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सांसों पर काला साया

Posted On November - 4 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
सर्दियों की आहट के साथ उत्तर भारत में जहरीली धुंध लौट आई है। दिल्ली-एनसीआर में तो हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। एयर क्वॉलिटी इंडेक्स (एक्यूआई) के पैमाने पर इस इलाके के शहरों (दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम) में हवा की सेहत सबसे खराब आंकड़े यानी 500 के करीब पहुंच गई है। सेहत के लिए साफ हवा के मानक में किसी स्थान का एक्यूआई शून्य से 50 के बीच ही अच्छा माना जाता है, जबकि एक्यूआई का 500 तक पहुंचना अति गंभीर और आपातकालीन अवस्था को दर्शाता है। शायद यही वजह रही कि सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिल्ली-एनसीआर के लिए गठित एनवायरनमेंटल पॉल्यूशन (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल) अथॉरिटी (ईपीसीए) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की सिफारिश पर इस इलाके में पब्लिक हेल्थ एमरजेंसी घोषित करते हुए 5 नवंबर तक सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। इसके अलावा, सर्दियों का मौसम खत्म होने तक आतिशबाजी भी बैन कर दी है, यानी लोग छठ, क्रिसमस, नये साल आदि के मौकों पर पटाखे नहीं चला सकेंगे। दिल्ली सरकार ने अपने स्कूलों में 5 नवंबर तक छुट्टी कर दी, जिससे बच्चे घर से बाहर आकर जहरीली हवा की चपेट में आने से बच सकें। साथ ही, दिल्ली सरकार ने हवा में घुले जहर के लिए पड़ोसी राज्यों (हरियाणा और पंजाब) में कृषि अवशेष यानी पराली जलाए जाने की परंपरा पर दोष मढ़ते हुए ऐलान कर दिया कि 4 नवंबर से 15 दिनों के लिए (रविवार को छोड़कर) दिल्ली में वाहनों के प्रवेश की सम-विषम (ईवन-ऑड) योजना लागू रहेगी। वर्ष 2016 के बाद यह तीसरा मौका है, जब दिल्ली-एनसीआर में ईवन-ऑड योजना लागू की जा रही है। सरकार का दावा था कि 2016 में इस उपाय से 20 से 25 फीसदी प्रदूषण कम हुआ था।
सम-विषम की इस योजना के तहत सुबह 8 से शाम 8 बजे तक सम तारीखों वाले दिन सम संख्या वाली गाड़ियों को और विषम तारीखों वाले दिन विषम संख्या वाली गाड़ियों की एंट्री की छूट रहेगी। इस बार पहले की तरह सीएनजी से चलने वाली गाड़ियों को इस नियम से छूट नहीं मिलेगी और न ही दूसरे राज्यों से आने वाले वाहन
ऐसी छूट पा सकेंगे। हालांकि, महिला कार चालकों, स्कूली बच्चों वाली गाड़ियों और दोपहिया वाहनों को इस नियम से बाहर रखा गया है, लेकिन बाकियों के लिए नियम तोड़ने पर जुर्माने की राशि पहले के मुकाबले दोगुना यानी 4 हजार रुपये तक दी गई है। ये सारे इंतजाम तब किए गए हैं, जब दिल्ली सरकार की ओर से बड़े जोरशोर से यह दावा किया गया है कि इस बार उसके द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियानों की बदौलत कम पटाखे जलाए गए और दिवाली के अगले दिन बीते तीन वर्षों की तुलना में काफी कम वायु प्रदूषण हुआ। लेकिन दिवाली के चंद रोज बाद ही पूरे दिल्ली-एनसीआर का आसमान विष भरी धुंध में लिपटा नजर आने लगा और आम लोगों के साथ-साथ दिल्ली सरकार की ‘सांसें’ भी ये हालात देखकर बेकाबू हो गईं। सवाल यह है कि जब दिवाली अपेक्षाकृत कम प्रदूषण के साथ निपट गई, कारों की बिक्री में गिरावट के आंकड़े ऑटोमोबाइल कंपनियां लगातार जारी कर रही हैं, हवा के हालात सुधारने के लिए प्रदूषणकारी उद्योगों को बाहर किया जा रहा है, तो ऐसी नौबत क्यों पैदा हो गई कि भारत में टूर्नामेंट खेलने आई बांग्लादेश क्रिकेट टीम को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चेहरे पर मास्क लगाकर प्रैक्टिस करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
