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सपना सच होना

Posted On November - 11 - 2019

आस्था के सैलाब में मिटी दूरियां
राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े फैसले के चलते मीडिया में करतारपुर गलियारे के खुलने का घटनाक्रम भले ही ज्यादा नजर न आया हो, मगर यह एक बड़ी घटना थी जो भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। आज़ादी के बाद से ही करतारपुर साहिब के दीदार का सपना संजोयी आंखों में यह सपना सच होने जैसा था। भारतीय सिख श्रद्धालुओं के लिए बाबा नानक का दर करीब आने जैसा है। सीमाओं के दोनों तरफ बड़े उत्सव का माहौल रहा। जहां दो देशों की सीमा के मायने कुछ देर के लिए बदल गये, वहीं राजनीतिक वर्जनाएं कुछ समय के लिए ही सही, दरकती नजर आईं। यह गलियारा ऐसे दौर में खुला जब भारत-पाक के रिश्ते सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। गलियारा खुलने के मौके पर पाक प्रधानमंत्री कश्मीर का मुद्दा उठाने से नहीं चूके। वहीं भारत में डेरा बाबा नानक में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कॉरिडोर के पैसेंजर टर्मिनल के उद्घाटन के मौके पर राजनीतिक मतभेद किनारे होते नजर आये। यदि पाक की नीति-नीयत संदेह से परे होती तो शायद इस घटनाक्रम से दोनों देशों के रिश्तोंं में एक नये युग की शुरुआत मानी जाती। विभिन्न राजनीतिक दलों, धार्मिक व सामाजिक संगठनों के लोगों व अन्य श्रद्धालुओं को 72 साल बाद गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के खुले दीदार करने का मौका मिला। यह एक भावविभोर करने वाला क्षण रहा। उम्रदराज लोग सपने को हकीकत बनते देख खासे उल्लास से भरे नजर आये।
पाकिस्तान की तरफ से भी बड़ी संख्या में विदेशों से आए सिख गुरु नानक जी के 550वें प्रकाशोत्सव पर आयोजित उत्सव के साक्षी बने। मगर, अभी भी पासपोर्ट की अनिवार्यता और बीस डॉलर का शुल्क आम श्रद्धालुओं के लिए एक टीस सरीखा है। नि:संदेह भारतीय श्रद्धालुओं के लिए सीमा पार कर मत्था टेककर वापस आने का रास्ता जरूर खुला है, लेकिन जरूरी है कि दोनों देशों के बीच शक-शुबेह का वातावरण भी बदले। एक तरफ जहां करतापुर गलियारे को सजाने-संवारने का दौर जारी था तो दूसरी तरफ पाक हुकमरानों की जुबानें फिसलती रहीं। विभाजन से सीमाओं के बंटने के साथ जो दिल बंटे थे, उन्हें जोड़ने के लिए करतापुर गलियारा जैसी पहल निश्चय ही मरहम का काम कर सकती थी, बशर्ते पाक ईमानदारी से पहल करता। बहरहाल, सिख श्रद्धालुओं के लिए जिस करतारपुर साहिब के दर्शन करना अब तक बेहद मुश्किल था, उस बाबा नानक का दर का उनके करीब आना आस्था का घनीभूत होने जैसा ही है। भारत से महज चार किलोमीटर की दूरी होने पर श्रद्धालुओं का दर्शन से वंचित होना विभाजन की विसंगति ही थी, जिसे वे अब तक दूरबीन से निहारकर दिल को सुकून देने का प्रयास करते रहे हैं। यह कदम इस बात का भी पर्याय है कि दोनों देश ईमानदारी से पहल करें तो जनता बदलाव की माध्यम बन सकती है। नि:संदेह युद्ध व टकराव मानवता के लिए अभिशाप ही हैं, और मेल-मिलाप से मानवता समृद्ध होती है।


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