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सुल्तानपुर लोधी से उपजी  सच्ची बाणी

Posted On November - 10 - 2019

राज ऋषि
श्री गुरु नानक नामलेवा संगत के लिए ननकाना साहिब और करतारपुर साहिब के बाद सुल्तानपुर लोधी संभवत: सर्वाधिक नमन योग्य स्थल है, क्योंकि गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के बहुमूल्य लगभग 15 वर्ष यहीं व्यतीत किए। वस्तुत: युवा नानक के संत बनने की दास्तान यहां की गलियों में ही सर्वप्रथम कही गई। उनके कोमल और निष्कपट मन में परमेश्वर के प्रति लगन और प्रभु भक्ति का सरूर जिस धरा पर चढ़ा, वह पवित्र नगरी सुल्तानपुर लोधी की ही है, जिसके कण-कण में आज भी बाबा नानक के ‘सरबत के भले’ और ‘सांझीवालता’ के संदेश की धारा बह रही है। पर्यावरण प्रेमी संत बलबीर सिंह सीचेवाल इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से इस संदेश को आगे बढ़ा रहे हैं।
पूरा विश्व जिस गुरु नानक को महान समाज सुधारक और सिख धर्म के प्रवर्तक के रूप में आज जानता है, उस ‘पवित्र ज्योति’ ने राय भोए की तलवंडी (ननकाना साहिब) में आकार ग्रहण कर सुल्तानपुर लोधी में आकर ही परिपक्वता की सीढ़ियां चढ़ीं और समूची मानवता को ‘मन करतार और कर है किरत मांहि’ और ‘किरत करो ते वंड के छको’ का सुगम मार्ग दिखाया। यहां पर रहकर ही गुरु नानक ने समाज में व्याप्त कुरीतियों, पाखंडों और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाते हुए ‘जित्थे नीच समालियन तित्थे नदरी तेरी बख्शीश’ ‘सो क्यों मंदा आखिए जित जंमहि राजान’ की राह दिखाई और ‘पवन गुरु पानी पिता’ कहते हुए पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा की।
पिता मेहता कल्याण चन्द और माता तृप्ता देवी ने बाल नानक का भविष्य संवारने के लिए उन्हें बड़ी बहन नानकी, जो सुल्तानपुर में ब्याही हुई थीं, के पास भेज दिया। बहनोई जयराम ने उन्हें नवाब दौलत खां के ‘मोदी खाने’ में नौकरी पर लगवा दिया, पर भक्तिमय स्वभाव और परोपकार की भावना मन में समाए उनका अधिक ध्यान भक्ति में ही लीन रहा।
सुल्तानपुर लोधी में ही बहन और बहनोई ने गुरु जी का विवाह बटाला निवासी सुलखणी देवी से करवा दिया और यहां पर रहते ही उनके दो पुत्र श्रीचन्द और लखमी दास पैदा हुए। इस प्रकार उन्होंने सांसारिकता निभाते हुए ‘एको सिमरो नानका’ का पथ प्रदर्शित किया और कहा कि प्रभु भक्ति-प्रभु प्राप्ति के लिए संसार के त्याग की, विरक्ति की, संसार से भागने की आवश्यकता नहीं है।
गृहस्थी निभाते और ‘मोदी खाना’ में ‘किरत’ की जिम्मेदारी पूरी करते हुए भी गुरु नानक का सरल और साधु स्वभाव बरकरार रहा। यहां से ही उन्होंने अपने बचपन के साथी मरदाना, जो रबाब पर संगीत के सुर साधने में माहिर थे और जिनके सहयोग से उन्होंने अपनी बाणी को रागों में ढाला, के साथ देश-विदेश की यात्राएं (4 उदासियां) कीं। दक्षिण भारत, श्रीलंका, जगन्नाथ पुरी, गोरखपुर, वाराणसी, हरिद्वार, नेपाल, तिब्बत और अरब देशों आदि की यात्राओं के दौरान उन्होंने एक ओंकार-एक निराकार परमात्मा की सत्ता का वर्णन करते हुए जाति-पाति और भेदभाव आधारित समाज पर चोट करते हुए कहा— ‘ब्राह‍्मण जो ब्रहम बिचारे। आप तरै सगले कुल तारै।’ जगन्नाथ पुरी की यात्रा के दौरान उन्होंने ‘भव खंडना’ की आरती का वर्णन किया, जिसमें गगन थाल है और सूर्य, चन्द्र, तारे मोती हैं।
अपने समकालीन बाबर के आक्रमण के समय की गई मारकाट पर उनका हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने रोष में लिखा— ‘एेति मार पई कुरलाने, तै कि दर्द ना आया।’ बाबर के साथ अाए हमलावरों को उन्होंने ‘पाप की जंज’ कहा। इसी प्रकार शासकों के अत्याचार का विरोध करते हुए उन्होंने उन्हें ‘राजे छिं, मुकद्दम कुत्ते’ की संज्ञा दी। भक्तिकाल की समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति की लहर से प्रभावित गुरु नानक देव जी ने परोपकार के लिए ‘दसौंद’ की प्रथा पर ज़ोर दिया। वस्तुत: उन्होंने वेदों की एक ईश्वर की सत्ता और प्रभु की सर्वव्यापकता की मान्यता को आगे बढ़ाया, बोलचाल की भाषा और लोकप्रिय ‘शबद’ शैली में, जो आम जन के दिल के निकट थी। इसी कारण जहां-जहां वे गए, उनका प्रभाव बहुत व्यापक पड़ा।
देखा जाए तो सुल्तानपुर लोधी बाबा नानक के लिए ‘बेस कैंप’ की तरह रहा। जब-जब भी वह देश-विदेश की यात्राओं पर गए तो कुछ वर्षों के बाद लौट कर सुल्तानपुर आते रहे और कुछ अरसा बेबे नानकी जी के साथ व्यतीत करते रहे। संभवत: यहां बिताए समय की पावन स्मृतियों की सुगंध उन्हें खींच लाती थी। साखियों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जब भी बहन नानकी उन्हें याद करतीं,  भाई नानक जल्द से जल्द उनके पास  पहुंच जाते।