हवा के बिगड़ते हालात पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का बयान है कि पड़ोसी राज्यों (हरियाणा-पंजाब) में पराली जलाने की वजह से दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो गई है। उधर, ईपीसीए के अध्यक्ष भूरेलाल का मत है कि यह स्थिति दिवाली की रात जलाए गए पटाखों, पराली के धुएं और मौसमी परिस्थितियों के कारण बनी है। भूरेलाल ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता की खराब स्थिति पर चिंता व्यक्त की है, जिससे इसका अंदाज़ा तो हो जाता है कि स्थिति कितनी विकट है। ध्यान रहे कि ये सारे कारक अरसे से मौजूद रहे हैं, लेकिन हवा की जितनी खराब हालत बीते कुछ वर्षों में हुई है, पहले वैसी स्थिति नहीं बनती थी। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इसके लिए अंततः जिम्मेदार किसे मानें। अगर एक-एक करके सभी कारकों की चर्चा करें तो पहला आरोप सर्दियों के साथ आने वाले दीप-पर्व पर की जाने वाली आतिशबाजी पर आता है।
पटाखे खलनायक पर बैन नहीं कर सकते
दिवाली के दौरान दिल्ली-एनसीआर से बाहर जाने और दिवाली के बाद यहां लौटने वाले अक्सर इसका अनुभव करते हैं कि यहां का आसमान अचानक जहरीली धुंध से भरा नजर आता है। आतिशबाजी को एक अहम कारण मानते हुए सुप्रीमकोर्ट की चिंताओं के मद्देनजर पटाखे जलाने पर कई तरह के प्रतिबंध पिछले वर्षों में लगाए गए हैं। पटाखे जलाने का समय निश्चित किया गया है तो इन्हें बेचे जाने पर भी कई पाबंदियां लगी हैं। लेकिन अनुभव बताता है कि दिवाली के रोज पटाखेबाजी होकर रहती है। साफ है कि पटाखे चोरी-छिपे बिकते हैं और सीना चौड़ाकर लोग इन्हें जलाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पटाखे अकेले ही हवा में घुलते जहर के लिए जिम्मेदार हैं। इस बारे में एक रोचक बहस इसी साल (मार्च, 2019 में) सुप्रीमकोर्ट में हुई थी। जस्टिस एसए बोबड़े और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच ने यह मुद्दा उठने पर केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल एएनएस नाडकर्णी से जानना चाहा था कि ‘क्या पटाखों से होने वाले प्रदूषण और ऑटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण के बारे में कोई तुलनात्मक अध्ययन किया गया है? उन्होंने टिप्पणी की थी कि ऐसा लगता है कि आप पटाखों के पीछे भाग रहे हैं, जबकि प्रदूषण में इससे कहीं अधिक योगदान शायद वाहनों का होता है। अदालत ने कहा था कि वह पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर बेरोजगारी नहीं बढ़ाना चाहती। बेंच ने कोई भी पेशा अपनाने और कारोबार की छूट देने वाले अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए यह सवाल भी किया था कि अगर यह कारोबार वैध है और लोगों के पास इसका लाइसेंस है तो पटाखों के निर्माण पर पाबंदी कैसे लगाई जा सकती है? आप लोगों को कैसे बेरोजगार कर सकते हैं? हालांकि अदालत ने सिर्फ ग्रीन (हरित) पटाखों के निर्माण और बिक्री की छूट दी थी और वर्ष 2018 में एक फैसले में तय किया था कि दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में दिवाली व अन्य त्योहारों पर शाम 8 से 10 बजे के बीच पटाखे चलाए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रीन पटाखों में आवाज कम होती है और हानिकारक रसायनों की मात्रा भी कम होती है। गौरतलब यह भी है कि इस मामले के याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोपाल शंकरनाराण्यान ने वायु और ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि दिल्ली-एनसीआर में वार्षिक प्रदूषण का 2.5 फीसदी त्योहारों के दौरान कुछ दिन पटाखे चलाने की वजह से होता है।
पराली की परेशानी : पड़ोसियों पर आरोप, उपाय नहीं
