाने वाला इलाका भारत के पश्चिमी तटों से लेकर अमेरिका के पश्चिमी तटों तक फैला है। इसके अलावा, एकमुक्त और खुला हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र होने का मतलब है कोई भी देश इस इलाके से होकर गुजरने वाले हवाई और समुद्री जहाजों की आवाजाही पर अपनी मनमर्जी से नियंत्रण लगाकर केवल अपना प्रभुत्व कायम न कर पाए। मुक्त व्यापारिक आवाजाही सुचारु रखना इसका अन्य पहलू है। इस तरह के उपायों का उद्देश्य विश्व में उभरने वाली नई शक्ति के संभावित दबदबे को समय रहते निष्प्रभावी करना है और इसकी मूल सोच के पीछे जाना-पहचाना शक्ति-संतुलन बनाने वाला सिद्धांत है। लेकिन क्या यह फार्मूला 21वीं सदी में भी सार्थक होगा?
विश्व मानचित्र पर भारत की भू-राजनीतिक स्थिति के मुताबिक हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र अफ्रीका के पूर्वी तटों से लेकर अमेरिका के पश्चिमी तटों तक बनता है। हिंद महासागर का पश्चिमी हिस्सा भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है और इस पर विचार करना उस वक्त और भी ज्यादा मौजूं हो जाता है जब कोई भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पुणे में बैठक करे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी और चली आ रही विश्व-व्यवस्था में आज बदलाव लाने की बहुत जरूरत है ताकि यह मौजूदा हकीकतों को परिलक्षित कर सके। यह बात केवल संयुक्त राष्ट्र और इसकी सुरक्षा परिषद पर ही नहीं लागू नहीं होती बल्कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के संदर्भ में भी उतनी ही सार्थक है। साथ ही यह अनेक बहुपक्षीय विषय हेतु नियमावली बनाने पर भी उतनी ही शिद्दत से लागू होती है। कोई देश अपने हितों के लिए समुद्र, पर्यावरण, साइबर स्पेस और बाहरी अंतरिक्ष के मामले में कैसा रुख अपनाए, इसको लेकर नए नियमों को बनाना और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि कई नए देश 1945 से बाद वाले समय में वजूद में आए हैं।
सबसे फौरी जरूरत समुद्र संबंधी व्यवस्था-नियम बनाने की है, खासकर हिंद-प्रशांत महासागरीय इलाके को लेकर। शक्ति संतुलन को लेकर अपनाया गया ‘जीरो-सम गेम’ वाला तरीका अब पुराना पड़ चुका है और अब इसमें तेजी से सुधार लाते हुए इसे ‘सबका साथ’ अर्थात चढ़ती लहरों से सभी जहाज उपर उठते हैं (‘टाइड रेजिंग ऑल शिप्स’) या फिर ‘सबसे के एक लिए जैसा… सब एक जैसे’ (‘ऑल फॉर वन, वन फॉर ऑल’) वाला भारी बदलाव लाना होगा, जहां छोटे-बड़े सबकी आवाज बराबर सुनी जाए। यही कारण है कि भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है बल्कि संयुक्त आर्थिक उन्नति में सबको हिस्सा मिलता है। वैसे भी हिंद-महासागर मंच कोई ऐसा विशिष्ट संघ नहीं है जो किसी मुल्क के खिलाफ है या फिर किसी को जानबूझकर बाहर रखने पर आमादा हो।
भारत का परिप्रेक्ष्य यह है कि चीन को इस क्षेत्र के लिए बनाए जाने वाले नियमों की निर्धारण प्रकिया में जरूर भाग लेना चाहिए, लेकिन उसे यह भी मालूम हो कि सभी देशों के हित ध्यान में रखने हैं। इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सागर’ नामक संकल्पना पेश की है, जिसका मूल तत्व है ः ‘क्षेत्र के सभी देशों के लिए सुरक्षा और उन्नति का मौका एक समान’। सवाल यह बनता है कि क्या चीन इस प्रयास में ईमानदारी से भूमिका अदा करेगा या फिर नियम निर्धारण को अपने हक में झुका लेगा। लेकिन उसकी बाद वाली हरकत अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को अस्वीकार्य होगी, इस बात का अहसास चीन को भी बखूबी है। उसे यह बात जरूर समझनी होगी कि दुनिया में सभी के हित बराबर धरातल पर आन मिलते हैं।
जहां तक भारत का संबंध है, इसकी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति न सिर्फ इसके बृहद हिंद-प्रशांत सिद्धांत का एक मुख्य पहलू है वरन‍् यह विश्व के इस क्षेत्र में और ज्यादा सक्रिय भूमिका अदा करने को भी तैयार है। भारत के सामने एक अन्य चुनौती है ‘क्षेत्रीय बृहद आर्थिक साझेदारी संधि’, क्योंकि सेवा क्षेत्र का व्यापार इस संधि का महत्वपूर्ण अवयव है। साझीदार देशों को समझना होगा कि अगर इसकी शर्तों से भारत को तसल्ली नहीं है तो उन्हें चीन के दबाव में आकर इस संधि को जल्दबाजी में लागू करने से बचना होगा। चीन को यह अवश्य सुनिश्चित करना होगा कि नए नियम बनाते समय दुनियाभर के आम आदमी की सुरक्षा और उन्नति अक्षुण्ण रहे।
चूंकि पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में भी भारत के हित बहुत ज्यादा हैं इसलिए हमारे हिसाब से विश्व के इस भाग को भी हिंद-प्रशांत महासागरीय मंच में शामिल किया जाना चाहिए। हमारे तेल आयात का काफी हिस्सा इस इलाके से आता है और बहुत बड़ी संख्या में भारतीय इन देशों से कमाई करके विदेशी मुद्रा के रूप में स्वदेश भेजते हैं। इसी तरह इस क्षेत्र में अमेरिका, चीन और जापान की काफी बड़ी-बड़ी सामुद्रिक एवं सामाजिक संपत्तियां हैं, इसलिए इस इलाके का हमारे लिए बहुत महत्व है। हमारी ‘लुक वेस्ट’ नीति भी सही गति से आगे बढ़ रही है। इस कड़ी में सऊदी अरब और यूएई हमारे महत्वपूर्ण मित्र बन गए हैं।

