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मुखौटे उतर गये

Posted On November - 10 - 2019

कहानी

कुसुम अग्रवाल

चित्रांकन : संदीप जोशी

ड्राइंग रूम में से लगातार हंसने की खिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं। आती भी क्यों न? इतनी चंचल और युवा नारियां जो मौजूद थीं वहां। आज नेहा के घर किटी पार्टी थी और उसने अपनी सभी सहेलियों को घर आने का न्योता दिया था। दोपहर के दो बजे का समय था। और इस समय उसकी सभी सहेलियां फुर्सत में होती थीं। इसलिए ठीक 2 बजते ही सभी हाजिर हो गई थीं और फिर फैशन शो के साथ साथ-साथ शुरू हो गया था गप्पों का सिलसिला। कुछ काम की परंतु अधिकतर बे-सिर पैर की बातें ही हो रही थीं।
नेहा रसोईघर में व्यस्त थी। अपनी सहेलियों की खातिरदारी के लिए उसने आज एक नई डिश बनाई थी। बस उसी को सजाने-संवारने में लगी हुई थी। अपनी सास के लिए बनाए गये दलिये को उसने एक ओर रख दिया क्योंकि उसके पास अभी उन्हें खाना परोसने तक की फुर्सत नहीं थी।
श्रीमती शांति देवी नाम के अनुकूल ही शांति प्रिय थीं अतः वह अपने कमरे का दरवाजा बंद करके पलंग पर लेटी हुई थीं। वैसे भी उनकी शारीरिक अवस्था ऐसी नहीं थी कि वह अतिथियों के बीच में जाकर बैठ सके। यदि होती तो भी वह नहीं बैठती क्योंकि शायद उनका बैठना किसी को पसंद नहीं आता। जनरेशन गैप था, यह बात तो वह भी समझती थी परंतु आजकल की पीढ़ी को ये क्या होता जा रहा है? बोलते समय कुछ सोचती-विचारती तक नहीं कि किस समय, किस बात का किसी पर क्या असर हो सकता है। किसी के ज़ज्बातों का ज़रा भी अहसास नहीं रहता उन्हें। बस उन्हें तो बोलने से मतलब है। उनके कानों में भी कुछ ऐसी ही अंटशंट बातें पड़ रही थीं जिन्हें न चाह कर भी उन्हें सुनना पड़ रहा था।
नेहा की एक सखी कह रही थी— अरे यार, तेरी सास को क्यों नहीं बुला लेती? तेरी थोड़ी मदद हो जाएगी। नाश्ता तो वह भी लगा सकती हैं। तू हाउज़ी मिस कर रही है।
हां, बेचारी कब से अकेली ही खट रही है। ये आजकल की सासुएं भी कुछ काम नहीं करना चाहतीं। बस सास क्या बन जाती हैं अपने आप को नवाब समझने लग जाती हैं। एक दूसरी सखी ने अपनी व्यथा प्रकट की।
फिर एक दूसरी बोली— अरे यार! ये बुजुर्ग बड़े मालदार होते हैं। थोड़ी-सी सेवा कर लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा। उसके बदले करोड़ों की जमीन-जायदाद दे जाते हैं। नेहा, ऐसे कर अपनी सास को यहां बुला ले। कहीं नाराज न हो जाये।
अब नेहा की बारी थी। वह बोली— नहीं यार, आजकल उन्हें नाराज होने का मौका नहीं देते हैं हम। पर अभी उन्हें अपने कमरे में ही रहने दो। सांस की बीमारी है उनको। यहां आएंगी तो खांस-खांस कर परेशान कर देंगी हम सबको। जितना काम नहीं करेंगी उससे ज्यादा बढ़ा देंगी क्योंकि अब उनसे कोई भी काम ठीक तरह से नहीं होता। फिर उनके यहां होने से हमें हंसने-बोलने में थोड़ा संकोच भी होगा। वह देख, अभी भी कितनी तेज खांसने की आवाज आ रही है। यह कहकर नेहा ने म्यूजिक तेज कर दिया ताकि सास की खांसी से सहेलियों को कोई परेशानी न हो।
