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हम स्वयं बनें अपने भाग्य-निर्माता

Posted On November - 6 - 2019

लक्ष्मीकांता चावला

दीपावली से कई सप्ताह पहले यह चर्चा रहती है कि पटाखे चलाने से वायु प्रदूषित होती है। पूरे देश में विशेषकर उत्तर भारत में पटाखे न चलाने या कम चलाने का संदेश देने वाले कई कार्यक्रम करवाए जाते हैं। स्कूलों-कॉलेजों में भी बच्चों को इस संबंध में जागरूक किया जाता है, लेकिन हो वही जाता है जो पिछले कई वर्षों से हो रहा है। हर वर्ष की तरह इस बार भी यह आदेश मिला कि रात्रि आठ से दस बजे के बीच ही पटाखे चलें, पर अफसोस यह सुप्रीम के आदेश पटाखे के धुएं और धमाकों में ही उड़ गया। यह भी टीवी चैनलों में दो-चार दिन चर्चा का विषय बन जाता है कि दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण कितना बढ़ गया।
आश्चर्य यह भी है कि यह चिंता दिल्ली एनसीआर की ही ज्यादा क्यों की जाती है। पटाखे पूरे देश में चलते हैं। धुआं पूरे देश के आकाश में फैलता है। श्वास और हृदय रोग के मरीज सभी जगह संकट में पड़ जाते हैं, पर चर्चा केवल दिल्ली की संभवतः इसलिए कि वह देश की राजधानी है। अब तो वायु प्रदूषण के संबंध में किए गए एक अध्ययन ने यह निष्कर्ष भी दे दिया है कि उत्तर भारत में जहरीली हवा के कारण गंगा के मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों की आयु कम हो रही है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि उत्तर भारत में प्रदूषण शेष भारत के मुकाबले तीन गुणा ज्यादा है और देश की राजधानी दिल्ली सबसे अधिक प्रदूषित है।
द एनर्जी पाॅलिसी इंस्टीट्यूट एंड यूनिवर्सिटी आॅफ शिकागो की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार एयर क्वाॅलिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार वायु प्रदूषण 72 फीसदी तक बढ़ गया, जिस कारण उत्तर भारत में रहने वाले लोगों का जीवन सात वर्ष तक कम हो गया।
सवाल यह कि आखिर क्यों देश के शासक-प्रशासक अदालत और सुप्रीम अदालत के निर्णय लागू नहीं करवा पाते। यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनमानस को समझे बिना, जो समय सीमा तय की जाती है वह कितनी उचित है, पर विचारणीय यह भी है कि सभी जानते हैं कि पटाखों का धुआं किसी की भी सेहत के लिए अच्छा नहीं। प्रदूषण का बढ़ना अर्थात आयु का घटना है, फिर भी आम जनता स्वयं ही यह पहल क्यों नहीं कर लेती। सच्चाई यह भी है कि चुनाव जीतने वाले, चुनाव लड़ने वाले, महापुरुषों के जन्म या बलिदान दिन मनाने वाले, विवाह आदि उत्सवों पर जश्न मनाते समय सभी पटाखे जलाते हैं, पर चर्चा केवल दीपावली की होती है। विजयादशमी के अवसर पर भी रावण दहन का धूम-धड़ाका पटाखों से ही पूरा होता है। प्रदूषण तो पूरा वर्ष होता है, चर्चा केवल दीपावली के आसपास रहती है। प्रबुद्ध नागरिक यह भी पूछते हैं कि प्रदूषण क्या केवल पटाखों से होता है। जब देश में एक त्योहार मनाने के लिए लाखों जीव काटे जाते हैं तब भी तो प्रदूषण होता है। उस पर चर्चा क्यों नहीं? उसे बंद क्यों नहीं किया जाता? सच्चाई तो यह है कि देश में एक यह भी मानसिकता बन गई कि जो काम बहुत अधिक संख्या में लोग कर लें वह कभी अपराध माना ही नहीं जाता। सुप्रीम कोर्ट का ही एक आदेश रहा है कि नींद लेने का अधिकार सभी को है, इसलिए रात-रात भर सार्वजनिक स्थानों तथा अन्य कहीं भी लाउडस्पीकर लगाकर शोर न मचाया जाए। उसके लिए भी घंटे तय हैं और आवाज कितनी ऊंची रखनी चाहिए यह भी निर्देशित है, पर यह नियम लागू करवाने वाली मशीनरी कानून द्वारा नहीं अपितु उन लोगों द्वारा नियंत्रित है, जिन्होंने चुनावों में वोट लेने हैं।
राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोई शराब का ठेका न हो, यह भी माननीय अदालतों का ही आदेश था, पर सरकारों ने राजस्व के मोह में कानून ही बदल दिए या कानून भंग करने वालों को देखना छोड़ दिया। राष्ट्रीय राजमार्गों का जो भाग नगरों-महानगरों की सीमा से निकलता है वहां ठेके-अहाते चलाने की आज्ञा दे दी गई।
हमारी माननीय अदालतें आदेश दे सकती हैं, पर लागू करवाना जिस प्रशासनिक तंत्र का काम है वह खामोश रहता है, अनदेखी करता है या स्वयं को बेबस अनुभव करने लगता है।
कौन नहीं जानता कि प्राणवायु वृक्षों से मिलती है, हरियाली स्वास्थ्य देती है। फिर भी पंजाब और देश के अन्य प्रांतों में सड़कें बनाने के लिए वृक्ष काटे गए। कहीं-कहीं तो शौक पूरा करने और अपने पैलेस, रिसॉर्ट बनाने के लिए भी कुछ सत्तापतियों ने बेरहमी से वृक्ष काटे। काटे गए वृक्षों के स्थान पर नये वृक्ष लगाने का उन्हें ध्यान नहीं, क्योंकि इस देश के कई तबके अनियंत्रित हैं। इसलिए आज का विचारणीय विषय यह है कि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं बनें। घर की छतों, आंगन से हरियाली का आगाज करें। जहां तक संभव हो पौधे लगाकर उनका पालन करें। पटाखे ही नहीं, सिगरेट का धुआं भी बंद करवाएं तथा जीव हत्या भी रोकें।


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