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सऊदी अरब के साथ रिश्तों में बढ़ती नजदीकी

Posted On November - 7 - 2019

के.पी. नैयर
सऊदी अरब, जिसकी यात्रा पर हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी गए थे, उसके साथ हमारे रिश्तों में जितना कुछ दांव पर है, उतना कम ही अन्य देशों के मामले में होगा। भारत के विदेश विभाग में अन्य मुल्कों से हमारे संबंधों को शायद ही इतनी बेपरवाही वाले स्तर पर लिया जाता रहा है, जितना सऊदी अरब की सल्तनत की बाबत है।
जरा उस मंजर को याद कीजिए ः फरवरी, 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सऊदी अरब की यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, उन्होंने अप्रैल, 1982 में इंदिरा गांधी की सऊदी यात्रा के अंत में जारी किए गए साझे वक्तव्य की कॉपी देखने को तलब की थी। लेकिन विदेश मंत्रालय उस दस्तावेज को पेश नहीं कर पाया! तब साउथ ब्लॉक ने रियाद स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया, विश्वास करें या नहीं, वह भी इस ऐतिहासिक दस्तावेज की कॉपी प्रस्तुत नहीं कर पाया! संयोग से मनमोहन सिंह सटीक याद‍दाश्त के धनी हैं, लिहाजा उन्होंने आगामी यात्रा को लेकर बुलाई गई बैठक में अपनी इस सलाहियत के दम पर यहां तक बता दिया कि इंदिरा गांधी की सऊदी अरब की ऐतिहासिक यात्रा के अंत में जो दस्तावेज जारी किए गए थे, उनमें क्या-क्या लिखा था। 7 रेसकोर्स स्थित प्रधानमंत्री आवास में हुई इस बैठक में विदेश मंत्रालय के सऊदी अरब मामलों के जानकार चंद अधिकारियों के अलावा वहां मौजूद बाकियों की बोलती बंद ही रही क्योंकि उन्हें जरा भी इल्म नहीं था।
प्रधानमंत्री सिंह को उक्त साझे वक्तव्य की इबारत का इसलिए भी पता था क्योंकि वर्ष 1994 में बतौर वित्तमंत्री रहते उन्होंने अपनी सऊदी अरब की यात्रा से पहले तैयारी के दौरान इसकी कॉपी का अध्ययन किया था। वह यात्रा दो कारणों से यादगार रही थी, पहला, एक तरफ वित्तमंत्री मनमोहन सिंह की पहल पर भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू करने के प्रति तत्कालीन बाबूडम में उत्साह नदारद था। वहीं दूसरी ओर, खुद मनमोहन सिंह सऊदी अरब सल्तनत के साथ संबंधों में खुलापन लाने को बढ़ावा देने हेतु अत्यंत उत्साहित थे।
अब आते हैं 30 मार्च, 2015 के मंजर पर : इस दिन सऊदी अरब से संदेश आता है कि सुल्तान सलमान-बिन-अब्दुल्लाजीज अल-सउद, जो केवल दो महीनों के लिए राजा रहे थे, वे प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात करना चाहते हैं। आनन-फानन में किए गए बंदोबस्त के बाद किन बिंदुओं पर बात करनी है या हो सकती है, इसको लेकर तफ्सील से तैयारी की गई और बिंदु नोट किए गए। आखिरकार रात 9:30 बजे सुल्तान फोन लाइन पर आए (सामान्यतः यह वक्त एक ही टाइम-ज़ोन वाले दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच बातचीत के लिए नहीं होता है)। सुल्तान ने औपचारिक शुभकामनाओं के आदान-प्रदान में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। हालांकि, अरब देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें बहुत ज्यादा समय लगाते हैं। वे सीधे मुद्दे पर आ गए थे और जानना चाहते थे कि गद्दीनशीनी के बाद जो विश्व-संबंधी नजरिया उन्होंने तैयार किया है और जिसे ‘सलमान सिद्धांत’ का नाम दिया गया था, इस पर मोदी का क्या विचार है? क्या भारत इस सिद्धांत में साथ देगा, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति में अमेरिका की भूमिका को घटाने का संकल्प है? सुल्तान ने यह भी संकेत दिया कि हालांकि, ऐसा करने के लिए हिम्मत चाहिए लेकिन सऊदी अरब के साथ भारत के सहयोग को मजबूत करने हेतु यह काफी सहायक होगा।
उक्त ‘सलमान सिद्धांत’ के मुताबिक ‘गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल’ (जीसीसी) के देश अपनी सुरक्षा की जरूरतों को मुख्यतः खुद ही नियंत्रण करेंगे, हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि ऐसा होने से पहले खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा में अमेरिका को अपनी भूमिका निभाने से बरतरफ कर दिया जाएगा। हां, अमेरिका खाड़ी क्षेत्र और सऊदी सल्तनत के तेल आपूर्ति कुओं, सप्लाई लाइनों और तट से परे तेल निकासी-प्लेटफार्मों को जरूरी सुरक्षा पहले की तरह प्रदान करता रहेगा। सऊदी अरब से रिश्तों को लेकर भारतीय विदेश विभाग में रवैया कितना बेपरवाह रहा है, यह एक बार फिर से उस रात सिद्ध हो गया था जब प्रधानमंत्री कार्यालय ने मोदी को इस सिद्धांत को लेकर पहले से कोई तैयारी नहीं करवाई थी। हालांकि, दुनियाभर के देशों के सामरिक चिंतकों के बीच उस वक्त यह नजरिया चर्चा का विषय था। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री ने बहुत समझदारी तरीके से संवाद को अन्य महत्वपूर्ण विषय की ओर मोड़ दिया यानी यमन के गृह युद्ध में फंसे 4,000 भारतीयों को बाहर निकालने में सऊदी अरब की सहायता लेने पर।
किंग सलमान को सऊदी सुल्तान बने अभी छह दिन ही बीते थे, जब एस. जयशंकर भारत के विदेश सचिव नियुक्त हुए थे। तिस पर उन्हें खाड़ी मामलों का कोई अनुभव नहीं था। लेकिन इस बिंदु पर उन्हें दोनों स्थितियों का भान हो गया था कि कैसे हम सऊदी अरब की पेशकश को मौके पर नहीं भुना पाए। ठीक इसी वक्त भारतीय व्यवस्था में इस तरह के मौकों का लाभ तुरंत लेने में संस्थागत और मनोवैज्ञानिक पंगुता किस कदर व्याप्त है।
जल्द ही 1982 में जारी भारत-सऊदी अरब साझे वक्तव्य को ढूंढ़ा गया, इस बार अप्रैल, 2016 में होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की अगली सऊदी अरब यात्रा से एक साल पहले ही अच्छे से तैयारी की गई थी। सऊदी अरब उस वक्त भी राजगद्दी को लेकर चल रहे राजपरिवार के आंतरिक खींचतान के दौर से गुजर रहा था, कुछ अंतराल में ही युवराज का पद एक-के-बाद-एक तीन राजकुमार के पास रहा था। ऐसे में काफी उहापोह के बाद आखिर में जब भारत ने तीनों में अंतिम यानी मौजूदा युवराज मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअज़ीज अल-सउद, जो ‘एमबीएस’ के नाम से लोकप्रिय हैं, उनको भारत आने का न्योता दिया था, तब भी भारतीय प्रतिष्ठान के चंद हिस्से में इस आमंत्रण के पीछे ‘अक्लमंदी’ को लेकर कुछ संशय में थे।