शांति देवी की खांसी बढ़ती जा रही थी। रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। इतनी खांसी तो उन्हें पहले कभी नहीं आई थी। धीरे-धीरे उनका दम फूलने लगा। सांस लेने में कठिनाई होने लगी। उन्होंने अपनी साइड टेबल पर देखा जहां उनकी जरूरी दवाइयां होती थीं। परंतु आज वह दवाई नहीं थी जो उन्हें इस वक्त चाहिए थी। उसकी जगह कुछ कागजात पड़े थे। उन्हें याद आया यह कागजात तो उनके बेटे ने उन्हें दस्तखत करने के लिए दिए थे और उन्होंने कहा था, स्नान आदि से निवृत्त होकर कर दूंगी परंतु फिर वह भूल गई थीं।
फिर उन्हें यह भी याद आया कि दवाई भी तो सुबह ही खत्म हो गई थी। बेटे-बहू को बोला भी था लाने के लिए। वे लाए तो जरूर होंगे। पर लगता है यहां रखना भूल गए हैं।
न जाने क्यों, आजकल बहुत सेवा करने लगे हैं मेरी। अपने बाबूजी के सामने तो कभी मेरी परवाह नहीं करते थे। इसलिए मुझे तो कभी-कभी तो उनकी इस अप्रत्याशित सेवा पर शक होने लग जाता है। आजकल के जमाने में, अकेली बीमार मां की, बेटा-बहू अचानक से इतनी कदर करने लगें और दवाई-पानी का इतना ध्यान रखें, आश्चर्य की बात है।
अरे मैं भी क्या उल्टा-सीधा सोचने लगी। हो सकता है वे सुधर गये हों? वैसे भी अभी बातें सोचने का वक्त नहीं है। सेवा करते हैं तो करने दो। नेहा को आवाज देती हूं। यह सोचकर शांति देवी ने पलंग पर लेटे-लेटे ही नेहा को आवाज दी।
परंतु म्यूजिक इतना तेज था कि उनकी आवाज बंद कमरे के दरवाजे से टकराकर वापस उन्हीं तक लौट आई। शांति देवी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह ड्राइंग रूम तक जाकर नेहा से बात कर सके। धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। उनको लगा कि उनका अंतिम समय आ गया है और उन्हें अपने स्वर्गवासी पति की याद आई। छह महीने पूर्व जब वह उनसे बिछुड़ी थी, मानों दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गया हो। बहुत रोई थी वह उस दिन। लंबी बीमारी के बाद जब उसके पति को लगा था कि अब वह नहीं बचेंगे तब उन्होंने शांति देवी को एक बैग देते हुए यह बात कही थी—
शांति, मेरे जाने के बाद अपना ध्यान रखना। कभी किसी पर आंख मूंदकर विश्वास मत करना। अपनी मदद खुद करना। सब बहुत अच्छे होते हैं परंतु फिर भी जब तक हाथ-पैर चलते रहें, किसी के भरोसे मत रहना और जिस दिन तुम्हें लगे कि मेरा अंतिम समय आ गया है या मैं बहुत मुश्किल मैं हूं तभी मेरा यह बैग खोलना।
उस दिन से शांति देवी अपने पति द्वारा दिए गए बैग को सिरहाने रख कर ही सोती थीं। हल्का-सा घूम कर उन्होंने वह बैग निकाला और धीरे से उसे खोला। उसमें कुछ कागज थे। एक पत्र था और एक दवाई। शांति देवी ने वह दवा उठाई तो आश्चर्यचकित रह गईं। यही तो वह संजीवनी दवा थी, जो उन्हें इस वक्त चाहिए थी। शांति देवी ने वह दवा ली। जब उन्हें कुछ राहत मिली तो उन्होंने पत्र पढ़ना शुरू किया।
उधर किटी पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी। म्यूजिक के साथ-साथ सभी ने थिरकना भी शुरू कर दिया था। नेहा ने पार्टी में ड्रिंक्स भी रखी थी। आधुनिक महिलाओं को इसकी भी आवश्यकता पड़ती है, इसका अहसास था उसे। जिसकी जैसी जरूरत थी, उसने उतना ड्रिंक लिया और सब किटी पार्टी को पूरी तरह से एन्जॉय करने लगी।