गौतम बम्बावाले

ले. जनरल शमशेर सिंह मेहता (रि.)

इसलिए हिंद-प्रशांत महासागरीय मंच के तहत कौन-सा इलाका हो, इसकी निशानदेही को लेकर इस हिस्से के मुख्य देशों के बीच मतभेद और असहमति जरूर है। लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसकी स्थापना के वक्त किसी मुल्क को बाहर रखने वाला काम नहीं होना चाहिए। इसकी बजाय सबको साथ लेकर विचार-विमर्श से हिंद-प्रशांत महासागरीय मंच के नियम बनाए जाएं ताकि विश्वभर का आम व्यक्ति अपने देश का गौरवमय उत्तराधिकारी बन सके। सभी मुल्कों के हित चाहे बड़े हों या छोटे, उनका ध्यान रखा जाए। उम्मीद है कि पुणे में होने जा रहे संवाद सम्मेलन में इसको पाने की संकल्पना निकलकर आएगी। अगर भारत अपने इस दृष्टिकोण को सुस्पष्ट कर पाने और इस विषय में अपनी आवाज सुनाने में सफल हो सका तो यह उपलब्धि छोटी नहीं होगी।

ले. जनरल मेहता (रि.) पश्चिमी सैन्य कमान के पूर्व कमांडर रह चुके हैं, बम्बावाले भूटान, पाकिस्तान और चीन में राजदूत रह चुके हैं। दोनों पुणे इंटरनेशनल सेंटर के सदस्य हैं।


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