काली बेईं के किनारे स्थित प्राचीन कस्बा सुल्तानपुर लोधी का यह नाम 11वीं शताब्दी के अफगान हमलावर महमूद गजनी, जिसने इसे तहस-नहस कर दिया था, के एक जरनैल के नाम पर है। पहली शताब्दी में यह कस्बा बुद्ध धर्म का केंद्र रहा और तब इसका नाम सरवमानपुर था। यहां पर वैसे तो हर साल गुरु नानक पर्व पूर्ण धार्मिक श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है और तीन दिन तक अनेक प्रकार के कार्यक्रम चलते हैं। लेकिन इस बार विशेष रूप से 550वां प्रकाश पर्व बड़े स्तर पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और पंजाब सरकार की ओर से 12 नवंबर तक मनाया जा रहा है। देश-विदेश से संगत हज़ारों की संख्या में रोज़ शीश नवाने पहुंच रही है, जिसके लिए रिहायश, लंगर और परिवहन के सुचारु प्रबंध किए गए हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह सुअवसर है आस्था के इस केंद्र के दर्शनों का, उस पवित्र काली बेईं (नदी) में डुबकी लगाने का, जिसमें गुरु जी स्नान किया करते थे और किनारे पर ध्यान लगाया करते थे, बाबा नानक की ‘रूहानी होंद’ का अहसास करने का, जो आज भी सुल्तानपुर लोधी के चप्पे-चप्पे में व्याप्त है। यहां कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं, जो गुरु नानक की याद में उन स्थानों पर बने हैं, जिनसे वह किसी न किसी प्रकार संबद्ध रहे।