करीबन 2 घंटे बाद किटी पार्टी का शो खत्म हो गया और सारी सहेलियां अपने अपने घर लौट गईं। तब नेहा को होश आया कि सासु मां तो अभी तक भूखी हैं। अब तक उनका दलिया भी ठंडा हो गया होगा। यदि राज को पता चल गया तो आज मुझे राज से जरूर डांट पड़ेगी। यह सोचकर उसने झटपट कुकर में से दलिया निकालकर बाउल में डाला और माइक्रोवेव में गर्म करके शांति देवी के कमरे की ओर गई। मन ही मन वह सोच रही थी कि इतनी देरी से भोजन देने के पीछे क्या बहाना बनाऊंगी।
यह सोचते-सोचते नेहा अपनी सास के कमरे में पहुंची।
मम्मीजी आप का दलिया तो पहले ही बना दिया था पर वह किटी पार्टी में व्यस्त हो गई इसलिए भूल गई। उसने कमरे में पहुंचते ही कहा और पलंग पर देखा। पर सासु मां पलंग पर नहीं थीं। शायद बाथरूम गई होंगी। यह सोचकर नेहा ने बाथरूम की ओर नजरें घुमाईं। बाथरूम का दरवाजा खुला था। नेहा ने बाथरूम में झांककर देखा। बाथरूम में कोई नहीं था।
मम्मी जी कहां गईं? नेहा हैरान हो गई और फिर घर में चारों ओर उन्हें ढूंढ़ने लगी। काफी ढूंढ़ने पर भी जब वह नजर नहीं आईं तो उसने अपने पति राज को फोन लगाया। फोन मिलने के पांच मिनट के अंदर ही राज घर में था। आते ही उसने भी सारा घर छान मारा। आस-पड़ोस में भी पूछताछ की परंतु शांति देवी का कहीं पता न था।
कितनी बार कहा है तुमसे मम्मी का थोड़ा ख्याल रखा करो। पर तुम हो कि लापरवाही करती हो। थोड़े समय की तो बात है। कौन-सा सारी जिंदगी बैठी रहेंगी। नाराज हो गईं तो पता है न, क्या होगा? राज ने नेहा को डांटते हुए कहा।
मैं तो मम्मी जी का पूरा ध्यान रखती हूं। बस आज ही कुछ देर के लिए किटी पार्टी में व्यस्त हो गई थी तो उनको अकेला छोड़ा था। वरना तो सारे दिन उनके साथ ही रहती हूं। आप ही उन्हें छोड़कर ऑफिस चले जाते हो। नेहा ने अपनी सफाई पेश की।
बंद करो यह अपनी उलटी-सीधी दलीलें देना। मैं ऑफिस कोई मौज मस्ती के लिए जाता हूं क्या? काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या? तुम तो कुछ करती नहीं हो। बस आये दिन किट्टी पार्टी करके खर्चा करती रहती हो। 40 साल का होने को आया एक गज़ जमीन तक नहीं है पास में। इसीलिए तो मां का ख्याल रखने के लिए कहा था। कहते हैं मां प्रसन्न होती है तो सब कुछ मिल जाता है।
हां, हां सब कुछ मिल जाता है। पर कैसे? मेरा मुंह मत खुलवाओ। मुझे पता है आप कितना और किसलिए चाहते हो मां को। बस मुझे उपदेश देते रहते हो। बड़बड़ाती हुई नेहा रसोई की ओर चली गई।
शाम तक राज और नेहा ने श्रीमती शांति देवी को ढूंढ़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी पर वे कहीं नहीं मिलीं। हारकर उन्होंने पुलिस थाने जाकर रिपोर्ट लिखवा दी। अपने सारे व्हाट्स ग्रुप्स पर भी मैसेज कर दिया परंतु कहीं से कोई जवाब नहीं आया। रात होने को आई थी परंतु राज और नेहा दोनों की आंखों में नींद नहीं थी कि अचानक से फोन की घंटी बजी।
राज ने लपक कर फोन उठाया। एक अज्ञात नंबर था।
हेलो, मैं अजीत सिंह बोल रहा हूं। राज बोल रहो हो?
