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हमने उपयोग का स्वर्णिम अवसर गंवाया

Posted On November - 12 - 2019

जनसंख्या की ताकत

भरत झुनझुनवाला

पंद्रह से पैंसठ वर्ष की आयु के लोगों को ‘उत्पादक’ अथवा ‘कर्मी’ माना जाता है। ये किसी न किसी रूप में उत्पादन करके अपना जीवनयापन करते हैं। इसके इतर पंद्रह वर्ष से छोटे बच्चे और पैंसठ वर्ष से बड़े वृद्ध लोगों को ‘अवलंबित’ माना जाता है। इन्हें ‘अनुत्पादक’ माना जाता है। ये कर्मियों पर अवलंबित होते हैं। कर्मियों और अवलंबित लोगों के अनुपात को ‘अवलंबन अनुपात’ कहा जाता है। अवलंबन अनुपात न्यून होने का अर्थ है कि कर्मियों को अवलम्बियों पर कम खर्च करना होता है, जिस कारण उनके पास अन्य कार्य जैसे बच्चों की शिक्षा अथवा शेयर बाजार और प्रॉपर्टी में निवेश करने के लिए रकम उपलब्ध हो जाती है। इसके विपरीत अवलंबन अनुपात ऊंचा होने का अर्थ है कि कर्मियों को अवलम्बियों पर अधिक खर्च करना होता है और अन्य कार्यों के लिए उनके पास रकम नहीं बचती है।
स्वतंत्रता के बाद मेडिकल साइंस में सुधार हुआ। अपने देश में बाल मृत्यु दर में भारी गिरावट आई। मलेरिया जैसी बीमारियों पर हमने नियंत्रण पाया। इस कारण बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी। उस समय परिवार में चार या छह बच्चे होना आम बात थी। उस समय अवलंबित जनसंख्या बढ़ी और कर्मियों की संख्या पूर्ववत रही, जिससे अवलंबन अनुपात में भारी वृद्धि हुई।
हाल ही में देश में युवाओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई। साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण के प्रचार के कारण बाल जन्म दर में कमी आई है। आज तमाम दंपति एक या दो संतान पैदा कर रहे हैं। इस कारण अवलंबियों की संख्या में गिरावट आई। इस प्रकार अवलंबन अनुपात गिरा। इसका अर्थ यह हुआ की हर कर्मी के ऊपर आश्रित लोगों की संख्या में गिरावट आई है। आज का कर्मी यदि धन कमाकर घर लाता है तो उसे अधिक संख्या में बच्चों अथवा वृद्धों का पालन नहीं करना होता है, क्योंकि परिवार नियोजन के चलते बच्चों की संख्या में गिरावट आई है। आज कर्मी के पास धन उपलब्ध है, जिससे वह शिक्षा अथवा प्रॉपर्टी में निवेश कर सकता है।
आने वाले समय में परिस्थिति पुनः पलट जायेगी। कर्मियों की संख्या घटेगी। लेकिन फिर भी अवलम्बियों की संख्या में वृद्धि होगी क्योंकि आज के बड़ी संख्या के कर्मी पैंसठ वर्ष से बड़े होकर बड़ी संख्या में वृद्ध हो जायेंगे। वृद्धों की संख्या में वृद्धि होगी जबकि कर्मियों की संख्या घटेगी। इसलिए कर्मियों पर वृद्धों का बोझ बढ़ेगा और अवलंबन अनुपात पुनः बढ़ जाएगा। इससे स्पष्ट है कि आज से पहले अवलंबन अनुपात अधिक था क्योंकि बच्चों की संख्या अधिक थी। वर्तमान में अवलंबन अनुपात कम है क्योंकि बच्चों की संख्या कम है। भविष्य में अवलंबन अनुपात फिर से बढ़ जाएगा क्योंकि वृद्धों की संख्या बढ़ जायेगी। यानी अवलंबन अनुपात एक लहर की तरह चलता है।
इन तीनों में बीच का समय काल हमारे लिए विशेषकर लाभप्रद है। वर्तमान में कर्मियों की संख्या अधिक और बच्चों और वृद्धों की संख्या तुलना में कम है। इस विशेष समय का हम यदि सदुपयोग कर लें तो देश को भारी लाभ होगा। यदि आज के कर्मी उत्पादक कार्यों में लग सकें या उन्हें रोजगार मिले; अर्थात ये खेती करें या नौकरी करें तो वे देश की आय में या जीडीपी को बढ़ने में सहयोग करेंगे और देश की आय बढ़ेगी। उनकी परिवार की भी आय बढ़ेगी। आज बच्चों की संख्या कम है इसलिए उनकी फीस आदि देने का बोझ परिवार में कम होता है, इसलिए परिवार द्वारा बचत भी ज्यादा की जा सकती है। यह स्वर्णिम परिस्थिति है लेकिन यह तब तक ही बरकरार रहेगी जब तक आज के पंद्रह से पैंसठ वर्ष के कर्मी को रोजगार मिले और वे उत्पादन में अपना सहयोग कर सकें।
यदि आज के कर्मियों को रोजगार नहीं मिलेगा तो परिस्थिति पूरी तरह पलट जायेगी। तब परिवार हर तरह से पस्त हो जाएगा। तब परिवार में बच्चों की संख्या कम होगी। लेकिन जो युवा हैं, वे भी अवलंबित हो जायेंगे क्योंकि वे बेरोजगार हैं। वृद्ध पहले ही अवलंबित थे। इस प्रकार पूरा परिवार अवलंबित लोगों का हो जाएगा और परिवार का जीवनयापन कठिन हो जाएगा। परिवार न तो बचत कर पायेगा न ही निवेश। अतः वर्तमान में अवलंबन अनुपात के कम होने का जो स्वर्णिम समय है, यह स्वर्णिम तभी तक रहेगा जब तक हम कर्मियों को रोजगार उपलब्ध करा सकें।
नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार 2013 से 2018 के पांच वर्षों में 2 करोड़ रोजगार घटे हैं। जहां भारी संख्या में युवा श्रम करने को उद्यत हैं, उन्हें रोजगार देने के लिए रोजगारों में वृद्धि होनी चाहिए, इसके विपरीत रोजगार में 2 करोड़ की गिरावट आई है। वर्तमान में बेरोजगारी दर पिछले छह वर्षों के अधिकतम स्तर पर है। यानी वर्तमान में जो अवलंबन अनुपात के गिरने का लाभ था उसका हम उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इस समय जरूरत है कि देश की अर्थव्यवस्था की दिशा मूल रूप से बदली जाये। तभी हम युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा सकेंगे।


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