एकदा !    जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग खुला !    वैले पार्किंग से वाहन चोरी होने पर होटल जिम्मेदार !    दिल्ली फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, 32 गिरफ्तार !    हाईवे फास्टैग टोल के लिये अधिकारी तैनात होंगे !    अखनूर में आईईडी ब्लास्ट में जवान शहीद !    बीरेंद्र सिंह का राज्यसभा से इस्तीफा !    बदरीनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद !    केटी पेरी, लिपा का शानदार प्रदर्शन !    निर्भया मामला दूसरे जज को भेजने की मांग स्वीकार !    

समझदारी का फैसला

Posted On November - 6 - 2019

कृषि व उद्योग के हित में पहल
जब देश आर्थिक सुस्ती के दौर में है, सरकार ने आरसीईपी से किनारा करके नये तरह के आर्थिक साम्राज्यवाद से भारत को बचाया है। इसके क्रियान्वयन से बाजार में संपन्न देशों के वर्चस्व का मार्ग ही प्रशस्त होता है। विकासशील देश कई तरह के कुचक्रों में फंसे रहे हैं, जिसमें सीमित जोत में बड़ी आबादी का निर्भर होना, जिसके चलते बड़ी लागत की खेती के कारण किसान अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में कहीं नहीं ठहरते हैं। कमोबेश यही स्थिति कारोबारियों की भी हैं, जो श्रम प्रधान आर्थिकी के चलते आक्रामक बाजार नीतियों का मुकाबला करने में उन्नीस रहते हैं। नि:संदेह किसी भी अर्थव्यवस्था में कृषि व उद्योगों को वैश्विक मुकाबले के अनुरूप विकसित होना जरूरी है। मगर, भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में जीविकोपार्जन का मुद्दा पहले है। ऐसे में यदि भारत सेवाओं में संतुलन बनाये बिना बड़ी आर्थिक ताकतों के लिए अपने बाजार खोलता तो देश में यह कदम सामाजिक असंतोष का वाहक बनता। ऐसे में बैंकाक में आसियान व सहयोगी देशों के सम्मेलन में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी यानी आरसीपी समझौते से भारत का अलग रहना देश के व्यापक हितों में है। यह देश के छोटे कारोबारियों व किसानों के हित में उठाया गया कदम कहा जा सकता है। इस सम्मेलन से पहले किसान व सामाजिक संगठनों की सक्रियता को देखकर केंद्र सरकार ने इसके दूरगामी प्रभावों का आकलन करके ही यह फैसला लिया है। यह जनमत का सम्मान भी है। यदि भारत इसमें भागीदारी करता तो आसियान देशों व बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन, आस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता बन सकता था। वह भी ऐसे दौर में जब पूरी दुनिया फिर से संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था की ओर लौट रही है।
दरअसल, भारत की मांग  थी कि समझौते में भारतीय सेवाओं व निवेश के लिये भी बाजार खोला जाये। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। वास्तव में व्यापार युद्ध के चलते अमेरिका ने चीन पर जो बंदिशें लगायी थीं, उसके चलते अपने आर्थिक वर्चस्व को बचाये रखने के लिये चीन नये बाजार तलाश रहा है। इस समझौते के जरिये सदस्य व सहयोगी देशों के बाजार में उसका एकछत्र राज्य कायम हो जाता। पहले से ही आर्थिक मंदी से जूझ रहे छोटे भारतीय उद्योगों तथा ग्लोबल वार्मिंग से त्रस्त भारतीय कृषि के लिये आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड के खाद्यान्न व डेयरी उत्पाद बड़ा संकट पैदा कर सकते थे। कमोबेश ऐसा ही संकट डेयरी उद्योग के लिये भी खड़ा हो सकता था, अमूल डेयरी ने भी ऐसी चिंताएं जाहिर की थी। सरकार ने परिपक्व सोच का परिचय देते हुए अपने किसानों व उद्यमियों के हितों को तरजीह दी। दरअसल, इस समझौते के बाद अस्सी से लेकर नब्बे फीसदी उत्पादों पर आयात कर समाप्त हो जाता। इसके क्रियान्वयन के बाद जहां भारतीय बाजार चीनी उत्पादों से पाट दिये जाते, वहीं आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड के खाद्यान्न भारतीय कृषि की कमर तोड़ने वाले साबित हो सकते थे। दरअसल, इन देशों में व्यावसायिक खेती के सामने भारतीय परंपरागत कृषि का टिक पाना मुश्किल हो जाता। यही वजह है कि भारतीय किसान संगठन कृषि व डेयरी उत्पादों को समझौते से बाहर रखने की मांग पर अड़े हुए थे। जब भारत के मुख्य कारोबारी सहयोगी चीन के साथ पहले व्यापार असंतुलन चरम पर है तो आरसीईपी के लागू होने के बाद तो स्थिति विस्फोटक हो सकती थी। इन बड़े देशों से हमारे आयात ज्यादा हैं और निर्यात कम हैं जो हमारे आर्थिक स्वावलंबन के लिए घातक हो सकता था। नि:संदेह इससे जहां मेक इन इंडिया की अवधारणा ध्वस्त होती, वहीं किसानों की आय दोगुनी करने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना बेमानी हो जाती। ऐसे में मोदी सरकार का आरसीईपी से अलग रहना वक्त की मांग के अनुरूप लिया गया फैसला है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था व कृषि के हित में ही है।


Comments Off on समझदारी का फैसला
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.