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समतामूलक समाज में उन्नत आध्यात्मिक ज्ञान

Posted On November - 6 - 2019

गुरु नानक के बाद नौ और गुरु हुए थे, जिन्होंने सिख समुदाय को आध्यात्मिक एवं राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया था। पांचवें गुरु अर्जन (जीवनकाल : 1563-1606, गुरु रहे ः 1581-1606) ने सिखों की पवित्र पुस्तक ‘आदि ग्रंथ’ का संकलन करवाया था, जिसे आगे चलकर दसवें गुरु गोबिंद सिंह के निर्देश पर ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ का सम्मान दिया गया था। जब गुरु अर्जन ‘आदि ग्रंथ’ का संकलन कर रहे थे तब इस समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में बात फैल गई थी कि सभी मुख्य धर्मों के पवित्र लेखों का संकलन किया जा रहा है। अनेक संतों और आध्यात्मिक पुरुषों की वाणी उन तक पहुंचाई गई ताकि विचार उपरांत इसे ग्रंथ में सम्मिलित किया जा सके। प्रस्तुत वाणी की आध्यात्मिक महत्ता और तत्वज्ञान का मूल्यांकन करके गुरु अर्जन ने इन्हें ‘आदि ग्रंथ’ में सम्मान सहित जगह दी है, इनमें 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच हुए अनेक हिंदू भक्तों और मुस्लिम सूफी-संतों की वाणी दर्ज की गई है, जो गुरुजी के अपने विचारों से मेल खाती थी यानी इनसान को जातिवाद और लिंगभेद से इतर समतामूलक एवं सार्वभौमिक नजरिया रखना चाहिए। पांच गुरुओं, अनेक भक्तों और सूफी-संतों की वाणी को संकलित करने वाले इस विशाल काम को पूरा करने में गुरु अर्जन ने अनेकवाद के लिए लासानी प्रतिबद्धता दिखाने के साथ-साथ विचारों की एकात्मकता भी बनाए रखी है।