अगर पटाखे पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं तो क्या जो तोहमत दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पड़ोसी राज्यों के किसानों पर पराली जलाने के लिए लगा रहे हैं, वह सही है? इस पर पहली आपत्ति केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की ओर से आई है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति के लिए हरियाणा और पंजाब को दोष देने की बजाय अगर आपस में मिलकर समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश की जाती तो संभव है कि हालात बेहतर होते। कोई शक नहीं कि हरियाणा-पंजाब के किसान फसल कटाई के बाद खेतों में शेष रह गई पराली को नष्ट करने का सबसे आसान तरीका उसमें आग लगाना ही समझते हैं। उनके पास इसे जलाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि वे इसे खेतों से हटाने के लिए महंगी मशीनें नहीं खरीद सकते। किसानों के सामने पराली को जलाने की मजबूरी होती है, क्योंकि कंबाइन हार्वेस्टर से फसल काटे जाने के बाद जो हिस्सा बचता है, वह जानवरों के चारे के रूप में इस्तेमाल लायक नहीं होता। ऐसी स्थिति में अगर पराली न जलाई जाए तो वह गेहूं की फसल बोने वाली मशीनों में फंस जाती है। लेकिन पराली से सिर्फ धुआं ही नहीं उठता, बल्कि उसके धुएं में पार्टिकुलेट मैटर, कार्बन-डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन-डाइऑक्साइड और सल्फर-डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें भी शामिल होती हैं, जिनसे हवा आपातकालीन स्थिति में पहुंच जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता वर्ष 2012 से 2016 के बीच किए गए अपने अध्ययन के नतीजे में बता चुके हैं कि इस अवधि में दिल्ली में करीब आधे वायु प्रदूषण की वजह पराली को जलाना था। इसी तरह एक अन्य अध्ययन में पता चला था कि वर्ष 2011 में 40 हजार अकाल मौतों के पीछे असली वजह पराली जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण था। हालांकि, किसान सिर्फ मशीनों के महंगे होने के कारण पराली जलाने को मजबूर नहीं हुआ है, बल्कि इसके कई और कारण हैं। जैसे एक वजह यह बताई जाती है कि इसमें पंजाब सरकार के एक फैसले से हुए बड़े बदलाव भी भूमिका है। असल में पहले इस राज्य के किसान सितंबर माह के अंत और अक्तूबर की शुरुआत में ही पराली जलाते थे। इस अवधि में मॉनसून के असर से हवाएं दिल्ली से पंजाब या हरियाणा की ओर चलती हैं। लेकिन पंजाब सरकार ने वर्ष 2009 में पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर एक्ट पारित किया, जिसके कारण पंजाब के किसान धान की बुवाई अप्रैल में करने की बजाय जून में करने को मजबूर हो गए, जिस वक्त मॉनसून की आमद होती है और खेतों की सिंचाई ट्यूबवेल की बजाय मॉनसूनी बारिश से होती है। इसका असर यह हुआ कि धान (चावल) की फसल जब 120 दिन बाद पककर तैयार होती है, तो उसकी कटाई के बाद खेतों में पराली अक्तूबर के मध्य में बचती है, जिसे किसान जलाते हैं। मॉनसून अवधि के बाद अक्तूबर में हवाओं का रुख दिल्ली की ओर हो जाता है, जिससे जलती पराली का धुंआ देश की राजधानी में जा पहुंचता है। इधर, चूंकि हरित क्रांति के प्रभाव से पंजाब-हरियाणा आदि राज्यों में गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ा है, जिससे कृषि अवशेषों की मात्रा में भी इजाफा हुआ है। लेकिन इससे निपटने की समुचित व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है। इसके अलावा, पराली के खात्मे के इंतजाम काफी महंगे भी हैं।
वाहन पॉलिसी जरूरी, ऑड-ईवन से नहीं चलेगा काम
