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साख पर आंच

Posted On November - 7 - 2019

कानून के रखवालों का अशोभनीय व्यवहार

दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट परिसर में पार्किंग के मामूली विवाद के बाद वकीलों और पुलिसकर्मियों के बीच जो टकराव पैदा हुआ, उसने इन दोनों ही पक्षों की साख पर बट्टा लगाया है। कानून की रक्षा करने वाले और कानून की व्याख्या करके न्याय की राह प्रशस्त करने वाले यदि हिंसा व आगजनी में लिप्त होंगे, तो कानून व्यवस्था का हश्र बुरा ही होगा। नि:संदेह इस घटनाक्रम से देश-दुनिया में इनकी छवि धूमिल ही हुई है। गाहे-बगाहे पुलिस के आचरण पर सवाल उठाये जाते रहे हैं। माना इस प्रकरण में उसकी किसी सीमा तक गलती भी रही होगी, मगर उसका प्रतिकार यह घटनाक्रम तो नहीं हो सकता। इसके बाद वकीलों का कामकाज ठप्प करना और पुलिसकर्मियों द्वारा पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन करके अनुशासित संगठन की साख को आंच पहुंचाना भी तार्किक नहीं कहा जा सकता है। यह भी उचित नहीं कहा जा सकता है कि वकील एकजुट होकर पुलिस कर्मियों से मारपीट करें। इससे जहां पुलिसबल का मनोबल गिरेगा, वहीं अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे। फिर यदि अराजक समूहों द्वारा पुलिस को निशाना बनाया जाता है तो समाज में कानून-व्यवस्था को पलीता लगते देर नहीं लगेगी। जहां वकील समुदाय को अपनी जिम्मेदारी का अहसास अच्छे से होना चाहिए वहीं पुलिस भी एक अनुशासित संगठन की तरह बर्ताव करे। नि:संदेह दोषी जो भी हो, उसे कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। आमतौर पर देखा जाता है कि ऐसे मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ तो निलंबन-तबादले जैसी कार्रवाई हो जाती है, मगर किसी वकील को ऐसे मामले में सज़ा हुई हो, जान नहीं पड़ता। ऐसे में बार एसोसिएशन व वकीलों की प्रतिनिधि संस्थाएं दोषी सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई करें। नि:संदेह, समय रहते यदि इस टकराव को टालने कोशिश की जाती तो स्थिति इतनी विस्फोटक नहीं होती।
जाहिर है इस घटनाक्रम की प्रतिक्रिया में पुलिसकर्मी भी आंदोलन पर उतारू हुए। ऐसे कम ही देखा गया है कि पुलिसकर्मी अपनी शिकायत दर्ज कराने सड़क पर उतरे हों। कानून-व्यवस्था व अनुशासन के नजरिये से यह घटनाक्रम अप्रिय ही है। जाहिर तौर पर आक्रोश इतना अधिक था कि उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों तक की अनसुनी कर दी। बेहतर होता कि पुलिसकर्मी अपनी शिकायत दर्ज कराकर आंदोलन का रास्ता अपनाए बिना काम पर लौट जाते। कानून व्यवस्था के रखवालों का अनुशासन तोड़कर यूं सड़क पर उतरना देश की छवि के नजरिये से अच्छा नहीं कहा जा सकता। किसी भी पक्ष को ऐसे मामलों में अतिरंजित व्यवहार से परहेज करना चाहिए। उनकी समाज में बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि जहां उन्हें कुछ विशेष अधिकार मिले हैं तो उसी हिसाब से उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। किसी भी पक्ष को अपनी बात कानून के दायरे में रखकर ही करनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो टकराव की नौबत ही नहीं आ सकती। नि:संदेह इस घटनाक्रम में वकीलों द्वारा तोड़फोड़ और आगजनी करना तथा पुलिसकर्मियों के पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन पर बैठना कानून के रखवालों जैसा व्यवहार नहीं है। अब जब इस मामले में एक-दूसरे के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और हाईकोर्ट ने मामले में न्यायिक जांच के आदेश दे दिये हैं तो फिर दोनों पक्षों को संयम से काम लेना चाहिए, जैसा कि एक आम नागरिक से उम्मीद की जाती है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने भी दोषियों को चिन्हित करने को कहा है, ताकि इस पेशे की छवि धूमिल न हो। नि:संदेह विवाद को प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाने के बजाय समझदारी से काम लेते हुए टकराव को टालने का प्रयास किया जाना चाहिए। दोनों पक्षों को भलीभांति इस बात का अहसास होना चाहिए कि कानून व्यवस्था की बेहतर छवि बनाये रखने के लिए पुलिस व वकीलों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध बने रहने चाहिए।


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