प्रीतम सिंह

गुरुजी के इस संकलन में गुरु नानक द्वारा अपने जीवनकाल में एकत्र की गई सामग्री भी शामिल है, जो उनकी यात्राओं के दौरान तत्कालीन समाज में फैली अनेकानेक आध्यात्मिक और सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित करने वाले उपदेशों का संग्रह था। इस तरह ‘आदि ग्रंथ’ में सबसे ज्यादा भजन गुरु अर्जन द्वारा रचित (2,218) हैं, इसके बाद गुरु नानक देव के 974 भजनों का स्थान आता है। गुरु ग्रंथ साहिब 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 17वीं सदी के शुरुआती वर्षों में भारत में पनपे उन्नत आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक दृष्टिकोण वाले विचारों का महाकोश है। आगे चलकर दसवें गुरु गोबिंद सिंह (जीवनकाल 1666-1708, गुरु रहे : 1675-1708) ने अपने पिता और नौवें गुरु तेग बहादुर कृत 115 श्लोक (जीवनकाल : 1621-1675, गुरु रहे : 1664-1675) जोड़े थे और एक अपनी रचना भी (‘बल हुआ बंधन छूटे’) शामिल की थी।
सिख समुदाय के उद‍्भव में गुरु अर्जन जी का जो एक और ऐतिहासिक योगदान था, वह है अमृतसर में हरमंदिर साहिब का निर्माण (गोल्डन टैम्पल)। अनेकवाद को वास्तव में दर्शाने और सिख धर्म की मूल भावना यानी समतावाद और पूरी दुनिया के लोग एक ही ज्योत के स्वरूप हैं, इसको अमल में लाकर गुरु अर्जन ने हरमंदिर साहिब की नींव पूज्य मुस्लिम सूफी संत मियां मीर के करकमलों से रखवाई थी। उन्होंने इस परिसर के लिए चारों दिशाओं में एक-एक प्रवेश द्वार रखा जोकि समाज के चारों वर्णों के बेरोकटोक दाखिले का प्रतीक है, क्योंकि उस वक्त का हिंदू समाज अपनी प्रचलित व्यवस्था के अनुसार आपस में बेतरह वर्णभेद में बंटा हुआ था और निचले वर्णों को धार्मिक स्थलों में घुसने की मनाही थी। दुनियाभर के सभी धर्मों के इतिहास में केवल एकमात्र यही उदाहरण है जब किसी धर्म के सबसे पूजनीय स्थल की नींव किसी अन्य धर्म की पूज्य हस्ती ने रखी हो।
गुरु गोबिंद सिंह ने सिख समुदाय को तीन मुख्य निर्णय सुनाए थे, पहला : उनके बाद कोई अन्य जीवित गुरु नहीं होगा, दूसरा : आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए पवित्र पुस्तक ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को जीवित गुरु की तरह माना जाएगा। तीसरा : सिख समुदाय से संबंधित राजनीतिक एवं लौकिक मुद्दों पर पहले की तरह ही उस तरीके से निर्णय लेने की शक्ति बरकरार रहेगी, जिसके अंतर्गत उपस्थित लोगों के बीच सर्वसम्मति से निर्णय लिए जाते हैं। वर्ष 1708 में गुरु गोबिंद सिंह के अवसान के बाद पूरी 18वीं सदी के दौरान सिख समुदाय अपने जिस्मानी-नैतिक वजूद-पहचान को बचाने के लिए आग से गुजरा था, जब दिल्ली से निजाम चलाने वाले मुगल बादशाहों ने इनकी नस्लकुशी के लिए अंतहीन जुल्मो-सितम की झड़ी लगा दी थी। इस काल के दौरान दो बार बड़े नरसंहार (घल्लूघारे) झेलने पड़े थे। पहला मई, 1746 को हुआ जब एक ही दिन लगभग 10,000 सिख स्त्री-पुरुष मारे गए थे और दूसरा फरवरी, 1762 को बरपा था, जिसमें लगभग 30,000 सिखों का कत्लेआम किया गया था। लेकिन सिख हर बार की तरह मानो अपनी राख से उठ खड़े होते और विजयी रहे। अपने गुरुओं की सिखायी नैतिकता से प्रेरित होकर अंततः वे पंजाब के शासक बने, जब एक सिख राजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर कब्जा कर लिया था और पंजाब का पहला एवं एकमात्र सिख महाराजा होने का गौरव प्राप्त किया था। वर्ष 1849 में ब्रिटिश कब्जे के अंतर्गत जाने से पहले पंजाब 50 सालों तक (1799-1849) एक स्वतंत्र और सार्वभौमिक राष्ट्र रहा था, लेकिन इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य में विलय के बाद औपनिवेशिक राज के दौरान शेष भारत का हिस्सा रहा था। 1947 में देश के बंटवारे के चलते पश्चिम पंजाब में किसी तरह बच गए सिखों को बड़े पैमाने पर हिजरत करके भारत आना पड़ा था। 1947 के बाद वाले वर्षों में सिखों ने भारत गणराज्य के अंतर्गत पंजाबी भाषी राज्य की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी।
भले ही गुरु नानक की शिक्षाओं से प्रभावित होकर पंजाब की भौगोलिक सीमाओं से काफी दूरदराज में भी लोग उनके अनुयायी बन गए थे, लेकिन यह पंजाब ही है, जहां गुरुजी की शिक्षाएं गहरे तक जड़ पकड़ चुकी हैं। उनके सिख अनुयायी आज भी ज्यादातर पूर्वी पंजाब में केंद्रित हैं। वजह है कि गुरु नानक ने अपनी सीख हेतु वार्तालाप का माध्यम पंजाबी रखा था, हालांकि, दुनिया के मुख्य धर्मों के इतिहास में देखने को मिला है कि कुछ धर्म अपने जन्मस्थल से इतर दूरस्थ इलाकों में ज्यादा मकबूल हुए हैं, इसका जाहिर तौर पर उदाहरण बौद्ध धर्म है।
बेशक आज की तारीख में सिख दुनियाभर में फैले हैं, फिर भी भारतीय पंजाब उनका मुख्य वास है। विश्व की आबादी में सिखों की गिनती महज 0.3 फीसदी है, इनमें भी 90.2 फीसदी भारत में बसते हैं और भारत में सिखों की गिनती कुल जनसंख्या का 1.72 प्रतिशत है। इनमें 76.8 फीसदी भारतीय पंजाब में रहते हैं, जिनकी संख्या वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की आबादी में 57.7 फीसदी है। पंजाब में सिखों को बहुसंख्यक का दर्जा मिलना अपेक्षाकृत नयी घटना है, क्योंकि 1 नवंबर, 1966 को भाषा के आधार पर हुए पंजाब के प्रादेशिक पुनर्गठन के बाद ही सिख इस सूबे में बहुसंख्यक संप्रदाय का दर्जा हासिल कर पाए हैं।
गुरु नानक का धार्मिक प्रभाव पंजाबी और गैर-पंजाबी सिखों से लेकर सिंधी समुदाय पर भी है और यहां तक कि पूर्वी और पश्चिमी पंजाब में अनेकानेक हिंदू, मुसलमान और ईसाई भी उनसे प्रभावित हैं।

लेखक वुल्फसन कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड में विजिटिंग फैलो हैं।


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