गुरु नानक की यादें समेटे ऐतिहािसक गुरुद्वारे
गुरुद्वारा बेर साहिब : सुल्तानपुर लोधी में पवित्र नदी के किनारे स्थित यह मुख्य और विशाल गुरुद्वारा है, जहां मुख्य समारोह किए जा रहे हैं। गुरु नानक यहां रोज सुबह सैर और स्नान-ध्यान करने आते थे। मान्यता है कि उन्होंने यहां नदी के किनारे बेरी लगाई, जो आज भी हरी-भरी है और उस पर फल आते हैं। भक्तजन इस बेरी के स्पर्श मात्र से स्वयं को धन्य समझते हैं। इसी गुरुद्वारा परिसर में शिरोमणि कमेटी ने श्रद्धालुओं के ठहराव के लिए नयी सराय बनाई है। यहीं पर समारोहों के लिए मुख्य पंडाल है। इसी के पास पंजाब सरकार की ओर से विशाल पंडाल स्थापित किया गया है और रात्रि ठहराव के लिए टेंट सिटी बनाया गया है।
गुरुद्वारा हट्ट साहिब : यह गुरुद्वारा उस स्थान पर स्थित है, जहां गुरु नानक देव ‘मोदी खाने’ में काम करते थे। यहां पर आज भी वे पवित्र बाट संभालकर रखे हुए हैं, जिनसे गुरु जी अनाज और अन्य वस्तुएं तोलकर देते थे। पत्थर के इन बाटों को देखकर श्रद्धालु अपने को धन्य मानते हैं। इस गुरुद्वारे के साथ एक सरोवर भी बना हुआ है, जहां संगत के स्नान की व्यवस्था है।
गुरुद्वारा कोठड़ी साहिब : कस्बे के ढंडिया मोहल्ले में स्थित यह वह स्थान है, जहां नानक देव को ‘मोदी खाना’ में काम करते समय किसी की झूठी शिकायत पर एक कोठड़ी में बंदी बना लिया गया था। शिकायत की गयी थी कि नानक लोगों को अधिक अनाज बांट रहे हैं, लेकिन दौलत खां की जांच में सब सच सामने आ गया और हिसाब-किताब बिल्कुल ठीक निकला। असल में प्रभु की सुरति लगी होने के कारण नानक देव ‘सब तेरा ही तेरा’ (उस प्रभु का) कह कर अपने कार्य में लगे रहते थे। दौलत खां ने गलती का अहसास किया और उन्हें पुन: नौकरी की पेशकश की, किंतु गुरु जी ने उसे अस्वीकार कर दिया और इसके बाद परोपकार और समाज सुधार के कार्य की ओर कदम बढ़ाए।
गुरुद्वारा गुरु का बाग : यह वह स्थान है, जहां गुरु नानक सुलखनी देवी से शादी के बाद रहते थे और यहां पर ही उन्होंने गृहस्थी की जिम्मेदारियां पूर्ण कीं। इस स्थान पर उस वक्त का एक कुआं भी है, जिसका पवित्र पानी आज भी लंगर में प्रयुक्त किया जाता है। कुछ समय पूर्व गुरुद्वारे के पुनरुद्धार के समय खुदाई करते हुए गुरु नानक काल की कुछ पवित्र वस्तुएं मिली हैं, जिन्हें संभाल कर रखा गया है और श्रद्धालुओं के लिए वे दर्शनीय हैं।
गुरुद्वारा संत घाट : कस्बे के बाहर श्मशानघाट के निकट स्थित यह गुरुद्वारा उस स्थान पर बनाया गया है, जहां गुरु नानक एक बार नदी में स्नान करने गए तो तीन दिन बाद इस स्थान पर ध्यान में लीन मिले थे। एक मान्यता के अनुसार यहां से ही उन्हें इलाही (ब्रह‍्म) ज्ञान की प्राप्ित हुई और इसके बाद ही वे ‘जग तारने’ (संसार के कल्याण) के लिए घर से निकल पड़े। सालाना मेले में इस स्थान पर निहंग सिंह अपने युद्ध कौशल के करतब दिखाते हैं।
गुरुद्वारा अन्तरयामता : बस अड‍्डे से सटा हुआ यह वह स्थान है, जहां साधु स्वभाव गुरु नानक देव एक बार एक शेख के कहने पर मस्जिद में गये। शेख ने गुरु नानक से पूछा था कि वे हिंदू हैं या मुसलमान। गुरु जी ने कहा कि दोनों एक ही हैं, तो शेख ने उनसे कहा कि ऐसा है तो हमारे साथ नमाज पढ़ें। गुरु जी मस्जिद में गये, लेकिन उन्होंने नमाज नहीं पढ़ी। इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा- शेख, मुल्ला और काजी का सिर्फ शरीर ही यहां था, ध्यान तो अपने सांसारिक कामों, चिंताओं में लगा हुआ था, परमात्मा या अल्लाह की तरफ तो था ही नहीं। मैं किसके साथ नमाज पढ़ता।
गुरुद्वारा बेबे नानकी : जिस स्थान पर बहन नानकी का घर था, उस स्थान पर उनकी याद में इस गुरुद्वारे का निर्माण किया गया है, जिसका कुछ वर्ष पूर्व पुनरुद्धार भी किया गया। बेबे नानकी की याद में ही 1970 में एक अन्य गुरुद्वारा हट्ट साहिब के निकट भी स्थापित किया गया है।
गुरुद्वारा सेहरा साहिब : गुरु का बाग के निकट एक अन्य ऐतिहासिक गुरुद्वारा है, जहां पांचवें गुरु अर्जुन देव की विवाह के अवसर पर सेहराबंदी हुई थी। बीबी भाणी के गांव डल्ला की ओर जाते समय बारात इस स्थान पर रुकी थी। यह स्थान भी संगत की आस्था का केंद्र है।


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