दिवाली के दौरान दिल्ली-एनसीआर से बाहर जाने और दिवाली के बाद यहां लौटने वाले अकसर इसका अनुभव करते हैं कि यहां का आसमान अचानक जहरीले धुंध से भरा नजर आता है। आतिशबाजी को एक अहम कारण मानते हुए सुप्रीमकोर्ट ने पटाखे जलाने पर कई तरह के प्रतिबंध पिछले वर्षों में लगाए गए हैं। पटाखे जलाने का समय निश्चित किया गया है तो इन्हें बेचे जाने पर भी कई पाबंदियां लगी हैं। लेकिन अनुभव बताता है कि दिवाली के रोज पटाखेबाजी होकर रहती है। साफ है कि पटाखे चोरी-छिपे बिकते हैं और सीना चौड़ाकर लोग इन्हें जलाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पटाखे अकेले ही हवा में घुलते जहर के लिए जिम्मेदार हैं। इस बारे में एक रोचक बहस इसी साल (मार्च, 2019 में) सुप्रीमकोर्ट में हुई थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसा लगता है कि आप पटाखों के पीछे भाग रहे हैं, जबकि प्रदूषण में इससे कहीं अधिक योगदान शायद वाहनों का होता है। अदालत ने कहा था कि वह पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर बेरोजगारी नहीं बढ़ाना चाहती। बेंच ने कोई भी पेशा अपनाने और कारोबार की छूट देने वाले अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए यह सवाल भी किया था कि अगर यह कारोबार वैध है और लोगों के पास इसका लाइसेंस है तो पटाखों के निर्माण पर पाबंदी कैसे लगाई जा सकती है? आप लोगों को कैसे बेरोजगार कर सकते हैं? हालांकि अदालत ने सिर्फ ग्रीन (हरित) पटाखों के निर्माण और बिक्री की छूट दी थी और वर्ष 2018 में एक फैसले में तय किया था कि दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में दिवाली व अन्य त्योहारों पर शाम 8 से 10 बजे के बीच पटाखे चलाए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रीन पटाखों में आवाज कम होती है और हानिकारक रसायनों की मात्रा भी कम होती है। गौरतलब यह भी है कि इस मामले के याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोपाल शंकरनाराण्यान ने वायु और ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि दिल्ली-एनसीआर में वार्षिक प्रदूषण का 2.5 फीसदी त्योहारों के दौरान कुछ दिन पटाखे चलाने की वजह से होता है।
एक्यूआई 360 तो समझो हर व्यक्ति रोजाना पी रहा 20 से 25 सिगरेट
अगर किसी इलाके में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 360 के ऊपर चला गया है तो इसका अर्थ यह है कि वहां रहने वाला व्यक्ति 20 से 25 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों में पहुंचा रहा है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दिल्ली-एनसीआर में हर व्यक्ति बिना सिगरेट पिए भी स्मोकर है। एयर क्वालिटी इंडेक्स 0-50 के बीच है तो इसे अच्छा माना जाता है। यह 51-100 के बीच में है, तो संतोषजनक, 101-200 के बीच में औसत, 201-300 के बीच में खराब, 301-400 के बीच में हो तो बहुत खराब और 401 से 500 के बीच होने इसे बेहद गंभीर माना जाता है। इसके आधार पर इलाके में पब्लिक हेल्थ एमरजेंसी घोषित की जाती है। इन स्थितियों में खराब हवा में सांस लेने से आंखों, नाक व गले में जलन, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों में जमाव और इन कारणों से बुखार जैसी बीमारियां हो जाती हैं, जो लोगों की अकाल मृत्यु का कारण भी बन सकती हैं। पड़ोसी देश चीन में 2012 में ऐसी ही स्थितियों में पब्लिक हेल्थ एमरजेंसी लगाई गई थी, लेकिन चीन ने उससे सबक लिया और आज वहां की हवा दिल्ली के मुकाबले साफ है। मेडिकल जर्नल- द लांसेट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण से दक्षिण पूर्व एशिया में वर्ष 2015 में 32 लाख मौतें हुईं। दुनिया के स्तर पर करीब 90 लाख मौतें हुईं। इनमें से 28 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में हुई हैं। यह अध्ययन कहता है कि 2015 में दिल्ली के हर 10 में से 4 बच्चे ‘फेफड़े की समस्याओं’ से पीड़ित हैं और इसकी वजह वायु प्रदूषण है।


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