हां, हां मैं राज बोल रहा हूं। कहिए, क्या काम है?
राज बेटा, मैं अजीत सिंह। तुम्हारे पिताजी का दोस्त। तुम्हारी मम्मी शांतिदेवी कल दोपहर को हमारे घर आई थीं। वह तुम्हें बताना भूल गईं। वह अब भी हमारे पास हैं और सही सलामत हैं। तुम उनकी चिंता मत करना।
अपने पिता के मित्र अजीत सिंह की बात सुनकर राज की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। मां सही-सलामत हैं और सही जगह पर हैं— उसने नेहा को कहा। फिर फोन पर ही बोला— अंकल आप मुझे अपने घर का पता बताइए। मैं अभी आकर मां को ले जाता हूं।
इस पर अजीत सिंह ने कहा— लो, मैं तुम्हारी तुम्हारी मां से भी बात करवा देता हूं।
उधर से शांति देवी की आवाज आई।
हेलो राज बेटा, मेरी चिंता मत करना। मैं बिल्कुल ठीक हूं। हां, तुम्हें अभी मुझे लेने आने की जरूरत नहीं है। अब मुझे यहीं रहने दो।
मगर, मां आप वहां क्यों रहोगी? आप इससे पहले तो ऐसी कभी वहां रहने नहीं गई। राज ने नाराज होते हुए पूछा।
बेटा इससे पहले मुझे यहां की जानकारी भी नहीं थी और यहां आने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी थी। वह तो कल तुम्हारे बाबूजी के हाथ का लिखा हुआ खत पढ़ा तब इनके बारे में जानकारी मिली तथा इनका पता भी मिला। तुम्हारे बाबूजी ने लिखा था कि जब कभी भी तुम्हें आवश्यकता हो या तुम्हारा मन हो, तुम मेरे मित्र के परिवार के साथ रहने जा सकती हो। अब मैं यहीं रहूंगी।
पर मां यह ठीक नहीं है। ऐसे यकायक घर छोड़ कर जाना? बिना कारण? आप सोचिए हमारी कितनी बदनामी होगी। लोग हम पर थूकेंगे और यही कहेंगे कि हमने तुम्हारी सेवा नहीं की इसलिए तुम हमें छोड़ कर चली गईं।
उधर से शांति देवी धीरे से बोली— बेटा, ये झूठे प्रेम के मुखौटों को एक न एक दिन तो उतरना ही था। मेरे सामने और दुनिया के सामने भी। साइड टेबल पर पड़े हुए कागजों से मुझे सब पता चल गया कि आजकल तुम मेरी इतनी सेवा सुश्रुषा किस लालच में कर रहे हो। यदि ऐसा न होता तो तुम अपने पिता के मरने के 6 महीने बाद ही जमीन-जायदाद के कागजात मुझसे दस्तखत करवाने की कोशिश न करते। बेटा, मां का हृदय सब पहचान लेता है। सच्चे प्रेम और दिखावटी प्रेम का फर्क मालूम है उसे।
हां, मेरे लौटने की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह काम मैं करके आई हूं जिसके लिए तुम चिंतित हो। मैं वे सारे कागजात तुम्हारी इच्छा अनुसार, दस्तखत करके दराज में रख आई हूं। अब हमारी सारी जमीन-जायदाद तुम्हारे नाम हो जाएगी। हां, तुम्हारे बाबूजी का दिया हुआ वह बैग मैं अपने साथ ले आई हूं। उसमें कुछ एफ.डी. हैं। मेरे नाम के। जो तुम्हारे बाबूजी ने मुझे बताए बिना, बनवाकर उस बैग में रख दिये थे। शायद उन्हें लगा होगा कि मुझे इनकी जरूरत पड़ सकती है।
शांति देवी की बात सुनकर राज के पैरों तले जमीन सरक गई। आखिर सच सामने आ ही गया था। वह यह सोचकर शर्मिंदा था कि जमीन-जायदाद तो उन्हें मिल जाएगी परंतु मां का विश्वास और प्रेम वे हार गए थे।


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