के.पी. नैयर

आगे जब प्रधानमंत्री मोदी ने औपचारिक प्रोटोकॉल को दरकिनार रखते हुए दिल्ली हवाई अड्डे पहंुचकर युवराज की अगवानी की तब भी भारत की विदेश नीति में आचार-संहिता तय करने वालों में कुछ लोगों की भौहें उठी थीं। परंतु मोदी और जयशंकर ने अल-सउद के शाही परिवार से नये रिश्ते स्थापित करने की अपनी लीक कायम रखी थी। दक्षिण एशिया और अरब-खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा कायम रखने में सऊदी अरब एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो अब तक हमारी विदेश नीति में नजरअंदाज थी। जिस बात पर भारत में अधिकांशतः गौर नहीं किया जाता है कि अगर युवराज मोहम्मद (एमबीएस) और उनका सामाजिक सुधारवाद कार्यक्रम असफल हो जाता है तो जितने भी खाड़ी देश हैं, वहां भी सहिष्णुता बनाने और अपने-अपने समाज में कॉस्मोपॉलिटन शहरों सरीखा खुलापन लाने के प्रयासों को धक्का लगता। इसके अलावा तेल की कमाई से आई संपन्नता पर टिकी आर्थिकी को अन्य तरीकों से सुदृढ़ करने हेतु इसे बृहद-मुखी आय वाली बनाने की कोशिशें भी विफल होने की संभावना बन जाएगी।
यदि ‘एमबीएस’ असफल होते हैं तो अरब की खाड़ी से परे हमारे लिये भी गंभीर नतीजे हो सकते हैं। अगर सऊदी अरब फिर से उन्हीं रूढ़िवादिता और प्रतिगामी शक्तियों के फेर में पड़ जाता है, जिनकी वजह से 1990 के दशक से शुरू हुआ आतंकवाद आज वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है, तब भारत और इस उपमहाद्वीप के बाकी मुल्क भी इस खतरे के नतीजों से अछूते नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया सऊदी यात्रा और ‘एमबीएस’ को समर्थन इस सामरिक वास्तविकता के अहसास का प्रतिनिधित्व करती है।

लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।


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